सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के 50 वार्डों में हुए स्थानीय निकाय चुनावों को निरस्त करते हुए अगले छह हफ्तों के भीतर वहां नए सिरे से मतदान कराने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने यह कदम अपने द्वारा गठित एक जांच आयोग (फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमीशन) की रिपोर्ट के आधार पर उठाया, जिसने नामांकन के दौरान व्यापक हिंसा, धमकियों और पर्चे फाड़े जाने की घटनाओं की पुष्टि की थी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 28 सितंबर को यह आदेश जारी किया, जिसकी प्रति बुधवार को उपलब्ध कराई गई। इस फैसले के दायरे में पटियाला जिले के 28 वार्ड और मोगा जिले के 22 वार्ड शामिल हैं। अदालत ने आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा कि इन सभी 50 वार्डों में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह दूषित हो चुकी थी, जिसके चलते इन्हें रद्द किया जाना आवश्यक था।
नामांकन प्रक्रिया में हिंसा और बाधा की पुष्टि
अदालत द्वारा नियुक्त जांच आयोग ने स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर आई शिकायतों की विस्तृत पड़ताल की थी। आयोग ने पाया कि नामांकन प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर रुकावटें पैदा की गईं। कई संभावित प्रत्याशियों को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया, धमकाया गया और उनके साथ मारपीट की गई। इसके अलावा उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने की मंशा से उनके नामांकन पत्रों को जबरन छीनने, फाड़ने और नष्ट करने की घटनाएं भी सामने आईं। इन तथ्यों को देखते हुए आयोग ने चुनाव को अमान्य ठहराते हुए रद्द करने की सिफारिश की थी, जिसे पीठ ने मंजूर कर लिया।
हाईकोर्ट के पूर्व जज करेंगे निगरानी, पंजाब सरकार ने भी दी सहमति
पुनर्मतदान निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से संपन्न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को एक सप्ताह के अंदर निगरानी समिति गठित करने का निर्देश दिया है। इस समिति की कमान हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज को सौंपी जाएगी। वहीं, सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि पंजाब सरकार को आयोग की सिफारिशें स्वीकार किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

