दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से उस मांग पर विचार करने को कहा, जिसमें भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शन प्रबंधन की ड्यूटी पर तैनात पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों के लिए लगातार चालू रहने वाले बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP बनाने की मांग की गई है।
कार्यवाहक चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांबरे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की बेंच ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि केंद्र इसे एक प्रतिनिधित्व के रूप में माने और छह महीने के भीतर याचिकाकर्ता को अपने निर्णय की जानकारी दे।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कोर्ट से कहा कि याचिका को संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधित्व माना जा सकता है और इस पर लिया गया फैसला छह महीने के भीतर याचिकाकर्ता को बता दिया जाएगा।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि पुलिस द्वारा बॉडी-वॉर्न कैमरों का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है, जिसमें ट्रैफिक पुलिस भी शामिल है। हालांकि, कोर्ट को बताया गया कि इनके इस्तेमाल को लेकर कोई अलग SOP मौजूद नहीं है।
हर जवान के लिए लगातार रिकॉर्डिंग की मांग
यह जनहित याचिका अधिवक्ता चाहत राघव ने दायर की थी। इसमें एक विशेषज्ञ समिति गठित कर बाध्यकारी SOP बनाने की मांग की गई थी, ताकि दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स का हर वह कर्मी, जो भीड़ नियंत्रण, प्रदर्शन प्रबंधन या भीड़ हटाने की ड्यूटी पर हो, तैनाती शुरू होने से लेकर ड्यूटी समाप्त होने तक बॉडी कैमरा लगातार चालू रखे।
याचिका में कैमरों से रिकॉर्ड की गई फुटेज के सुरक्षित रखरखाव, उसकी प्रामाणिकता, कितने समय तक उसे संरक्षित रखा जाए और सबूत के रूप में उसके इस्तेमाल को लेकर भी विस्तृत व्यवस्था बनाने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान बेंच ने पूछा कि बॉडी-वॉर्न कैमरे नहीं होने से आम जनता के अधिकार किस तरह प्रभावित होते हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने कहा कि प्रदर्शनों के दौरान हिंसा होने पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों की ओर से एक-दूसरे पर आरोप लगाए जाते हैं। ऐसे में यह तय करने के लिए विश्वसनीय रिकॉर्ड जरूरी है कि हिंसा किसने की और पुलिस द्वारा जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया या नहीं।
सिब्बल ने कहा कि पुलिसकर्मी कैमरों का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन यह बहुत सीमित और अनियमित तरीके से होता है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सबूत केवल उन निजी लोगों की वीडियो रिकॉर्डिंग पर निर्भर न रहें, जो मौके पर मौजूद होते हैं।
केंद्र की ओर से कहा गया कि प्रदर्शन आयोजित करने से जुड़ी मौजूदा गाइडलाइंस में वीडियोग्राफी के पहलू का पहले से ध्यान रखा गया है।
जुलाई के जंतर-मंतर प्रदर्शन का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह याचिका जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए उन प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दायर की गई है, जिनमें कॉकरोच जनता पार्टी और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक शामिल थे।
याचिका के अनुसार, छात्र प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा कथित बल प्रयोग से जुड़े घटनाक्रम का रिकॉर्ड मुख्य रूप से मौके पर मौजूद लोगों द्वारा मोबाइल फोन से बनाए गए अनौपचारिक वीडियो पर निर्भर था।
याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस और RAF पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोपों के साथ-साथ पथराव, तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप भी सामने आए थे।
याचिका के मुताबिक, सुरक्षा बलों की जवाबदेही और भीड़ में मौजूद कथित उपद्रवियों के खिलाफ सबूत काफी हद तक आम नागरिकों द्वारा बनाई गई वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रदर्शन स्थल पर लगे कुछ स्थायी कैमरों के फुटेज पर निर्भर थे।

