रेप पीड़िता को मुआवजा देने में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, एक महीने में भुगतान पर फैसला करने का दिया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक रेप पीड़िता को एक साल से अधिक समय तक वैधानिक मुआवजा न दिए जाने पर उत्तर प्रदेश प्रशासन के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों की घोर हीलाहवाली और उदासीन रवैये को अस्वीकार्य बताते हुए निर्देश दिया कि पीड़िता के मुआवजे के दावे पर एक महीने के भीतर निर्णय लिया जाए। इसके साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता पात्र पाई जाती है, तो निर्णय के 10 कार्यदिवसों के भीतर निर्धारित धनराशि जारी कर दी जाए।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने 5 अक्टूबर को यह आदेश पीड़िता की ओर से दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि ‘उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष नियमावली, 2015’ के तहत उसे अब तक मुआवजे की कोई भी राशि नहीं मिली है।

अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और हर्जाना लगाने की बात

मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिम्मेदार अधिकारियों के ढुलमुल रवैये और निष्क्रियता के चलते उन पर हर्जाना (कॉस्ट) लगाया जाना चाहिए।

पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा पीड़ितों की सहायता के लिए बनाई गई इस कल्याणकारी योजना के तहत भुगतान सुनिश्चित करने वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता समझ से परे है। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस अत्यधिक देरी के लिए जिम्मेदार कर्मियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

READ ALSO  जीवन की हर उम्मीद खो दी, जेल में मरना और भाग्य का सामना करना बेहतर है: गोयल ने हाथ जोड़कर अदालत से कहा

देरी से बढ़ता है पीड़िता का शारीरिक और मानसिक कष्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे जघन्य अपराध की शिकार पीड़िताएं न केवल असहनीय शारीरिक पीड़ा से गुजरती हैं, बल्कि गंभीर मानसिक आघात भी झेलती हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि आर्थिक मुआवजे का मूल उद्देश्य पीड़िता के दर्द को तुरंत कम करना और चिकित्सीय उपचार से जुड़े आपात खर्चों को तत्काल पूरा करना है।

अदालत ने कहा कि लाभकारी योजना के तहत समय पर सहायता न मिलने से पीड़िता का दुख और दर्द कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, अपने कानूनी हक को पाने के लिए पीड़िता को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और अतिरिक्त कानूनी खर्च उठाना पड़ा, जिसने उसकी परेशानी को और बढ़ा दिया।

2015 की नियमावली के प्रावधान और मामले की पृष्ठभूमि

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने जिला अदालत के जज को सस्पेंड किया, जांच पेंडिंग रहने तक दिल्ली नहीं छोड़ सकते

याचिकाकर्ता के वकील द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत विवरण के अनुसार, यह घटना 17 मई 2025 को हुई थी और उसी दिन मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई थी। इसके बाद पुलिस ने 17 जुलाई 2025 को अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी।

नियमों का हवाला देते हुए वकील ने स्पष्ट किया कि 2015 की राज्य नियमावली के तहत पात्र पीड़िता को दो किस्तों में वित्तीय सहायता दी जाती है। प्रावधान के अनुसार, चार्जशीट दाखिल होने के 15 दिनों के भीतर 1 लाख रुपये की पहली किस्त और शेष राशि एक महीने के भीतर प्रदान की जानी चाहिए थी। अदालत को अवगत कराया गया कि इन तय समयसीमाओं के बावजूद याचिकाकर्ता को फूटी कौड़ी भी नहीं मिली।

READ ALSO  विशेष अदालत खत्म होने के बाद हाईकोर्ट में भूमि कब्जा अपीलें सुनवाई योग्य नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

जिला संचालन समिति को समयबद्ध निर्णय का निर्देश

इन सभी परिस्थितियों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने जिला संचालन समिति (डिस्ट्रिक्ट स्टीयरिंग कमेटी) को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर पीड़िता के दावे पर विचार कर फैसला करे। समिति द्वारा पात्रता तय किए जाने की तिथि से 10 कार्यदिवसों के भीतर पूरी देय धनराशि जारी करने का आदेश दिया गया है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles