सुप्रीम कोर्ट ने एक क्षेत्रीय गुजराती दैनिक समाचार पत्र को ‘सौराष्ट्र आज तक’ शीर्षक के तहत प्रकाशन जारी रखने से रोकने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। शीर्ष अदालत ने माना कि यह मामला सीधे तौर पर ‘पासिंग ऑफ’ का है और इस नाम से पाठकों के बीच न्यूज चैनल ‘आज तक’ के साथ व्यावसायिक संबंध होने का भ्रम पैदा हो सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 30 जुलाई के फैसले को चुनौती देने वाली अखबार प्रबंधन की याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई औचित्य नहीं बनता।
अदालत की सख्त टिप्पणी और अनुपालन की समयसीमा
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने मौखिक रूप से कहा कि यह स्पष्ट रूप से पासिंग ऑफ का मामला है।
वहीं, जब गुजराती दैनिक की ओर से पेश वकील ने नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए छह महीने का समय मांगा, तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आप कल ही ‘सौराष्ट्र आज तक’ का नाम बदलकर ‘सौराष्ट्र रात दिन’ कर सकते हैं। हालांकि, अदालत ने अखबार को हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने और अपने रीब्रांडिंग का काम पूरा करने के लिए तीन महीने की मोहलत प्रदान की।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखे गए हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, अखबार को अब ऐसा नया शीर्षक चुनना होगा जो ‘आज तक’ ट्रेडमार्क के समान न हो और न ही उससे किसी तरह की भ्रामक समानता रखता हो।
दो दशक पुराना है कानूनी विवाद
यह विवाद ‘आज तक’ समाचार चैनल का संचालन करने वाली कंपनी टीवी टुडे नेटवर्क की आपत्ति से उपजा था। टीवी टुडे को सबसे पहले 2002 में पता चला था कि गुजरात के राजकोट से ‘सौराष्ट्र आज तक’ नाम से एक अखबार प्रकाशित किया जा रहा है।
इसके बाद कंपनी ने अप्रैल 2003 में पासिंग ऑफ का मुकदमा दायर करते हुए आरोप लगाया कि यह शीर्षक उसके ट्रेडमार्क की नकल है और पाठकों को गुमराह कर सकता है कि इस समाचार पत्र का संबंध टीवी चैनल से है।
इस विवाद में दिल्ली की एक निचली अदालत ने फरवरी 2012 में अखबार को इस शर्त पर यह शीर्षक बनाए रखने की अनुमति दी थी कि वह अपने पन्नों पर प्रमुखता से डिस्क्लेमर प्रकाशित करे, जिसमें यह स्पष्ट हो कि उसका टीवी टुडे या ‘आज तक’ से कोई वास्ता नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जुलाई को निचली अदालत के इस निर्णय को निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला था कि महज डिस्क्लेमर छापने से पाठकों के मन में पैदा होने वाले भ्रम को खत्म नहीं किया जा सकता, इसलिए अखबार को अपना नाम पूरी तरह बदलना अनिवार्य होगा।

