उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने मेवाड़ एक्सप्रेस के रिजर्व AC कोच में यात्रियों के सामान की चोरी के मामले में भारतीय रेलवे को लापरवाही का जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने पाया कि घटना के समय कोच के दरवाजे खुले थे और रेलवे का संबंधित स्टाफ भी मौजूद नहीं था।
आयोग ने शिकायतकर्ताओं के पक्ष में कुल 47,222 रुपये के भुगतान को बरकरार रखा। साथ ही 37,222 रुपये की राशि पर 31 जुलाई 2020 से भुगतान होने तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया।
आयोग की अध्यक्ष कुमकुम रानी और सदस्य बी एस मनराल ने भारत संघ और रेलवे अधिकारियों की उस अपील पर सुनवाई की, जिसमें देहरादून जिला उपभोक्ता आयोग के 11 मई 2022 के आदेश को चुनौती दी गई थी।
जिला आयोग ने शिकायतकर्ताओं को हुए नुकसान के लिए 37,222 रुपये, मानसिक पीड़ा के लिए 25,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 10,000 रुपये देने का आदेश दिया था। राज्य आयोग ने अंततः 47,222 रुपये की राशि बरकरार रखी, जिसमें 37,222 रुपये मुआवजे और 10,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में शामिल हैं।
रात में खुले थे कोच के दरवाजे
मामला 1 जुलाई 2018 को उदयपुर से नई दिल्ली लौट रहे एक परिवार की यात्रा से जुड़ा है। परिवार मेवाड़ एक्सप्रेस के रिजर्व AC कोच में सफर कर रहा था।
2 जुलाई को सुबह करीब 4 बजे ट्रेन के मथुरा पहुंचने पर कुछ अनधिकृत लोग कथित रूप से कोच में घुसे और दो यात्रियों का सामान जबरन लेकर भाग गए।
शिकायत के अनुसार, वीणा डोभाल अपनी बर्थ पर सो रही थीं और उनका एक बड़ा बैग सिर के नीचे तकिए के नीचे रखा था। एक व्यक्ति बैग लेकर भागने लगा तो वह जाग गईं और शोर मचाया।
परिवार के अन्य सदस्यों और यात्रियों ने आरोपी को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह चलती ट्रेन से बैग लेकर कूद गया।
घटना के बाद यात्रियों ने कोच अटेंडेंट, RPF कर्मियों और TTE को तलाशा, लेकिन उनमें से कोई भी कोच में मौजूद नहीं मिला। बाद में TTE से संपर्क कर घटना की जानकारी दी गई।
FIR का फॉर्म भरकर हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर गवर्नमेंट रेलवे पुलिस को सौंपा गया। 2 जुलाई 2018 को सुबह 7:50 बजे जीरो FIR दर्ज हुई। शिकायतकर्ताओं ने आयोग को बताया कि कई प्रयासों के बावजूद उन्हें जांच के नतीजे की जानकारी नहीं मिल सकी।
रेलवे ने यात्रियों पर डाली सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी
रेलवे ने लापरवाही से इनकार करते हुए कहा कि यात्रियों को अपने साथ रखे सामान की सुरक्षा स्वयं करनी होती है।
रेलवे ने रेलवे अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं ने अपना सामान रेलवे के पास बुक नहीं कराया था और न ही यह घोषित किया था कि उनके पास कीमती सामान है।
रेलवे ने यह भी कहा कि यात्रियों को अपने सामान को चेन से बांधकर सुरक्षित रखने की सलाह दी जाती है, लेकिन शिकायतकर्ताओं ने ऐसा नहीं किया।
उसने यह भी कहा कि रिजर्व कोच केवल अधिकृत यात्रियों के लिए होते हैं और रात में दरवाजे बंद रखने की जिम्मेदारी कोच अटेंडेंट और TTE की होती है।
आयोग ने रेलवे की दलील खारिज की
राज्य आयोग ने रेलवे की दलील स्वीकार नहीं की। उसने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने साफ तौर पर आरोप लगाया था कि कोच के दरवाजे और वेस्टिब्यूल के अंतिम दरवाजे लॉक नहीं थे।
आयोग ने यह भी नोट किया कि रेलवे ने इस आरोप का स्पष्ट रूप से खंडन नहीं किया और न ही कोच अटेंडेंट या TTE की ओर से ऐसा कोई सबूत पेश किया, जिससे यह साबित हो कि दरवाजे बंद थे।
आयोग ने कहा कि यदि कोच के दरवाजे लॉक या बंद होते, तो अनधिकृत लोगों के लिए कोच में घुसकर चोरी या लूट करना संभव नहीं होता।
आयोग ने यह भी पाया कि घटना के समय कोच के भीतर न तो कोच अटेंडेंट मौजूद था, न पुलिसकर्मी और न ही TTE।
इन परिस्थितियों में आयोग ने माना कि रेलवे प्रशासन और उसके कर्मचारियों की लापरवाही साबित होती है।
आयोग ने रेलवे की यह दलील भी खारिज कर दी कि रेलवे कानूनों के तहत उपलब्ध उपायों के कारण उपभोक्ता शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। आयोग ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत मिलने वाले उपाय अन्य कानूनों में उपलब्ध उपायों के अतिरिक्त हैं।
इस आधार पर आयोग ने 47,222 रुपये के भुगतान का आदेश बरकरार रखा और 37,222 रुपये की राशि पर 31 जुलाई 2020 से भुगतान होने तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया।

