भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत किसी लोक सेवक को दोषी ठहराने के लिए रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति को अनिवार्य शर्त बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने झारखंड के शिक्षा विभाग के एक पूर्व सहायक की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि रिश्वत मांगने का कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं है, तो आरोपी से केवल रंग लगे नोटों (कथित रिश्वत की रकम) की बरामदगी अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। खास बात यह है कि अपीलकर्ता अपनी चार साल की जेल की सजा पूरी कर चुके थे और जुर्माना भी अदा कर चुके थे, इसके बावजूद अपने नाम पर लगे कलंक को धोने के लिए उन्होंने यह कानूनी लड़ाई जारी रखी, जिस पर कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2010 का है, जब शिकायतकर्ता दुर्गापद सिंह मुंडा (पीडब्ल्यू-1) को सिरुम स्थित राजकीय उच्च विद्यालय में अर्दली (चपरासी) के पद पर नियुक्त किया गया था। वेतन न मिलने पर मुंडा सरायकेला स्थित जिला शिक्षा कार्यालय पहुंचे। आरोप के अनुसार, वहां पदस्थापित सहायक अजीत कुमार ने वेतन जारी कराने की एवज में 5,000 रुपये रिश्वत की मांग की।
रिश्वत देने के अनिच्छुक मुंडा ने 19 अप्रैल 2010 को रांची स्थित निगरानी ब्यूरो के पुलिस अधीक्षक को एक आवेदन सौंपा। मामले के सत्यापन का जिम्मा पुलिस निरीक्षक श्यामलाल चम्पिया (पीडब्ल्यू-2) को सौंपा गया, जिन्होंने एक महीने बाद 19 मई 2010 को सत्यापन रिपोर्ट देकर आरोपों की पुष्टि की। इसके आधार पर निगरानी थाना कांड संख्या 17/2010 दर्ज किया गया।
अगले ही दिन, 20 मई 2010 को एक ट्रैप टीम गठित की गई और शिकायतकर्ता को फेनोल्फथलीन पाउडर लगे नोट दिए गए। अभियोजन का दावा था कि शिकायतकर्ता अजीत कुमार के साथ उनके किराए के आवास पर गया, जहां कथित तौर पर पैसे दिए गए और आरोपी ने उसे बिस्तर या तकिए के नीचे रख दिया। इसके बाद निगरानी दल ने कुमार को पकड़ा और कमरे से नोट बरामद करते हुए उनके हाथ केमिकल के घोल में धुलवाए, जिससे पानी का रंग गुलाबी हो गया।
जांच अधिकारी डीएसपी रामाशीष राउत (पीडब्ल्यू-11) ने 10 जुलाई 2010 को चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 13(2) और 13(1)(डी) के तहत आरोप तय किए गए। 27 फरवरी 2021 को चाईबासा स्थित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के विशेष न्यायाधीश ने अजीत कुमार को दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। झारखंड हाईकोर्ट ने 21 जुलाई 2022 को इस सजा को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने जब 24 जुलाई 2026 को नोटिस जारी किया, तब अपीलकर्ता के वकील ने पीठ को अवगत कराया कि कुमार अपनी पूरी सजा काट चुके हैं और जुर्माना भी भर चुके हैं, लेकिन अपने सम्मान को दोबारा हासिल करने और खुद को बेदाग साबित करने के लिए वे अपील पर फैसला चाहते हैं। इसके बाद 23 सितंबर 2026 को शीर्ष अदालत ने विशेष अनुमति याचिका स्वीकार करते हुए मामले की अंतिम सुनवाई की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील शम्बो नंदी ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने केवल शिकायतकर्ता के असत्यापित बयानों के आधार पर दोषसिद्धि का फैसला देकर गंभीर भूल की है। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा, जो कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत किसी भी अपराध का मूल आधार है।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कथित लेन-देन आरोपी के निजी आवास के भीतर हुआ, जहां ट्रैप टीम का कोई भी सदस्य, शैडो विटनेस या कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था। वकील ने जोर देकर कहा कि केवल नोटों की जब्ती और केमिकल टेस्ट का सकारात्मक आना मांग का विकल्प नहीं हो सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास और टेस्ट में देरी जैसी गंभीर खामियां अभियोजन की पूरी कहानी को अविश्वसनीय बनाती हैं।
दूसरी तरफ, झारखंड राज्य की ओर से पेश वकील श्री मुखर्जी ने तर्क दिया कि निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला सबूतों के सही मूल्यांकन पर आधारित था। उन्होंने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियां रिश्वत की मांग और स्वीकृति के मूल तथ्य को कमजोर नहीं करती हैं। राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि चूंकि अपीलकर्ता पहले ही अपनी सजा पूरी कर चुके हैं, इसलिए यह अपील केवल एक अकादमिक कवायद रह गई है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।
अदालत का विश्लेषण और पूर्व निर्णय
अभियोजन पक्ष के सभी 12 गवाहों के बयानों की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले में भारी विरोधाभास हैं। ट्रैप टीम के कुछ सदस्यों ने दावा किया कि आरोपी को उसके किराए के आवास से पकड़ा गया, जबकि अन्य गवाहों का कहना था कि उसे मोटरसाइकिल से लौटने के बाद दफ्तर में गिरफ्तार किया गया। सबसे अहम बात यह रही कि जब्ती गवाह बनाए गए दफ्तर के ही दो लिपिकों (पीडब्ल्यू-8 और पीडब्ल्यू-9) ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने कोई बरामदगी नहीं देखी थी और उन्होंने केवल निगरानी अधिकारियों के कहने पर पहले से तैयार या सादे कागजों पर दस्तखत किए थे।
पीठ ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता के अलावा पूरे रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है जिसने आरोपी को रिश्वत मांगते देखा हो या मुंडा को पैसे सौंपते देखा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को दोहराने के लिए पूर्व के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया:
पी. सत्यनारायण मूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2015) के मामले को उद्धृत करते हुए कोर्ट ने दोहराया:
“इस प्रकार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(डी)(i) व (ii) के तहत अपराध का मूल आधार अवैध परितोषण की मांग साबित होना ही है, और इसके अभाव में, यह आरोप निश्चित रूप से विफल हो जाएगा। मांग के सबूत के बिना केवल अवैध परितोषण के रूप में किसी राशि की कथित स्वीकृति या उसकी बरामदगी, अपने आप में, अधिनियम की इन दोनों धाराओं के तहत आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। परिणामस्वरूप, अवैध परितोषण की मांग साबित करने में अभियोजन की विफलता घातक होगी और अधिनियम की धारा 7 या 13 के तहत आरोपी व्यक्ति से केवल राशि बरामद होने से उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
इसके अलावा, संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले नीरज दत्ता बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) (2023) का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:
“88.1. (क) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(डी)(i) व (ii) के तहत आरोपी लोक सेवक के अपराध को स्थापित करने के लिए अभियोजन द्वारा एक विवाद्यक तथ्य के रूप में अवैध परितोषण की मांग और स्वीकृति का सबूत एक अनिवार्य शर्त (sine qua non) है।”
“88.2. (ख) आरोपी का दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन को सबसे पहले अवैध परितोषण की मांग और उसके बाद उसकी स्वीकृति को वस्तुतः साबित करना होगा। इस विवाद्यक तथ्य को प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा साबित किया जा सकता है, जो मौखिक साक्ष्य या दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में हो सकता है।”
इसी तरह, अमन भाटिया बनाम राज्य (2025) के फैसले का जिक्र करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“52. यह सुस्थापित है कि केवल कथित रिश्वत के पैसे की बरामदगी, अपने आप में, पीसी एक्ट के तहत किसी आरोपी के खिलाफ आरोपों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(डी) के तहत क्रमशः दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए यह उचित संदेह से परे साबित होना चाहिए कि लोक सेवक ने यह जानते हुए स्वेच्छा से पैसा स्वीकार किया कि वह रिश्वत है। अदालतों ने लगातार दोहराया है कि रिश्वत की मांग पीसी एक्ट की धारा 7 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए अनिवार्य शर्त है।”
“55. कानून की उपरोक्त व्याख्या से यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मांग के सबूत के अभाव में किसी लोक सेवक से कथित नोटों का मात्र कब्जा और बरामदगी पीसी एक्ट की धारा 7 और 13(1)(डी) के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। नतीजतन, अवैध परितोषण की मांग के सबूत के बिना यह नहीं कहा जा सकता कि लोक सेवक ने पीसी एक्ट की धारा 13(1)(डी) के संदर्भ में कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए भ्रष्ट या अवैध साधनों का इस्तेमाल किया, या अपने पद का दुरुपयोग किया।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि जसविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2026) के हालिया फैसले में भी इसी सिद्धांत को लागू किया गया था, जहां अदालत ने टिप्पणी की थी:
“21. ऐसी परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि न तो रिश्वत की मांग और न ही उसकी स्वीकृति साबित कही जा सकती है। वस्तुतः, किसी ने भी अपीलकर्ता को रिश्वत मांगते नहीं देखा और किसी ने भी पीडब्ल्यू-1 को अपीलकर्ता को रिश्वत का पैसा सौंपते या अपीलकर्ता द्वारा उसे स्वीकार करते नहीं देखा। इस प्रकार इस मामले की तथ्यात्मक स्थिति इस अदालत के सत्यनारायण मूर्ति, नीरज दत्ता और अमन भाटिया के निर्णयों से पूरी तरह आच्छादित है।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इन सुस्थापित न्यायिक सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष मूल विवाद्यक तथ्य—यानी अवैध परितोषण की मांग और स्वीकृति—को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए 27 फरवरी 2021 के विशेष न्यायाधीश के आदेश और 21 जुलाई 2022 के झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट घोषणा की कि अजीत कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत लगाए गए आरोप साबित नहीं हो सके, और उन्हें सभी आरोपों से दोषमुक्त किया जाता है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अजीत कुमार बनाम झारखंड राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4573/2026
पीठ: जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 05 अक्टूबर, 2026

