नारकोटिक्स से जुड़े एक मामले में फरार आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट) के तहत दर्ज मामलों को केवल इसलिए समय से पहले रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि मौके से भागे आरोपी का नाम मौके पर पकड़े गए सह-आरोपियों ने बताया था। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने निर्णय दिया कि हालांकि सह-आरोपी के इकबालिया या प्रकटीकरण बयान के आधार पर मुकदमे में किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन ऐसे खुलासे जांच अधिकारी के लिए आगे के सबूत जुटाने की वैध सामग्री होते हैं। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट द्वारा अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करके मुकदमे से पहले ही कार्यवाही को रद्द करना अनुचित है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मैसूर शहर के लश्कर पुलिस स्टेशन में तीन लोगों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(b)(ii)(C) के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 30/2025 से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक कार में गांजा ले जाने की गुप्त सूचना मिलने पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने पार्किंग क्षेत्र में संदिग्ध कार के पास तीन लोगों को खड़ा पाया। पुलिस को देखते ही उनमें से एक व्यक्ति मौके से भाग निकला, जबकि बाकी दो को पुलिस ने पकड़ लिया। जब कार की तलाशी ली गई, तो उसके डैशबोर्ड और डिग्गी में 42 बंडलों में छिपाकर रखा गया 32.615 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ।
प्रतिवादी एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट है, जो अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका चला गया था। घटना के समय वह एक छात्र था और उसे मामले में आरोपी संख्या 3 बनाया गया था। चूंकि वह मौके से भाग गया था और गिरफ्तारी से बचता रहा, इसलिए चार्जशीट में उसे फरार घोषित कर दिया गया और उसके खिलाफ मामला अलग (स्प्लिट) कर दिया गया।
इसके बाद प्रतिवादी ने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा विशेष अदालत, उडुपी के समक्ष लंबित विशेष मामला संख्या 24/2022 (जो विशेष मामला संख्या 131/2019 से उद्भूत हुआ था) की कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने इस आधार पर उसके खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी कि प्रतिवादी न तो मौके पर पकड़ा गया था और न ही उसके पास से कोई नशीला पदार्थ बरामद हुआ था, बल्कि उसे केवल मौके पर पकड़े गए सह-आरोपियों के इकबालिया बयानों के आधार पर आरोपी बनाया गया था। हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत बयानों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला दिया था। इसके बाद कर्नाटक राज्य ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) अमन पंवार पेश हुए।
दूसरी ओर, प्रतिवादी आरोपी की तरफ से कोई भी अदालत में पेश नहीं हुआ। लश्कर पुलिस स्टेशन के सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) द्वारा 16 अप्रैल 2026 को पुलिस आयुक्त, मैसूर को भेजे गए आधिकारिक पत्र से पुष्टि हुई कि आरोपी को विधिवत नोटिस तामील कराया जा चुका था।
विवादित आदेश में उद्धृत फैसलों का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा अपने आदेश में उद्धृत किए गए पूर्व फैसलों की पड़ताल की और देखा कि क्या वे लंबित मुकदमे को रद्द करने पर लागू होते हैं:
- तोफान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य (2021): तीन जजों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 53 के तहत अधिकृत अधिकारी साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 के दायरे में पुलिस अधिकारी माने जाएंगे। इसलिए, धारा 67 के तहत दर्ज इकबालिया बयान किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए ठोस सबूत नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि तोफान सिंह का मामला दोषसिद्धि के खिलाफ अपील से जुड़ा था, जहां आरोपी को केवल इकबालिया बयान के आधार पर दोषी ठहराया गया था।
- राज्य (एनसीबी द्वारा) बेंगलुरु बनाम पल्लुलाबिद अहमद अरिमुट्टा एवं अन्य (2022): यह मामला जमानत रद्द करने की राज्य की याचिका से जुड़ा था, जहां आरोपियों को जोड़ने वाली एकमात्र सामग्री धारा 67 के तहत दर्ज बयान थे। कोर्ट ने जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया था क्योंकि इकबालिया बयान जमानत रद्द करने के लिए ठोस सामग्री नहीं थे।
- बलविंदर सिंह (बिंदा) बनाम नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (2024): इस मामले में भी ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा के खिलाफ अपील थी। आरोपी की दोषसिद्धि केवल सह-आरोपी के बयान और धारा 67 के तहत दर्ज बयान पर आधारित थी, जबकि कोई अन्य स्वतंत्र सबूत मौजूद नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर उसे बरी कर दिया था।
- फिरदौसखान खुर्शीदखान बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य (2024): यह भी दोषसिद्धि के खिलाफ एक अपील थी, जहां मौके से भागे आरोपी को बाद में केवल धारा 67 के बयान के आधार पर और बिना किसी जब्ती के दोषी ठहराया गया था, जिसके चलते उसे बरी किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट द्वारा उद्धृत सभी चारों मामले या तो अंतिम दोषसिद्धि के खिलाफ अपील से संबंधित थे या फिर जमानत रद्द कराने की कार्यवाही से जुड़े थे, जिनमें अभियोजन का एकमात्र आधार इकबालिया बयान था। इनमें से कोई भी मामला मुकदमे को शुरुआती चरण में ही रद्द करने से संबंधित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और मुख्य निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मुकदमे में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आवश्यक साक्ष्य के मानक और लंबित मुकदमे को जारी रखने के लिए जरूरी आधार में बुनियादी अंतर होता है।
पीठ ने इस तथ्य पर जोर दिया कि प्रतिवादी गिरफ्तारी से बचकर भाग गया था, जिसके चलते न तो उसका कोई धारा 67 का बयान दर्ज हुआ था और न ही सह-आरोपियों से कोई औपचारिक प्रकटीकरण बयान लिया गया था, सिवाय इसके कि उन्होंने भागने वाले व्यक्ति का नाम बताया था:
“वर्तमान मामले के तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि मौके से एक व्यक्ति भाग गया था, जहां से दो अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया और वे मादक पदार्थ के सचेत कब्जे में पाए गए। प्रथम सूचना विवरण (एफआईएस) में ही भागने वाले व्यक्ति का नाम दर्ज कर लिया गया था, संभवतः अन्य लोगों द्वारा इसका खुलासा किए जाने पर। न तो सह-आरोपियों से कोई प्रकटीकरण बयान दर्ज किया गया है और न ही प्रतिवादी से एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत कोई बयान दर्ज किया गया है, क्योंकि वह गिरफ्तारी से बचता रहा। केवल इस आधार पर आरोपों को रद्द करना कि मुकदमे में इकबालिया बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता, हाईकोर्ट को प्रदत्त अंतर्निहित शक्तियों का उचित प्रयोग नहीं होगा।”
मौके पर किए गए खुलासों के कानूनी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत इकबालिया बयान या धारा 53ए के तहत प्रकटीकरण बयान का मुकदमे में कोई साक्ष्य मूल्य नहीं हो सकता और इससे दोषसिद्धि नहीं हो सकती। एनडीपीएस एक्ट की धारा 53ए सह-आरोपी के खुलासे को अदालत के समक्ष रखने की अनुमति नहीं देती, विशेषकर तब जब उसे गवाह के रूप में परीक्षित न किया गया हो या सरकारी गवाह न बनाया गया हो। मौके पर पकड़े गए सह-आरोपियों द्वारा भागने वाले व्यक्ति की पहचान और नाम के बारे में किया गया खुलासा केवल एक ऐसी सामग्री है जिसका उपयोग जांच अधिकारी आगे के सबूत जुटाने के लिए कर सकता है, जो कि विधिवत रूप से शुरू किए गए मुकदमे में आरोप पत्र या दोषसिद्धि का आधार बन सकता है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि हाईकोर्ट ने मामले में पेश की गई चार्जशीट और सबूतों को नहीं देखा और रद्द करने के चरण पर ही आरोपी की संलिप्तता तय करना समय पूर्व था।
कोर्ट का निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के तरीके को अनुचित ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की अपील स्वीकार कर ली और विवादित आदेश को निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने उडुपी के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा विशेष अदालत के समक्ष लंबित विशेष मामला संख्या 24/2022 (जो क्राइम नंबर 94/2018 के विशेष मामला संख्या 131/2019 से उद्भूत हुआ था) को फिर से बहाल कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी को आदेश दिया कि वह आज से दो सप्ताह के भीतर संबंधित विशेष अदालत के समक्ष पेश हो। अदालत में पेश होने पर विशेष अदालत उसे अपनी सुविधानुसार उचित शर्तों पर जमानत पर रिहा करेगी। यदि वह तय समय में पेश होने में विफल रहता है, तो ट्रायल कोर्ट को उसे पकड़कर अदालत में पेश कराने के लिए कानूनी कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। प्रतिवादी के पास यह विकल्प खुला रहेगा कि वह विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के समय या डिस्चार्ज (उन्मोचन) का आवेदन दाखिल करके यह तर्क दे सकता है कि जांच में उसके खिलाफ कोई अन्य आपत्तिजनक सामग्री नहीं पाई गई है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द स्टेट ऑफ कर्नाटक एवं अन्य बनाम सादिक पाशा
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4720/2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 01 अक्टूबर 2026

