हिमाचल प्रदेश उपभोक्ता आयोग ने एक महिला के 20 लाख रुपये दो महीने से अधिक समय तक बंद पड़े खाते में अटकाए रखने और एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने के मामले में दो निजी बैंकों को सेवा में गंभीर कोताही का दोषी ठहराया है। आयोग ने दोनों बैंकों को फंसी हुई पूरी राशि तत्काल वापस करने और महिला को हुई मानसिक प्रताड़ना व कानूनी खर्च के बदले 30,000 रुपये का भुगतान करने का सख्त निर्देश जारी किया है।
उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा, सदस्य आरती सूद और सदस्य नारायण ठाकुर की पीठ ने 11 सितंबर के अपने फैसले में बैंकों के इस आचरण को ‘पिंग-पॉन्ग ब्लेम गेम’ करार दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि दोनों वित्तीय संस्थानों की संस्थागत उदासीनता के चलते पीड़िता प्रशासनिक चक्रव्यूह में उलझ कर रह गई। स्पष्ट और तत्काल लिखित सूचना मिलने के बावजूद बंद हो चुके लोन खाते में राशि रोके रखना न केवल एक गंभीर परिचालन चूक है, बल्कि सेवा में स्पष्ट कमी का प्रमाण भी है।
टाइपिंग की गलती से बंद खाते में ट्रांसफर हुई रकम
विवाद की शुरुआत तब हुई जब महिला ने अपने एक निजी बैंक के बचत खाते से अपने पति को 20 लाख रुपये ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की। क्लेरिकल (टाइपिंग) त्रुटि के कारण यह रकम उसके पति के उस पर्सनल लोन खाते में चली गई, जो दूसरे निजी बैंक में था। गौर करने वाली बात यह थी कि यह लोन खाता इस लेन-देन से पहले ही पूरी तरह चुकता कर औपचारिक रूप से बंद किया जा चुका था।
गलती की जानकारी मिलते ही महिला ने 2 अप्रैल को तुरंत पति के बैंक से संपर्क साधा और लेन-देन निरस्त (रिवर्स) करने की मांग की। हालांकि, सामान्य बैंकिंग प्रोटोकॉल के तहत तुरंत रिवर्सल करने के बजाय बैंक ने प्रक्रियात्मक देरी की और 5 अप्रैल को उसे सलाह दी कि वह अपने उस बैंक से संपर्क करे जहां से पैसे भेजे गए थे। इसके बाद महिला ने 14 अप्रैल को अपने गृह बैंक में विधिवत शिकायत दर्ज कराई।
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने से गहराया नकदी संकट
महिला के बैंक ने भी समस्या का समाधान करने के बजाय गेंद वापस पति के बैंक के पाले में डाल दी और दावा किया कि रिफंड पूरी तरह लाभार्थी बैंक की मंजूरी पर निर्भर है। दोनों बैंकों द्वारा ऑटोमेटेड संदेश भेजने और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने के कारण महिला के 20 लाख रुपये दो महीने से अधिक समय तक फंसे रहे।
पूंजी अवरुद्ध होने से परिवार के सामने नकदी का गहरा संकट उत्पन्न हो गया। अपनी रोजमर्रा की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए महिला के पति को 24 अप्रैल को कंपनी के शेयर गिरवी रखकर दूसरा कर्ज लेने के लिए विवश होना पड़ा। बैंकों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये से तंग आकर महिला ने मुआवजा और मूल राशि वापसी की मांग को लेकर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
45 दिनों में जवाब न देने पर बैंकों का पक्ष खारिज
आयोग से नोटिस जारी होने के बाद दोनों बैंक कार्यवाही में उपस्थित तो हुए, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत अनिवार्य 45 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर अपना लिखित पक्ष (जवाब) दाखिल नहीं कर सके। तय समय सीमा बीत जाने के कारण आयोग ने उनका जवाब दर्ज करने का अधिकार कानूनी रूप से समाप्त कर दिया।
पीठ ने रेखांकित किया कि ‘नॉन-ट्रावर्स’ के स्थापित विधिक सिद्धांत के आधार पर, विपक्षी बैंकों द्वारा कोई लिखित खंडन पेश न किए जाने से शिकायतकर्ता के सभी दस्तावेज, साक्ष्य और घटनाक्रम निर्विवाद रूप से प्रमाणित और कानूनी तौर पर स्वीकार माने गए हैं।
मूल राशि के साथ हर्जाना और कानूनी खर्च चुकाने का आदेश
आयोग ने दोनों बैंकों को 20 लाख रुपये की पूरी रकम तत्काल प्रभाव से वापस करने का आदेश दिया। इसके अलावा, निर्धारित 30,000 रुपये के कुल हर्जाने में से दोनों बैंकों को ब्याज सहित 12,500 रुपये और पति के बैंक को अलग से ब्याज सहित 7,500 रुपये महिला को अदा करने के निर्देश दिए गए। वहीं, मुकदमेबाजी के खर्च के तौर पर दोनों बैंकों को संयुक्त और अलग-अलग रूप से 10,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया गया।

