जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने में राज्य के अधिकारियों द्वारा 31 साल से अधिक की अकारण देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार पर ₹1,00,000 का हर्जाना लगाया है। एकल पीठ की अध्यक्षता कर रहीं जस्टिस गरिमा प्रसाद ने याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मात्र 89 दिनों की समयबद्ध अस्थायी नियुक्ति से किसी कर्मचारी को नियमितीकरण, वेतन या पेंशन का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता—भले ही मामला दशकों तक अदालत में लंबित रहा हो। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी दो टूक कहा कि तीन दशकों से अधिक समय तक अंतरिम आदेश के अनुपालन को अधर में लटकाए रखने की अपनी विफलता से राज्य के अधिकारी बच नहीं सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
याची उमा कांत त्रिपाठी ने वर्ष 1994 में यह रिट याचिका दाखिल कर 16 मार्च 1994 और 23 मार्च 1994 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए बहराइच डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में चतुर्थ श्रेणी पद (“सहयोगी”) पर उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई थी और उन्हें सेवा से कार्यमुक्त कर दिया गया था। याची ने वेतन और एरियर के साथ सेवा में बने रहने की भी मांग की थी। हालांकि, याचिका में शुरुआत में को-ऑपरेटिव बैंक्स सेंट्रलाइज्ड सर्विस रूल्स, 1976 के नियम 7 और उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव सोसाइटीज एम्प्लॉइज सर्विस रेगुलेशंस, 1975 के रेगुलेशन 17(डी) की वैधता को भी चुनौती दी गई थी, लेकिन दिसंबर 2024 में उस चुनौती पर दबाव न डालते हुए उसे वापस ले लिया गया था।
याची को पहली बार 7 सितंबर 1993 को एक आदेश के जरिए ‘सहयोगी’ पद पर नियुक्त किया गया था और इसके बाद 22 दिसंबर 1993 को दूसरा नियुक्ति आदेश जारी हुआ। दोनों ही नियुक्ति आदेशों में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि यह नियुक्ति पूरी तरह अस्थायी है, जिसकी अवधि किसी भी स्थिति में 89 दिनों से अधिक नहीं होगी, इसे बिना किसी पूर्व सूचना के समाप्त किया जा सकता है और यह नियमित चयन प्रक्रिया द्वारा पद भरे जाने के अधीन रहेगी। याची का कहना था कि उसकी नियुक्ति प्रबंध समिति के विधिवत प्रस्ताव और चयन के आधार पर हुई थी और वह मार्च 1994 में हटाए जाने तक काम करता रहा।
दूसरी ओर, बैंक और राज्य के अधिकारियों ने नियुक्ति की वैधता को ही नकार दिया। उनका कहना था कि 22 दिसंबर 1993 को तत्कालीन सचिव/महाप्रबंधक के निधन के बाद बैंक के चेयरमैन ने जूनियर ब्रांच मैनेजर राधा मोहन सिंह को केवल कार्यालय के दैनिक कामकाज की देखरेख के लिए अधिकृत किया था। सिंह न तो सेंट्रलाइज्ड सर्विस के सदस्य थे और न ही उनके पास नियुक्तियां करने का वैधानिक अधिकार था। इसके बाद उप-निबंधक (डिप्टी रजिस्ट्रार), सहकारी समितियां ने उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 की धारा 128 के तहत मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस अनाधिकृत प्रभार और उसके तहत जारी नियुक्ति आदेशों को रद्द कर दिया, जिसके आधार पर बैंक ने त्रिपाठी को कार्यमुक्त किया।
हाईकोर्ट ने 2 मई 1994 को एक अंतरिम आदेश पारित कर रद्दीकरण आदेश को स्थगित (अबेयंस) रखा था और अधिकारियों को निर्देश दिया था कि याची को काम करने दिया जाए तथा उसे वेतन का भुगतान किया जाए। हालांकि, नवंबर 2017 में दाखिल अपने पूरक हलफनामे में याची ने बताया कि इस अंतरिम आदेश का कभी पालन नहीं किया गया और मार्च 1994 के बाद उसे न तो काम करने दिया गया और न ही कोई वेतन दिया गया।
पक्षों की दलीलें
याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रबंध समिति सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी थी और उसने ही याची का चयन किया था, जबकि राधा मोहन सिंह ने केवल समिति के फैसले के क्रियान्वयन में औपचारिक आदेश जारी किया था। उन्होंने यह भी दलील दी कि 1965 के अधिनियम की धारा 128 के तहत नियुक्ति रद्द करने से पहले उप-निबंधक ने प्रबंध समिति को पुनर्विचार का वैधानिक अवसर नहीं दिया और न ही याची को सुनवाई का कोई मौका दिया गया।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह नियुक्ति बिना किसी खुली चयन प्रक्रिया के ऐसे अधिकारी द्वारा की गई थी जिसे नियुक्ति का कोई अधिकार ही नहीं था। इसके अलावा, जब नियुक्ति आदेश में ही अवधि 89 दिनों तक सीमित थी, तो याची को सेवा में बने रहने या नियमितीकरण की मांग करने का कोई विधिक अधिकार नहीं बनता। प्रतिवादियों ने कहा कि जो नियुक्ति शुरू से ही शून्य (वॉयड एब इनिशियो) हो, उसे बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के रद्द किया जा सकता है और इससे किसी वेतन या सेवा लाभ का अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
नियुक्ति की शर्तों की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि नियुक्ति आदेशों के जरिए याची को कभी भी मूल (सब्सटेंटिव) रूप से नियुक्त नहीं किया गया था। जस्टिस गरिमा प्रसाद ने स्पष्ट किया:
“यह दावा कि बाद में किसी नियमित रूप से चयनित उम्मीदवार ने पद ग्रहण नहीं किया, स्वीकार किए जाने पर भी एक समयबद्ध अस्थायी नियुक्ति को स्थायी नियुक्ति में परिवर्तित नहीं कर देगा। इसलिए, निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद याची को सेवा में बने रहने का कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।”
धारा 128 के प्रक्रियात्मक उल्लंघन के दावे पर अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि उप-निबंधक ने समिति को निर्णय पर पुनर्विचार के लिए कहा था। लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि केवल इस प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर याची को मूल अनुतोष नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले भारतीय सेवा समाज ट्रस्ट बनाम योगेशभाई अंबालाल पटेल (2012) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:
“सर्टिओरारी (उत्प्रेषण) रिट जारी करने का अधिकार क्षेत्र विवेकाधीन है। ऐसी रिट वहां जारी करने की आवश्यकता नहीं है, जहां आक्षेपित कार्रवाई को रद्द करने का परिणाम केवल एक ऐसी नियुक्ति को बहाल करना होगा जिसे कानूनन बरकरार नहीं रखा जा सकता या जो समय बीतने के साथ पहले ही समाप्त हो चुकी थी।”
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रघुवर पाल सिंह (2018) का भी उल्लेख किया, जिसमें व्यवस्था दी गई थी कि सक्षम प्राधिकारी या आवश्यक अनुमोदन के बिना की गई नियुक्ति शून्य होती है और सुनवाई का अवसर न मिलना स्वतः उसकी बहाली का आधार नहीं बनता। अदालत ने हालांकि इस तकनीकी विवाद में जाने से परहेज किया कि नियुक्ति शुरू से शून्य थी या नहीं, बल्कि इस स्पष्ट आधार पर निर्णय दिया कि अस्थायी 89 दिनों का कार्यकाल बहुत पहले ही समाप्त हो चुका था।
2 मई 1994 के अंतरिम आदेश पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि अधिकारियों द्वारा याची को काम न करने देना असंतोषजनक था, फिर भी अंतरिम आदेश रोजगार की मूल शर्तों को नहीं बदल सकता:
“फिर भी, अंतरिम आदेश का उद्देश्य अंतिम निर्णय होने तक कार्यवाही की विषय-वस्तु को सुरक्षित रखना होता है। यह ऐसा कोई मूल अधिकार उत्पन्न या विस्तृत नहीं कर सकता जो याची के पास पहले से मौजूद न रहा हो।”
पीठ ने रेखांकित किया कि याची ने मार्च 1994 के बाद कोई काम नहीं किया और वर्ष 1994 से 2017 के बीच उसने अंतरिम आदेश को लागू कराने के लिए कोई कानूनी कदम उठाया हो, ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। इसके अतिरिक्त, उसकी जन्मतिथि (21 अप्रैल 1966) के आधार पर वह 20 अप्रैल 2026 को ही अधिवर्षिता (रिटायरमेंट) की आयु भी पूरी कर चुका है। वित्तीय दावों को खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“केवल इसलिए कि रिट याचिका लंबित रही, 89 दिनों तक सीमित नियुक्ति सेवानिवृत्ति की तिथि तक वेतन, पेंशन या अन्य सेवा लाभों के दावे का आधार नहीं बन सकती।”
फैसला और हर्जाने का आदेश
अदालत ने रिट याचिका को मेरिट पर खारिज कर दिया और अंतरिम आदेश को निष्प्रभावी घोषित कर दिया, लेकिन 31 साल की संस्थागत लापरवाही के लिए राज्य सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया। अदालत ने कहा कि 2 मई 1994 को नोटिस स्वीकार किए जाने और 6 सप्ताह में जवाबी हलफनामा मांगने के बावजूद अधिकारियों ने वर्ष 2025 में कोर्ट के कड़े रुख के बाद ही अपना जवाब दाखिल किया।
तीन दशकों से अधिक की इस लंबी देरी का कोई कारण न बताए जाने और अंतरिम आदेश के गैर-अनुपालन की जानकारी कोर्ट से छिपाए रखने पर जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा:
“राज्य केवल इसलिए इस चूक की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता क्योंकि याची अपना मूल दावा साबित करने में विफल रहा है। इस लंबी देरी ने अदालत को संबंधित अधिकारियों से समय पर मिलने वाली कानूनी सहायता से वंचित रखा और अंतरिम आदेश के अनुपालन का मुद्दा तब तक अनसुलझा बना रहा जब तक कि याची अधिवर्षिता (रिटायरमेंट) की आयु पार नहीं कर गया। इसलिए, याची हर्जाने के माध्यम से क्षतिपूर्ति पाने का हकदार है, हालांकि सेवा लाभों के माध्यम से नहीं, जिनके लिए उसने कोई कानूनी अधिकार स्थापित नहीं किया है।”
इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य पर ₹1,00,000 का हर्जाना लगाया और संबंधित अधिकारियों (विपक्षी संख्या 3 और 4) को निर्देश दिया कि वे फैसले की तारीख से छह सप्ताह के भीतर इस राशि का भुगतान याची को सुनिश्चित करें।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: उमा कांत त्रिपाठी बनाम सी/एम बहराइच को-ऑप बैंक लिमिटेड
वाद संख्या: रिट-ए संख्या 2291/1994
पीठ: जस्टिस गरिमा प्रसाद
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर, 2026

