धारा 41ए सीआरपीसी या धारा 35 बीएनएसएस के तहत नोटिस जारी होना उसी मामले में प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश में बाधा नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में जांच अधिकारी द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41ए या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35 के तहत उपस्थिति का नोटिस जारी करने से डिटेनिंग अथॉरिटी (निवारक निरोध प्राधिकारी) पर उसी मामले के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) का आदेश पारित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं लगती। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी से छूट देने का जांच अधिकारी का निर्णय और लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला कलेक्टर की व्यक्तिगत संतुष्टि (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन), दोनों बिल्कुल अलग-अलग वैधानिक दायरे में काम करते हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने अन्य कानूनी आधारों पर बंदी के खिलाफ जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने पुराने मामलों में मिली सशर्त जमानत और एक मामले में बरी होने के तथ्य पर विचार नहीं किया था, साथ ही पुरानी घटनाओं और डिटेंशन आदेश के बीच का तात्कालिक संबंध (लाइव लिंक) भी समाप्त हो चुका था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चिंताला हिमावती ने अपने पति चिंताला भूपति (बंदी) के खिलाफ 11 दिसंबर 2025 को पारित प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी। जिला मजिस्ट्रेट ने बंदी को ‘आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, डकैत्स, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडास, इम्मोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986’ की धारा 2(जी) के तहत ‘गुंडा’ घोषित करते हुए निरुद्ध किया था। इस आदेश की पुष्टि राज्य सरकार के मुख्य सचिव द्वारा 4 फरवरी 2026 को की गई थी।

प्रिवेंटिव डिटेंशन का यह आदेश बंदी के खिलाफ दर्ज तीन आपराधिक मामलों पर आधारित था:

  1. नवाबपेट पुलिस स्टेशन: क्राइम नंबर 350/2018 (आईपीसी की धारा 302, 120(बी), 143, 147, 148 सपठित धारा 149 तथा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(va) और 3(2)(v))।
  2. कोदावलुर पुलिस स्टेशन: क्राइम नंबर 134/2024 (बीएनएस की धारा 191(2), 191(3), 103(1), 61(2), 351(3), 126(2), 324(4), 49 सपठित धारा 190, आर्म्स एक्ट की धारा 25 व 27(1) तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v))।
  3. मुत्तुकुर पुलिस स्टेशन: क्राइम नंबर 197/2025 (बीएनएस की धारा 126(2), 115(2), 351(2) सपठित धारा 3(5))।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने तीसरे आधार (वर्ष 2025 का मामला) पर विशेष जोर देते हुए कहा कि पुलिस ने बंदी को बीएनएसएस की धारा 35(3) (जो सीआरपीसी की धारा 41ए के समान है) के तहत पेशी का नोटिस जारी किया था। उन्होंने तर्क दिया कि बीएनएसएस की धारा 35(1)(b)(ii)(a) और सीआरपीसी की धारा 41(1)(b)(ii)(a) के तहत गिरफ्तारी की जगह नोटिस तभी जारी किया जाता है जब जांच अधिकारी संतुष्ट हो कि आरोपी को आगे कोई अपराध करने से रोकने के लिए गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि जब प्रिवेंटिव डिटेंशन का उद्देश्य भी आगे के अपराधों को रोकना ही है, तो पुलिस के इस निष्कर्ष के विपरीत जाकर डिटेनिंग अथॉरिटी उसी मामले में नजरबंदी का आदेश नहीं दे सकती।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि आधार संख्या 1 (वर्ष 2018 का मामला) में बंदी को पहले जमानत मिली थी और बाद में 2 दिसंबर 2025 को विशेष अदालत (एससी/एसटी मामलात)-सह-पंचम अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश, नेल्लोर द्वारा सत्र वाद संख्या 72/2020 में उसे बरी कर दिया गया था। इसके बावजूद डिटेनिंग अथॉरिटी ने गलत तरीके से रिकॉर्ड किया कि मुकदमा अभी लंबित है और बरी होने के तथ्य पर कोई विचार नहीं किया। इसी तरह आधार संख्या 2 में 2 जनवरी 2025 को सशर्त जमानत दी गई थी, लेकिन अथॉरिटी ने केवल जमानत मिलने का जिक्र किया और उन शर्तों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने दलील दी कि 2018 और 2024 के मामलों से डिटेंशन आदेश का कोई सीधा और तात्कालिक संबंध नहीं बचा था और तेलुगु भाषी बंदी को अंग्रेजी में दस्तावेज सौंपकर संविधान के अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन किया गया।

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दूसरी ओर, सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि धारा 35 बीएनएसएस के तहत नोटिस जारी करना अर्नेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का वैधानिक पालन मात्र था, जो जांच के दौरान गिरफ्तारी को नियंत्रित करता है। इससे लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश जारी करने के प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ता। पेसाला नूकाराजू बनाम आंध्र प्रदेश सरकार का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरोपमुक्त होने या बरी होने के बाद भी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आदेश में जमानत का उल्लेख करना यह दर्शाता है कि उस पर विचार किया गया था और सभी दस्तावेज क्षेत्रीय भाषा (तेलुगु) में उपलब्ध कराए गए थे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण: धारा 41ए सीआरपीसी / धारा 35 बीएनएसएस प्रिवेंटिव डिटेंशन में रुकावट नहीं

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि धारा 41ए सीआरपीसी या धारा 35 बीएनएसएस के तहत नोटिस जारी होने पर उसी मामले के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं दिया जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिताओं और प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनों के तहत शक्तियां अलग-अलग अधिकारियों में निहित हैं और दोनों के उद्देश्य भी पूरी तरह भिन्न हैं:

“सीआरपीसी या बीएनएसएस के तहत गिरफ्तारी जरूरी न होने की संतुष्टि पर पुलिस अधिकारी द्वारा लिया गया निर्णय, 1986 के अधिनियम के तहत डिटेनिंग अथॉरिटी की व्यक्तिगत संतुष्टि से पूरी तरह अलग है। दोनों कानूनों के तहत प्राधिकारी भी अलग हैं। सीआरपीसी/बीएनएसएस में यह पुलिस अधिकारी है, जबकि 1986 के अधिनियम के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए यह जिला कलेक्टर है। कानून में यह जरूरी नहीं है कि अलग-अलग कानूनों के तहत एक प्राधिकारी की संतुष्टि वही हो जो दूसरे प्राधिकारी की है।”

न्यायालय ने दोनों जांचों के भिन्न कार्यक्षेत्र पर प्रकाश डालते हुए कहा:

“चूंकि व्यक्तिगत संतुष्टि अलग-अलग सामग्री पर आधारित होती है, अलग-अलग प्राधिकारियों की होती है और अलग-अलग विचारों पर अलग उद्देश्यों के लिए होती है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि धारा 35 के तहत आरोपी को गिरफ्तार न करने और केवल नोटिस जारी करने को लेकर पुलिस अधिकारी द्वारा बनाई गई संतुष्टि ही डिटेनिंग अथॉरिटी की भी संतुष्टि होनी चाहिए, या फिर डिटेनिंग अथॉरिटी अपनी स्वतंत्र संतुष्टि पर नहीं पहुंच सकती।”

हाईकोर्ट ने आगे समझाया कि धारा 41ए सीआरपीसी और धारा 35 बीएनएसएस का उद्देश्य व्यक्तिगत अपराधों की जांच के दौरान पुलिस हिरासत को नियंत्रित करना है, जबकि प्रिवेंटिव डिटेंशन का उद्देश्य सार्वजनिक शांति और लोक व्यवस्था की रक्षा करना है:

“धारा 41ए सीआरपीसी / धारा 35 बीएनएसएस का सहारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले जांच अधिकारी द्वारा लिया जाता है और यह प्रावधान किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की जांच अधिकारी की शक्ति को नियंत्रित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य अपराध की जांच के लिए हिरासत में पूछताछ करना है, यदि जांच अधिकारी धारा 35(3) बीएनएसएस / धारा 41ए सीआरपीसी के तहत संतुष्ट होता है, अन्यथा नहीं। गिरफ्तारी केवल जांच को सुगम बनाने के सीमित उद्देश्य के लिए होगी, जबकि 1986 के प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का उद्देश्य लोक व्यवस्था बनाए रखना है।”

यह रेखांकित करते हुए कि प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश जमानत मिलने के बावजूद और बरी होने के बाद भी दिया जा सकता है, पीठ ने टिप्पणी की:

“…जब प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून के तहत जमानत आदेशों के बावजूद या डिस्चार्ज अथवा बरी होने के बाद भी कानून के अनुसार डिटेनिंग अथॉरिटी की वैधानिक संतुष्टि पर आदेश पारित किया जा सकता है, तो यह नहीं माना जा सकता कि जिस आपराधिक मामले में धारा 41 व 41ए सीआरपीसी / धारा 35 बीएनएसएस के तहत नोटिस देकर आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया, उस आपराधिक मामले को प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश पारित करने के लिए ध्यान में नहीं रखा जा सकता।”

हाईकोर्ट का विश्लेषण: जमानत की शर्तों और बरी होने के तथ्य पर विचार न करना

धारा 41ए सीआरपीसी पर याचिकाकर्ता की दलील खारिज करने के बावजूद हाईकोर्ट ने माना कि डिटेंशन आदेश आधार संख्या 1 और 2 के संबंध में कानूनन टिकने योग्य नहीं है, क्योंकि डिटेनिंग अथॉरिटी ने जमानत की शर्तों और बरी होने के फैसले का वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया।

पीठ ने कहा कि आदेश में केवल यह लिख देना कि जमानत मिल गई है, कानूनी अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता:

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“जमानत दिए जाने का उल्लेख केवल एक तथ्य के रूप में किया गया है। प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश से यह स्पष्ट रूप से झलकना चाहिए कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने जमानत की उन शर्तों पर विचार किया था और फिर अपने समक्ष मौजूद सामग्री के आधार पर इस संतुष्टि पर पहुंची कि जमानत की शर्तों के बावजूद बंदी को हिरासत में लेना आवश्यक था।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य और रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य के फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि जमानत के आदेश अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री हैं जिन्हें डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष रखा जाना और उन पर विचार किया जाना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के जॉय किट्टी जोसेफ बनाम भारत संघ निर्णय पर भरोसा करते हुए पीठ ने कहा कि यदि किसी सक्षम अदालत ने सशर्त जमानत दी है, तो प्राधिकारी को यह देखना चाहिए कि क्या वे शर्तें बंदी को आगे अपराध करने से रोकने के लिए पर्याप्त थीं। हाईकोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का भी उल्लेख किया, जिसमें जमानत आदेशों पर विचार न करने को व्यक्तिगत संतुष्टि को दूषित करने वाला माना गया था।

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पेसाला नूकाराजू मामले पर सरकार के तर्क की विवेचना करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि बरी होने के बाद भी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जा सकता है, लेकिन ऐसा बरी होने के तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता:

“हालांकि, हमारा यह विचार है कि भले ही बरी होने के बाद भी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश पारित किया जा सकता है, लेकिन निश्चित रूप से इसे बरी किए जाने के तथ्य को ध्यान में रखे बिना पारित नहीं किया जा सकता। वर्तमान मामले में डिटेनिंग अथॉरिटी को आधार संख्या 1 वाले आपराधिक मामले में बंदी के बरी होने की जानकारी ही नहीं थी। दर्ज की गई संतुष्टि आधार संख्या 1 के मामले में बरी होने के महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार किए बिना है, जिसे प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश का आधार भी बनाया गया है।”

घटनाओं और डिटेंशन के बीच ‘लाइव लिंक’ का अभाव

पीठ ने आगे पाया कि पूर्व की आपराधिक घटनाओं और डिटेंशन आदेश के बीच का आवश्यक तार्किक संबंध (लाइव लिंक) टूट चुका था।

सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद शहाबुद्दीन बनाम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, 24 परगना, राजिंदर अरोड़ा बनाम भारत संघ और टी.ए. अब्दुल रहमान बनाम केरल राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि कथित आपराधिक घटनाओं और डिटेंशन आदेश के बीच बिना किसी स्पष्टीकरण के लंबा विलंब दोनों के बीच के तार्किक संबंध को समाप्त कर देता है। प्राधिकारी ने 2018 और 2024 के मामलों पर भरोसा तो किया, लेकिन यह नहीं दर्शाया कि दिसंबर 2025 में आदेश पारित करते समय उनका तात्कालिक संबंध कैसे बना हुआ था। शिव प्रसाद भटनागर बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि “एक भी दूषित आधार डिटेंशन के पूरे आदेश को अमान्य करने के लिए पर्याप्त है।” अदालत ने प्रमोद सिंगला बनाम भारत संघ का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 21 और 22(5) के तहत प्रक्रियात्मक खामियों का लाभ हमेशा बंदी को मिलना चाहिए।

अदालत का फैसला

इन सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि महत्वपूर्ण सामग्रियों पर विचार न करने और तात्कालिक संबंध के अभाव के कारण डिटेनिंग अथॉरिटी की व्यक्तिगत संतुष्टि दूषित हो गई थी। इसलिए अदालत ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 11 दिसंबर 2025 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और 4 फरवरी 2026 के पुष्टिकरण आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

साथ ही, हाईकोर्ट ने डिटेनिंग अथॉरिटी को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने की छूट दी, बशर्ते कि कुल नजरबंदी की अवधि कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक न हो।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: चिंताला हिमावती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या: 36444 / 2025
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी
निर्णय की तिथि: .09.2026

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