दिल्ली हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को रेप के आरोप से बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से रेप की प्रबल संभावना जरूर सामने आती है, लेकिन पीड़िता की मृत्यु के कारण उसके बयान की अदालत में पुष्टि नहीं हो सकी।
जस्टिस विमल कुमार यादव राज्य सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 2009 में आरोपी को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने पीड़िता द्वारा पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयानों, उसके सुसाइड नोट, मेडिकल साक्ष्यों और परिवार के सदस्यों की गवाही पर विचार किया।
मामला मई 2006 में दिल्ली की एक झुग्गी में हुई कथित घटना से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी पीड़िता का पड़ोसी था। आरोप था कि जब युवती घर में अकेली थी, तब आरोपी झुग्गी में घुसा, दरवाजा बंद किया और उसके साथ रेप किया।
युवती ने उसी रात अपने भाई को घटना के बारे में बताया, जिसके बाद रेप का मामला दर्ज किया गया। बाद में मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज हुआ और उसका मेडिकल परीक्षण भी कराया गया।
हालांकि, कथित घटना के करीब तीन महीने बाद और अदालत में गवाही देने से पहले युवती ने अपनी जान दे दी। उसके सुसाइड नोट में कहा गया था कि उसने घटना के कारण हुई शर्म की वजह से यह कदम उठाया।
महिलाओं, खासकर युवा लड़कियों की स्थिति पर अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि समाज में महिलाएं, विशेष रूप से युवा लड़कियां, बेहद संवेदनशील स्थिति में होती हैं और कई बार उनके लिए पड़ोसियों या रिश्तेदारों तक पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि वही लोग उनकी कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं।
अदालत ने कहा कि रेप केवल शारीरिक उल्लंघन तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसका असर पीड़िता के मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंच सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कई जगहों पर रेप पीड़िता को सहानुभूति और समर्थन मिलने के बजाय सामाजिक कलंक, बहिष्कार और उसके चरित्र पर सवालों का सामना करना पड़ता है।
अदालत के अनुसार, यदि परिवार, मेडिकल, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर सहायता उपलब्ध न हो, तो पीड़िता का जीवन बेहद कठिन हो सकता है और वह कानूनी रास्ता अपनाने से भी पीछे हट सकती है।
28 सितंबर के आदेश में अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी यौन अपराध की घटना को बार-बार पुलिस, अदालत और फिर जिरह के दौरान दोहराना पीड़िता के लिए गहरे मानसिक आघात का कारण बन सकता है।
ट्रायल कोर्ट ने 2009 में किया था बरी
ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के 18 गवाहों का बयान दर्ज करने के बाद 2009 में आरोपी को बरी कर दिया था।
राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान, सुसाइड नोट, मेडिकल साक्ष्य और परिवार के सदस्यों की गवाही अभियोजन के मामले को साबित करने के लिए पर्याप्त थे।
दूसरी ओर, आरोपी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही ट्रायल कोर्ट के सामने उपलब्ध नहीं थी। उसने अन्य साक्ष्यों में विरोधाभास होने और अपने खिलाफ किसी निर्णायक वैज्ञानिक साक्ष्य के अभाव का भी तर्क दिया।
रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सामग्री पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में रेप की प्रबल संभावना जरूर सामने आती है, लेकिन पीड़िता की मृत्यु के कारण उसके आरोपों की पर्याप्त पुष्टि नहीं हो सकी। इस आधार पर अदालत ने आरोपी को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

