श्रीनगर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जनता को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के नाम पर सरकार निजी संपत्ति के अधिकारों को दरकिनार नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों तक पीने का पानी पहुंचाना सरकार का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इसके लिए किसी निजी भूस्वामी को बिना कानूनी प्रक्रिया और उचित मुआवजे के अपनी जमीन का बोझ उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने 29 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए रेखांकित किया कि पानी पाने का अधिकार और संपत्ति का अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों की एक साथ हिफाजत की जानी चाहिए।
पानी और संपत्ति के अधिकार में संतुलन जरूरी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार पर आम जनता को पानी उपलब्ध कराने की स्पष्ट जिम्मेदारी है, क्योंकि यह जीवन के अधिकार और मानवीय गरिमा से जुड़ी अनिवार्य सार्वजनिक आवश्यकता है। इसके बावजूद, सार्वजनिक हित साधने के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि भूस्वामी को कानून के अधिकार और निर्धारित वैधानिक ढांचे के तहत मिलने वाले उचित मुआवजे से वंचित न किया जाए।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जनहित और व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकारों के बीच संतुलन साधना अनिवार्य है।
दशकों पुरानी पाइपलाइन का सरकारी तर्क खारिज
यह विवाद पट्टन तहसील के मौजा देवर में स्थित 10 कनाल 16 मरला जमीन से जुड़ा है, जिसकी मालकिन दो महिलाएं हैं। जन स्वास्थ्य अभियंत्रण (पीएचई) विभाग ने आसपास के गांवों में पेयजल आपूर्ति के लिए इस निजी जमीन से होकर पाइपलाइनें बिछाई थीं और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए कंक्रीट के ढांचे भी बनाए थे।
विभाग की दलील थी कि यह पाइपलाइन कई दशक पहले बिछाई गई थी, जब जमीन पूरी तरह खाली थी। सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह संपत्ति 2012 में खरीदी थी, इसलिए उन्हें पाइपलाइनों की मौजूदगी की जानकारी पहले से होनी चाहिए थी। विभाग का यह भी दावा था कि संबंधित कानून में केवल जमीन से पाइप गुजरने पर स्वतः मुआवजा देने का कोई नियम नहीं है।
जस्टिस नरगल ने विभाग के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने भले ही 2012 में जमीन खरीदी हो, लेकिन वहां पाइपलाइन आज भी मौजूद है और उसका इस्तेमाल लगातार हो रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन का ऐसा उपयोग किसी भी तरह ‘एकमुश्त’ या बीती बात नहीं माना जा सकता, बल्कि यह याचिकाकर्ताओं के संपत्ति अधिकारों में निरंतर दखल का मामला है।
2010 के जल संसाधन कानून का हवाला
हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर जल संसाधन (नियमन एवं प्रबंधन) अधिनियम, 2010 के कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि कानून सरकार को जलापूर्ति के लिए निजी या सार्वजनिक परिसरों के आर-पार या जमीन के नीचे पाइपलाइन बिछाने का अधिकार तो देता है, लेकिन यह अधिकार कुछ शर्तों और सुरक्षा उपायों से बंधा हुआ है।
कानून के तहत काम शुरू करने से कम से कम 15 दिन पहले लिखित नोटिस देना जरूरी है। इसके साथ ही पाइपलाइन जमीन के भीतर पर्याप्त गहराई में दबाई जानी चाहिए ताकि जमीन के सामान्य उपयोग में बाधा न आए। इसके अलावा, काम के दौरान होने वाले किसी भी नुकसान के लिए भूस्वामी को मुआवजा देना कानूनन अनिवार्य है।
विवाद की पृष्ठभूमि और मौके पर मौजूद ढांचा
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, पाइपलाइनों और कंक्रीट निर्माण के कारण वे अपनी जमीन का सामान्य उपयोग नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने इस मामले में सबसे पहले 26 दिसंबर 2013 को प्रशासन को प्रतिवेदन सौंपा था। इसके बाद 23 फरवरी 2018 को कानूनी मांग नोटिस भेजा गया, जिसमें पाइपलाइन हटाने, जमीन के इस्तेमाल का किराया व मुआवजा देने अथवा भूमि का विधिवत अधिग्रहण करने की मांग की गई थी।
विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक, इस जमीन से होकर 150 मिलीमीटर व्यास की एक पाइपलाइन, 100 मिलीमीटर व्यास की दो पाइपलाइनें और दो स्लुइस चैंबर बनाए गए हैं। इनमें से कुछ पाइप जमीन के नीचे हैं जबकि कुछ सतह के ऊपर हैं।
छह सप्ताह में जांच पूरी करने और छह फीसदी ब्याज का निर्देश
हाईकोर्ट ने खुद मुआवजे या नुकसान की राशि तय न करते हुए पीएचई विभाग, कश्मीर के चीफ इंजीनियर को दो सप्ताह के भीतर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है।
यह समिति मौके पर जाकर भौतिक निरीक्षण करेगी, राजस्व और विभागीय दस्तावेजों की पड़ताल करेगी, पाइपलाइन व निर्माण द्वारा घेरे गए वास्तविक रकबे का निर्धारण करेगी और जमीन को पहुंचे नुकसान का आकलन करेगी। इस प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ताओं या उनके अधिकृत प्रतिनिधि को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि प्रशासन इस जमीन के जरिए जलापूर्ति नेटवर्क जारी रखना चाहता है, तो याचिकाकर्ताओं को जमीन खरीदने की तारीख (2012) से उचित किराया या उपयोग शुल्क देने पर विचार करना होगा। वहीं, यदि विभाग इस जमीन को स्थायी रूप से अपने पास रखना चाहता है, तो उसे कानूनी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
यह पूरी प्रक्रिया समिति बनने के छह सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी। हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि तय समयसीमा के भीतर निर्धारित राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देना होगा।

