ग्राम न्यायालय के घरेलू हिंसा आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में रिवीजन नहीं, सेशन कोर्ट में अपील ही वैधानिक उपाय: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत ग्राम न्यायालय द्वारा पारित किसी भी आदेश के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में पीड़ित या व्यथित पक्षकार के पास कानूनन सेशन कोर्ट के समक्ष अपील दाखिल करने का ही वैधानिक विकल्प उपलब्ध है। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम और ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 दोनों के तहत सेशन कोर्ट में अपील का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है। इसके साथ ही अदालत ने ग्राम न्यायालय द्वारा पत्नी के पक्ष में पारित एकतरफा (एक्स-पार्टी) भरण-पोषण और संरक्षण आदेश के खिलाफ पति की ओर से दाखिल आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया और उसे सक्षम अपीलीय अदालत में जाने की छूट दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गोरखपुर जिले के चौरी चौरा थाना क्षेत्र में घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत पत्नी द्वारा पति और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के विरुद्ध दायर परिवाद (शिकायत संख्या 448/2023) से जुड़ा है।

ग्राम न्यायालय, तहसील चौरी चौरा, गोरखपुर के न्यायाधिकारी ने 19 मई 2026 को इस मामले में एकतरफा अंतिम आदेश पारित करते हुए पत्नी को अधिनियम की धारा 18, 19, 20 और 22 के तहत कई अनुतोष प्रदान किए थे। अदालत ने विपक्षीगण को किसी भी तरह की घरेलू हिंसा करने या उसके लिए उकसाने से प्रतिबंधित किया था। साथ ही, पति को निर्देश दिया था कि वह पत्नी को उसी स्तर की वैकल्पिक आवासीय सुविधा उपलब्ध कराए, जैसी उसने साझे गृहस्थी में उपयोग की थी, और उसके निवास अधिकार में कोई बाधा न डाले। इसके अलावा, अदालत ने पति को आदेश दिया था कि वह परिवाद दायर करने की तिथि से हर महीने की 15 तारीख को 4,000 रुपये मासिक भरण-पोषण दे तथा मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक प्रताड़ना की क्षतिपूर्ति के तौर पर 25,000 रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे। संबंधित थाना प्रभारी को इस आदेश के अनुपालन और पीड़िता को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश भी दिए गए थे।

ग्राम न्यायालय के इस एकतरफा आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और आपराधिक रिवीजन याचिका दायर की। याचिका दाखिल करने में 12 दिन का विलंब हुआ था, जिसके लिए विलंब माफी का प्रार्थना पत्र दिया गया था। हाईकोर्ट ने हलफनामे में दिए गए कारणों को पर्याप्त मानते हुए विलंब को माफ कर दिया।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

रिवीजनकर्ता (पति) के अधिवक्ता श्री विवेकानंद यादव ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि ग्राम न्यायालय द्वारा 19 मई 2026 को पारित एकतरफा आदेश को निरस्त किया जाए, उसके प्रभाव और क्रियान्वयन पर रोक लगाई जाए तथा मामले को नए सिरे से विचार के लिए ग्राम न्यायालय को वापस (रिमांड) भेजा जाए। उन्होंने दलील दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति और गंभीर नुकसान उठाना पड़ेगा।

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इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) श्री पंकज कुमार ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए इसका विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए किसी भी आदेश के विरुद्ध अधिनियम की धारा 29 के तहत सेशन कोर्ट में अपील करने का स्पष्ट प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 33(3) का उल्लेख करते हुए बताया कि ग्राम न्यायालय के किसी भी आदेश, निर्णय या दंडादेश के विरुद्ध भी अपील सेशन कोर्ट में ही होती है।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और पूर्व नज़ीर

हाईकोर्ट ने दोनों कानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन किया।

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घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 29 स्पष्ट करती है: “29. अपील- मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए आदेश के व्यथित व्यक्ति या प्रत्यर्थी, जैसा भी मामला हो, पर तामील होने की तिथि से तीस दिनों के भीतर सेशन कोर्ट में अपील होगी।”

इसी तरह, ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 33(3) में प्रावधान है: “(3) उपधारा (2) के अधीन रहते हुए, ग्राम न्यायालय के किसी अन्य निर्णय, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध सेशन कोर्ट में अपील होगी।”

कानूनी स्थिति को और पुख्ता करने के लिए जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की पूर्ण पीठ (फुल बेंच) द्वारा दिनेश कुमार यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2016) के मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। पूर्ण पीठ ने माना था:

“23. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 397 के तहत ‘हाईकोर्ट या कोई सेशन जज किसी अधीनस्थ आपराधिक न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के रिकॉर्ड को तलब कर उसकी जांच कर सकता है…’। सेशन कोर्ट हाईकोर्ट के अधीनस्थ अदालत है, इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। इस प्रकार, सेशन कोर्ट—जिसके समक्ष 2005 के अधिनियम की धारा 29 के तहत अपील का प्रावधान किया गया है—हाईकोर्ट के अधीनस्थ एक आपराधिक न्यायालय है, और इसलिए धारा 29 के तहत उसके द्वारा पारित आदेश के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 397 के तहत हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल होगी। सीआरपीसी की धारा 401, धारा 397 की पूरक है।”

पूर्ण पीठ ने आगे यह भी स्पष्ट किया था: “23.2 उपरोक्त के आलोक में, चूंकि 2005 के अधिनियम की धारा 29 के तहत सेशन कोर्ट के समक्ष अपील का उपाय प्रदान किया गया है—जिसका अर्थ सीआरपीसी की धारा 6 (पठित धारा 7 और 9) के तहत संदर्भित सेशन कोर्ट है—बिना ऐसी अपील में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में कुछ और कहे, और 2005 के अधिनियम में ऐसा कुछ भी विपरीत नहीं है जो ऐसी अपील पर सीआरपीसी के प्रावधानों को लागू करने से रोकता हो, इसलिए सेशन कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और आदेश के खिलाफ सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट में उपलब्ध अपील और रिवीजन के सामान्य उपाय, 2005 के अधिनियम की धारा 29 के तहत अपील में पारित आदेश के खिलाफ उपलब्ध हैं।”

अदालत का निर्णय

संवैधानिक और वैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“उपर्युक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, रिवीजनकर्ता के पास उपलब्ध वैधानिक उपाय यह है कि वह 19.05.2026 के आक्षेपित एकतरफा आदेश के विरुद्ध घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 29 तथा ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 33 के तहत अपील दायर करे।”

अदालत ने माना कि सीधे हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल करना प्रक्रियात्मक रूप से उचित नहीं है। तदनुसार, हाईकोर्ट ने आपराधिक रिवीजन याचिका खारिज कर दी, हालांकि रिवीजनकर्ता को कानून के अनुसार उचित मंच (सेशन कोर्ट) के समक्ष अपना वैधानिक उपाय अपनाने की पूरी छूट दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: निलेश गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 6 अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन डिफेक्टिव संख्या 1825/2026
पीठ: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि
निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026

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