केरल हाईकोर्ट ने 2018 के एक हत्या मामले की सुनवाई दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल जज अदालती कार्यवाही में सिर्फ मूकदर्शक नहीं बल्कि सच सामने लाने वाले सक्रिय भागीदार होते हैं। अदालत ने कहा कि गवाही दर्ज करने का प्रारूप जज के न्यायिक विवेक के दायरे में आता है और केवल आरोपियों की व्यक्तिगत पसंद के आधार पर मुकदमे को किसी अन्य अदालत में नहीं भेजा जा सकता।
जस्टिस सीएस डायस ने 29 सितंबर को यह फैसला सुनाया। यह याचिका 12 फरवरी 2018 की एक हिंसक घटना के आरोपियों ने दायर की थी, जिसमें गैरकानूनी रूप से जमा भीड़ ने कथित साजिश के तहत एक व्यक्ति पर जानलेवा हथियारों और विस्फोटक पदार्थों से हमला किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी।
गवाही के प्रारूप को लेकर उपजा विवाद
मामले में विवाद तब शुरू हुआ जब ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष के वकीलों का वह अनुरोध ठुकरा दिया, जिसमें एक गवाह का बयान विवरणात्मक रूप (नैरेटिव फॉर्मेट) के बजाय सवाल-जवाब के रूप में दर्ज करने की मांग की गई थी। आरोपियों की ओर से पेश वकील एस. राजीव और एमएस. अनीर का तर्क था कि गवाह सिखाया-पढ़ाया प्रतीत हो रहा है और वह रटा-रटाया बयान दे रहा है।
ट्रायल जज द्वारा इस मांग पर कोई आदेश न दिए जाने के बाद वकीलों ने औपचारिक अर्जी दाखिल की, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। इसके बाद आरोपियों ने थालाश्शेरी सेशंस कोर्ट में केस ट्रांसफर की अर्जी लगाई, लेकिन वहां भी उनकी याचिका खारिज हो गई।
साक्ष्य दर्ज करने के नियम और न्यायिक अधिकार
केस ट्रांसफर का विरोध करते हुए सरकारी वकील असफ अली टी ने दलील दी कि आरोपियों का एकमात्र मकसद सुनवाई को लटकाना है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत साक्ष्य आम तौर पर विवरणात्मक रूप में ही दर्ज किए जाते हैं, और सवाल-जवाब का प्रारूप अपनाना पूरी तरह से पीठासीन जज के विशेषाधिकार पर निर्भर करता है।
जस्टिस डायस ने सरकारी पक्ष की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि गवाह के सिखाए जाने का महज आरोप बचाव पक्ष को यह कानूनी हक नहीं देता कि वह सवाल-जवाब के प्रारूप पर अड़ जाए। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल जज के फैसले में किसी भी तरह की कानूनी त्रुटि या प्रक्रियात्मक खामी नहीं है।
मुकदमा स्थानांतरित करने के कानूनी मानकों पर बात करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक कसौटी यह नहीं है कि संबंधित आदेश कानूनी रूप से सही है या नहीं; बल्कि अदालत को यह देखना होता है कि समग्र परिस्थितियों के आधार पर निष्पक्ष सुनवाई न मिलने की आशंका वाजिब, वास्तविक और तर्कसंगत है या नहीं।
जमानत रद्द करने का घटनाक्रम और अदालत का रुख
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया था कि 25 मई को जैसे ही ट्रायल जज को केस ट्रांसफर की याचिका की जानकारी मिली, उन्होंने बिना कोई सुनवाई किए तुरंत सभी आरोपियों की जमानत रद्द कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बाद में हाईकोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगाते हुए आरोपियों को दोबारा जमानत दे दी थी।
हाईकोर्ट द्वारा पूछे जाने पर ट्रायल जज ने बताया था कि बचाव पक्ष के वकील बेवजह की आपत्तियां उठाकर कार्यवाही में बाधा डाल रहे थे और मामले को जानबूझकर लंबा खींच रहे थे, जिसकी वजह से जमानत रद्द की गई। जज ने यह भी कहा कि उन्होंने केवल गवाह को सुरक्षा का भरोसा दिलाया था ताकि वह बिना किसी भय के बयान दर्ज करा सके।
इस बिंदु पर जस्टिस डायस ने कहा कि यद्यपि अदालतों को ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना चाहिए जहां गवाह बेखौफ होकर बोल सकें, फिर भी जजों को गवाहों को बोलने के लिए प्रेरित करने से बचना चाहिए। अदालत ने चेताया कि ऐसा करने से आरोपियों के मन में यह गलत संदेश जा सकता है कि पीठ उनके खिलाफ है।
हाईकोर्ट ने प्राचीन यूनानी दार्शनिक सुकरात के उस कथन का भी उल्लेख किया जिसमें एक अच्छे जज के चार अनिवार्य गुण बताए गए हैं—विनम्रता से सुनना, बुद्धिमानी से जवाब देना, गंभीरता से विचार करना और निष्पक्षता से फैसला करना। अदालत ने कहा कि जज को सच उजागर करने के लिए सक्रिय तो रहना चाहिए, लेकिन वकीलों की भूमिका में दखल दिए बिना, किसी पक्षपात के बिना और पक्षों को डराए बिना काम करना चाहिए।
मामले को दूसरी अदालत में भेजने से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने विश्वास व्यक्त किया कि ट्रायल जज और वकील आपस के गतिरोध को दूर कर मुकदमे की सुनवाई को सुचारू रूप से आगे बढ़ाएंगे।

