इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिस बॉन्ड का वास्तव में निष्पादन (एग्जीक्यूशन) ही नहीं किया गया, उसके कथित उल्लंघन पर किसी व्यक्ति के खिलाफ रिकवरी वारंट जारी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत बॉन्ड भरने के आदेश में तय की गई राशि स्वतः वसूली योग्य देनदारी नहीं बन जाती। एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर निर्णय देते हुए जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने पति के खिलाफ जारी ₹50,000 के रिकवरी वारंट की कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत जब्ती (फोरफीचर) और वसूली की वैधानिक प्रक्रिया तभी लागू हो सकती है, जब बॉन्ड पहले से निष्पादित किया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के साथ पठित धारा 17, 18, 19 और 20 के तहत दायर शिकायत से जुड़ा है, जिसे पत्नी ने अपने पति के विरुद्ध शुरू किया था। 3 जून 2025 को गाजियाबाद के एडिशनल सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कोर्ट नंबर 5) ने पति को निर्देश दिया कि वह ₹50,000 की धनराशि का पर्सनल बॉन्ड और इस आशय की अंडरटेकिंग प्रस्तुत करे कि वह मुकदमे के लंबित रहने के दौरान पत्नी और नाबालिग बच्चे के साथ किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा नहीं करेगा।
पति ने इस आदेश के खिलाफ अधिनियम की धारा 29 के तहत गाजियाबाद की सेशंस कोर्ट (फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर 2) में अपील दाखिल की। अपीलीय अदालत ने 29 अप्रैल 2026 को अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश की पुष्टि कर दी।
इसके बाद, यद्यपि पति ने न तो बॉन्ड निष्पादित किया था और न ही कोई अंडरटेकिंग दाखिल की थी, फिर भी एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कोर्ट नंबर 6), गाजियाबाद ने 18 अगस्त 2026 को अंडरटेकिंग के कथित उल्लंघन के आधार पर उसके खिलाफ रिकवरी वारंट जारी कर दिया। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 28 दिनों की देरी को पर्याप्त कारण मानते हुए माफ कर दिया। कार्यवाही के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित मजिस्ट्रेट से यह स्पष्टीकरण और रिपोर्ट भी तलब की थी कि बॉन्ड निष्पादित न होने और उसके उल्लंघन के अभाव में क्या कानूनी रूप से रिकवरी वारंट जारी किया जा सकता है।
पक्षों की दलीलें
पति की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि याची ने आज तक कोई बॉन्ड या अंडरटेकिंग निष्पादित ही नहीं की है। ऐसी स्थिति में उसके उल्लंघन का कोई सवाल ही नहीं उठता, और जब बॉन्ड निष्पादित ही नहीं हुआ, तो उसके आधार पर रिकवरी वारंट जारी करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
इसके विपरीत, पत्नी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 19(3) और धारा 23(2) के तहत मजिस्ट्रेट को घरेलू हिंसा की आशंका होने पर प्रतिवादी से बॉन्ड निष्पादित कराने का पूरा अधिकार है। पत्नी के वकील और अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) ने यह भी दलील दी कि यद्यपि बॉन्ड के उल्लंघन के बिना रिकवरी वारंट जारी करने की कोई विशिष्ट प्रक्रिया नहीं है, लेकिन अधिनियम की धारा 28(2) अदालत को धारा 12 या 23(2) के तहत प्राप्त आवेदनों के निपटारे के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रिया तय करने की छूट देती है।
कोर्ट का विश्लेषण
वैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 19(3), 19(4) और 28(2) के साथ-साथ CrPC की धारा 446 और BNSS की धारा 491 पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 19(3) मजिस्ट्रेट को बॉन्ड भरवाने की शक्ति देती है, जबकि धारा 19(4) यह निर्धारित करती है कि ऐसा आदेश CrPC के अध्याय VIII या BNSS के अध्याय IX के तहत दिया गया आदेश माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी निष्पादित बॉन्ड का उल्लंघन होता है, तो CrPC की धारा 446 या BNSS की धारा 491 के तहत अदालत को पहले जब्ती की संतुष्टि के आधार दर्ज करने होते हैं और संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करना होता है। यदि संतोषजनक कारण नहीं बताया जाता और जुर्माना नहीं भरा जाता, तभी उस राशि को जुर्माने की तरह वसूला जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इसलिए, ऐसे मामले में जहां प्रतिवादी ने 2005 के अधिनियम की धारा 19(3) के तहत आदेश के अनुपालन में वास्तव में बॉन्ड निष्पादित किया हो और बाद में उसकी शर्तों का उल्लंघन करता हो, तो भी केवल उल्लंघन के आरोप के आधार पर बॉन्ड में उल्लिखित राशि स्वतः वसूली योग्य नहीं हो जाती।”
वर्तमान मामले के तथ्यों को भिन्न बताते हुए कोर्ट ने कहा कि यहाँ पति ने कभी पर्सनल बॉन्ड भरा ही नहीं था। इस अंतर को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:
“स्वयं बॉन्ड के निष्पादन के अभाव में, उसकी किसी भी शर्त के उल्लंघन के आधार पर ऐसे बॉन्ड को जब्त करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। 03.06.2025 के आदेश में उल्लिखित ₹50,000/- की राशि उस बॉन्ड की राशि को दर्शाती है जिसे निष्पादित किया जाना था और केवल आदेश में निर्दिष्ट होने के कारण इसे पुनरीक्षणकर्ता से स्वतः वसूली योग्य राशि नहीं माना जा सकता। फलस्वरूप, सीआरपीसी की धारा 446/बीएनएसएस की धारा 491 के तहत जब्ती और जुर्माने की वसूली से जुड़ी प्रक्रिया अनिवार्य रूप से एक निष्पादित बॉन्ड के अस्तित्व और कानून के अनुसार उसकी बाद में जब्ती की पूर्व-शर्त रखती है।”
कोर्ट ने धारा 28(2) के तहत अपनी प्रक्रिया तय करने के तर्क को भी खारिज करते हुए कहा:
“धारा 28(2) का ऐसा अर्थ नहीं निकाला जा सकता जिससे विधिवत निष्पादित किए गए बॉन्ड की जब्ती को नियंत्रित करने वाली वैधानिक आवश्यकता को समाप्त माना जाए, विशेषकर तब जब धारा 19(4) स्वयं विशेष रूप से यह प्रावधान करती है कि धारा 19(3) के तहत आदेश से सीआरपीसी के अध्याय VIII / बीएनएसएस के अध्याय IX के अनुसार निपटा जाएगा।”
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि ₹50,000 की वसूली के लिए जारी किया गया रिकवरी वारंट कानूनन टिकने योग्य नहीं है।
हाईकोर्ट का निर्णय
सुनवाई के दौरान पति के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि उनका मुवक्किल 3 जून 2025 के आदेश के अनुसार बॉन्ड और अंडरटेकिंग प्रस्तुत करने के लिए तैयार है। इस पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने पति को ₹50,000 का पर्सनल बॉन्ड और अंडरटेकिंग दाखिल करने के लिए 20 दिन का समय दिया।
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह बिना किसी अनावश्यक स्थगन के सभी पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देते हुए धारा 12 के तहत लंबित मामले को छह महीने के भीतर तेजी से निस्तारित करने का प्रयास करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बॉन्ड निष्पादित करने के बाद पति उसकी शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके परिणामों से बॉन्ड जब्ती के वैधानिक नियमों के तहत सख्ती से निपटा जाएगा। इन निर्देशों के साथ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को निस्तारित कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कपिल देव पुंडीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन डिफेक्टिव संख्या 1774/2026
पीठ: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

