सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने स्पष्ट किया है कि चेक जारीकर्ता (ड्रॉअर) के सही पते पर रजिस्टर्ड डाक द्वारा सांविधिक मांग नोटिस भेजना नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के परंतुक (बी) की अनिवार्य शर्त को पूरा करता है। यदि यह नोटिस परिवार के किसी सदस्य ने भी प्राप्त किया हो, तब भी कानूनन इसकी वैध तामील की उपधारणा मानी जाएगी। केरल हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने के आदेश को निरस्त करते हुए पीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को बहाल कर दिया। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने एम.डी. थॉमस बनाम पी.एस. जलील (2009) के अपने पुराने फैसले को बड़ी पीठ के बाध्यकारी निर्णयों की अनदेखी करने के आधार पर ‘पर इनक्यूरियम’ (अनजाने में कानूनी मिसालों की अनदेखी कर दिया गया निर्णय) घोषित कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद अपीलकर्ता-शिकायतकर्ता सैनाबा द्वारा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत दायर शिकायत से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक, रेस्पोंडेंट नंबर 2 ने शिकायतकर्ता से 3,00,000 रुपये उधार लिए थे और इस कर्ज की अदायगी के लिए कैथोलिक सीरियन बैंक, पेरुम्बावूर शाखा का चेक (चेक नंबर 479097) जारी किया था। बैंक में पेश किए जाने पर यह चेक पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने 31 अगस्त 2016 को रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से आरोपी के सही पते पर कानूनी मांग नोटिस भेजा, जिसे आरोपी की मां आमीना ने प्राप्त किया। पते पर नोटिस पहुंचने के बावजूद आरोपी ने न तो राशि का भुगतान किया और न ही कोई जवाब दिया। शिकायतकर्ता ने इसके बाद एस.टी. केस नंबर 114/2017 के तहत शिकायत दर्ज कराई। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में आरोपी ने कहा कि उसने शिकायतकर्ता से कुल 7,00,000 रुपये लिए थे और वह पूरी रकम चुका चुका है, तथा 3,00,000 रुपये लेते समय उसने एक सादा हस्ताक्षरित चेक दिया था।
ट्रायल कोर्ट ने 10 जुलाई 2019 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए 6 महीने के साधारण कारावास और 3,00,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट ने माना कि सही पते पर नोटिस भेजकर शिकायतकर्ता ने अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली थी, क्योंकि उसी पते पर अदालत से जारी समन के बाद आरोपी अदालत में उपस्थित हुआ था। अपीलीय अदालत (अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश) ने 16 फरवरी 2023 को आरोपी की अपील खारिज कर दी और माना कि पते की सत्यता पर कोई विवाद न होने की स्थिति में मां द्वारा नोटिस प्राप्त किया जाना वैध तामील है।
हालांकि, केरल हाईकोर्ट ने 29 जुलाई 2025 को रिवीजन याचिका स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का निष्कर्ष था कि नोटिस मां ने लिया था और शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी को इस नोटिस की जानकारी थी। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 दिसंबर 2025 को नोटिस तामील होने के बावजूद आरोपी की तरफ से कोई उपस्थित नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के कई स्थापित फैसलों के खिलाफ है, जिनमें सी.सी. अलावी हाजी बनाम पलापेटी मुहम्मद (2007), डी. विनोद शिवप्पा बनाम नंदा बेलियप्पा (2006), मदन एंड कंपनी बनाम वजीर जयवीर चंद (1989) और सुबोध एस. सालस्कर बनाम जयप्रकाश एम. शाह (2008) शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सही पते पर रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेजने पर जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 की धारा 27 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 के तहत नोटिस की विधिवत तामील की कानूनी उपधारणा पैदा होती है।
अपीलकर्ता ने जोर दिया कि आरोपी ने कभी अपने पते को गलत नहीं बताया, उसी पते पर जारी समन पर वह अदालत में पेश हुआ और न ही उसने अपनी मां के साथ अलग रहने या दुश्मनी का कोई दावा किया। वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के इस नजरिए से धारा 138 की प्रभावशीलता समाप्त हो जाएगी, क्योंकि बेईमान ड्रॉअर परिवार के सदस्यों के जरिए नोटिस रिसीव कराकर कानून से बच निकलेंगे। साथ ही, हाईकोर्ट ने रिवीजन अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को लांघकर दोनों निचली अदालतों के तथ्यात्मक निष्कर्षों का दोबारा मूल्यांकन करने की गलती की।
केरल राज्य की ओर से उपस्थित वकील ने कहा कि यह दो निजी पक्षों के बीच चेक बाउंस का मामला है, इसलिए राज्य इसमें कोई विरोधी पक्षकार नहीं है।
अदालत का विश्लेषण
अदालत ने एनआई एक्ट की धारा 138 के परंतुक (बी) और जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 की धारा 27 का विश्लेषण किया। धारा 27 के तहत यदि किसी दस्तावेज को सही पते पर, पूर्व-भुगतान करके रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाता है, तो कानूनन उसकी तामील मान ली जाती है।
पीठ ने वैध तामील की वैधानिक उपधारणा से जुड़े ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया:
- के. भास्करन बनाम संकरण वैद्यन बालन (1999) में अदालत ने स्पष्ट किया था कि ‘नोटिस देना’ और ‘नोटिस प्राप्त होना’ दोनों अलग पहलू हैं। सही पते पर डाक भेजने के बाद यह मान लिया जाएगा कि नोटिस पहुंच गया है, जब तक कि आरोपी यह साबित न कर दे कि नोटिस वास्तव में नहीं मिला और इसके लिए वह जिम्मेदार नहीं था।
- डी. विनोद शिवप्पा (2006) में इस सिद्धांत को दोहराते हुए कहा गया कि कानून की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जो बेईमान बचने वाले की मदद करे और ईमानदार आदाता (पेयी) के अधिकारों को नुकसान पहुंचाए।
- तीन जजों की पीठ के फैसले सी.सी. अलावी हाजी (2007) का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 27 और साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 में कोई तात्विक अंतर नहीं है और शिकायतकर्ता को यह साबित करने की अलग से जरूरत नहीं है कि आरोपी जानबूझकर नोटिस से बच रहा था:
“हमारी राय में, जब चेक के ड्रॉअर को सही पते पर रजिस्टर्ड डाक द्वारा नोटिस भेजा जाता है, तो अधिनियम की धारा 138 के परंतुक के खंड (बी) के तहत नोटिस जारी करने की अनिवार्य वैधानिक आवश्यकता पूरी हो जाती है। … इसके बाद नोटिस की तामील की उपधारणा का खंडन करना और यह साबित करना ड्रॉअर का काम है कि उसे पते पर नोटिस आने की कोई जानकारी नहीं थी, या लिफाफे पर लिखा पता गलत था, या पत्र कभी प्रस्तुत ही नहीं किया गया था, अथवा डाकिया की रिपोर्ट गलत थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने सी.सी. अलावी हाजी के उस महत्वपूर्ण हिस्से को भी रेखांकित किया जिसमें कहा गया था कि यदि किसी ड्रॉअर का यह दावा है कि उसे डाक से नोटिस नहीं मिला, तो वह अदालत से समन और शिकायत की प्रति प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर चेक की राशि का भुगतान करके राहत पा सकता है:
“जो व्यक्ति धारा 138 के तहत शिकायत की प्रति के साथ अदालत से समन प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता है, वह स्पष्ट रूप से जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 27 और साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत वैधानिक उपधारणा को नजरअंदाज करके यह तर्क नहीं दे सकता कि धारा 138 के तहत अपेक्षित नोटिस की उचित तामील नहीं हुई थी।”
दो जजों की पीठ के पुराने फैसले एम.डी. थॉमस बनाम पी.एस. जलील (2009) पर विचार करते हुए, जहां पत्नी द्वारा नोटिस प्राप्त किए जाने पर दोषसिद्धि निरस्त कर दी गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट ऑफ यूपी बनाम सिंथेटिक्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (1991) का संदर्भ लेते हुए ‘पर इनक्यूरियम’ के सिद्धांत को स्पष्ट किया। पीठ ने टिप्पणी की:
“इस अदालत का यह सुविचारित मत है कि एम.डी. थॉमस (उपरोक्त) का निर्णय एक समकक्ष पीठ द्वारा अधिनियम, 1881 की धारा 138 के परंतुक (बी) के तहत नोटिस की तामील की उपधारणा पर इस अदालत के बाध्यकारी फैसलों के संदर्भ के बिना दिया गया था। साथ ही इसमें यह भी कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि नोटिस प्राप्त करने वाली पत्नी ड्रॉअर पति के साथ रह रही थी या नहीं, अथवा नोटिस सही पते पर भेजा गया था या नहीं। इसके अलावा, एम.डी. थॉमस (उपरोक्त) में पीठ ने ड्रॉअर की पत्नी को गलत तरीके से किसी अनजान तीसरे व्यक्ति के बराबर मान लिया। यदि नोटिस वास्तव में सही पते पर भेजा गया था, तो जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 की धारा 27 और साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 के तहत उपधारणा अनिवार्य रूप से लागू होगी, भले ही प्राप्तकर्ता की पहचान कुछ भी हो।”
पीठ ने रेखांकित किया कि एम.डी. थॉमस के फैसले से एक विसंगति पैदा हो गई थी। पुराने फैसलों के अनुसार यदि सही पते पर भेजा गया नोटिस बिल्कुल भी डिलीवर न हो, तब भी शिकायतकर्ता को वैध तामील की उपधारणा का लाभ मिलता है; लेकिन एम.डी. थॉमस के तहत, यदि उसी पते पर रहने वाले परिवार का सदस्य नोटिस प्राप्त कर ले, तो शिकायतकर्ता उस लाभ से वंचित हो जाता। इस विसंगति को दूर करते हुए अदालत ने निर्णय दिया:
“परिणामस्वरूप, यह अदालत मानती है कि एम.डी. थॉमस (उपरोक्त) का फैसला पर इनक्यूरियम है और इसे संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी मिसाल नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त, यदि इसे मिसाल बने रहने दिया गया, तो यह बेईमान ड्रॉअर्स को झूठे बहानों पर अपनी देनदारी से बचने का अवसर देगा, जिससे कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।”
मौजूदा मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि नोटिस, अदालती समन, वकालतनामा, अपील और रिवीजन में आरोपी का पता बिल्कुल एक समान था। आरोपी ने धारा 313 सीआरपीसी के बयान में अपने पते पर कोई आपत्ति नहीं जताई और न ही मां के साथ अलग रहने या पारिवारिक विवाद का कोई दावा किया। अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट ने सी.सी. अलावी हाजी के फैसले को समझने में गंभीर चूक की और साबित करने का भार गलत तरीके से शिकायतकर्ता पर डाल दिया।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी के सही पते पर नोटिस भेजते ही धारा 138 के परंतुक (बी) के तहत नोटिस देने की वैधानिक अनिवार्यता पूरी हो गई थी और कानूनन उत्पन्न उपधारणा अप्रभावित रही। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए केरल हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 6 महीने के साधारण कारावास तथा 3,00,000 रुपये के जुर्माने की सजा को बहाल कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सैनाबा बनाम केरल राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 4114/2026
पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 30 सितंबर 2026

