रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजी साक्ष्यों की अनदेखी क्षेत्राधिकार की त्रुटि, अनुच्छेद 227 के तहत सुधार योग्य: झारखंड हाईकोर्ट

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार करने में निचली अपीलीय अदालत की विफलता एक ऐसी प्रत्यक्ष त्रुटि (एरर अपरेंट) है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सुधारा जा सकता है। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के एस्टेट ऑफिसर द्वारा पारित बेदखली आदेश को बरकरार रखने वाले अपीलीय आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद प्रासंगिक दस्तावेजों को नजरअंदाज कर सीधे यह निष्कर्ष निकालना कि कब्जाधारी ने कोई दस्तावेज पेश नहीं किया, क्षेत्राधिकार से जुड़ी गंभीर खामी है। हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से फैसले के लिए प्रधान जिला जज, धनबाद को वापस भेजते हुए दोनों पक्षों की मौजूदगी में सक्षम राज्य प्राधिकारी से भूमि की पैमाइश कराने की भी अनुमति दी।

विवाद की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता तपेश्वर सिंह ने मौजा-सरायढेला (खाता संख्या 90, प्लॉट संख्या 84) स्थित 11 डिसमिल जमीन पर अपने मालिकाना हक और कब्जे का दावा किया था। यह जमीन उन्होंने बीसीसीएल एम्प्लॉईज हाउसिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के सचिव कृष्ण नंदन प्रसाद यादव से निबंधित बिक्री विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) के जरिए खरीदी थी। खरीद के बाद, राज्य के राजस्व अभिलेखों में म्यूटेशन केस संख्या 2959(ii)/2008-09 के तहत जमीन का दाखिल-खारिज हुआ और शुद्धि पत्र (करेक्शन स्लिप) व लगान रसीदें जारी की गईं। इसके बाद 19 जनवरी 2015 को मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (माडा), धनबाद ने इस जमीन पर आवासीय मकान के निर्माण के लिए नक्शा भी पास कर दिया।

विवाद तब शुरू हुआ जब बीसीसीएल ने 27 फरवरी 2015 को अंचलाधिकारी (सीओ), धनबाद को पत्र लिखकर प्लॉट संख्या 81, 82, 83 और 84 के सीमांकन के लिए अमीन नियुक्त करने की मांग की। बीसीसीएल का दावा था कि यह जमीन भू-अर्जन वाद संख्या 7/65/66 के तहत अधिग्रहित की गई थी। इसके बाद 6 अप्रैल 2015 को जमीन की पैमाइश की गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि पैमाइश के दौरान उनकी जमीन अधिग्रहित क्षेत्र से बाहर पाई गई थी, लेकिन कई अभ्यावेदनों के बावजूद उन्हें पैमाइश रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।

इसके बाद बीसीसीएल ने तपेश्वर सिंह को नोटिस जारी कर अवैध अतिक्रमण का आरोप लगाया। सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उनकी खरीदी गई जमीन अधिग्रहित क्षेत्र से बाहर है। एस्टेट ऑफिसर के समक्ष वाद संख्या 01/2016 की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिए बिना उनके साक्ष्य बंद कर दिए गए और सर्वे-जानकार प्लीडर कमिश्नर के जरिए भूमि की पैमाइश कराने की उनकी अर्जी भी खारिज कर दी गई। 22 जून 2017 को एस्टेट ऑफिसर ने सिंह को अतिक्रमणकारी करार दिया। इसके खिलाफ सिंह द्वारा प्रधान जिला जज, धनबाद के समक्ष दायर अपील (सिविल मिसलेनियस अपील संख्या 37/2017) भी 7 अगस्त 2023 को खारिज कर दी गई। अपीलीय अदालत ने माना कि उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज पेश नहीं किया। इस आदेश के खिलाफ सिंह ने अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत के समक्ष दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अपीलीय अदालत का आदेश रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष त्रुटि से ग्रस्त है। उन्होंने बताया कि स्वयं एस्टेट ऑफिसर के आदेश में याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सभी दस्तावेजों की सूची दर्ज थी—जिनमें सेल डीड, म्यूटेशन ऑर्डर शीट, शुद्धि पत्र, लगान रसीद, माडा द्वारा स्वीकृत नक्शा, नजीर रसीद और प्रशासनिक अधिकारियों को दिए गए अभ्यावेदन शामिल थे। इसके बावजूद अपीलीय अदालत ने इन दस्तावेजों पर चर्चा किए बिना गलत निष्कर्ष निकाल लिया कि याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में कोई दस्तावेज पेश नहीं किया।

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दूसरी तरफ, बीसीसीएल के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि जब तक आदेश में कोई विकृति या रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि न हो, तब तक अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह जमीन भू-अर्जन वाद संख्या 7/65/66 में अधिग्रहित की गई थी और याचिकाकर्ता अतिक्रमणकारी है। उन्होंने यह भी दलील दी कि म्यूटेशन से मालिकाना हक तय नहीं होता और न ही माडा द्वारा नक्शा पास करने से स्वामित्व साबित होता है, इसलिए अपीलीय अदालत के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने सेल डीड, म्यूटेशन, लगान रसीद और माडा से स्वीकृत नक्शे के आधार पर प्रथम दृष्टया उस जमीन पर अपनी वैध मौजूदगी दर्शाई थी।

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अदालत ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर गौर किया कि प्लॉट संख्या 84 का कुल रकबा 44 डिसमिल है, जबकि बीसीसीएल ने उसमें से केवल 11 डिसमिल भूमि के अधिग्रहण का दावा किया था। चूंकि बीसीसीएल ने पूरा प्लॉट अधिग्रहित नहीं किया था, इसलिए उसी प्लॉट में 11 डिसमिल जमीन पर याचिकाकर्ता के दावे की स्थिति स्पष्ट करने के लिए भौतिक पैमाइश कराया जाना आवश्यक था।

अनुच्छेद 227 के तहत अपनी अधीक्षण शक्तियों के दायरे को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह अनुच्छेद मुकदमेबाजों को नियमित अपील का अधिकार नहीं देता, लेकिन यह अधीनस्थ अदालतों को उनके अधिकार क्षेत्र के भीतर रखने का दायित्व हाईकोर्ट पर डालता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले उसेफ मथाई बनाम एम. अब्दुल खादर (2002) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“वास्तव में, इस अनुच्छेद के तहत प्राप्त शक्ति हाईकोर्ट पर यह कर्तव्य सौंपती है कि वह अधीनस्थ अदालतों और न्यायाधिकरणों को उनके अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर रखे और यह सुनिश्चित करे कि वे अपनी सीमाओं का उल्लंघन न करें, तथा इन संस्थाओं का गठन करने वाले कानूनों के दायरे में रहते हुए विधि सम्मत कर्तव्यों का निर्वहन सुनिश्चित किया जाए। केवल गलत निर्णय ही इस अनुच्छेद के तहत क्षेत्राधिकार के प्रयोग का आधार नहीं हो सकते, जब तक कि वह गलत निर्णय अधीनस्थ अदालत और न्यायाधिकरणों द्वारा कर्तव्य की घोर उपेक्षा तथा सत्ता के खुले दुरुपयोग से संबंधित न हो, जिसके परिणामस्वरूप किसी पक्षकार के साथ घोर अन्याय हुआ हो।”

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य निर्णय किशोर कुमार खेतान बनाम प्रवीण कुमार सिंह (2006) का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:

“इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत क्षेत्राधिकार इस अर्थ में सीमित हो सकता है कि इसका प्रयोग केवल क्षेत्राधिकार की त्रुटियों को सुधारने के लिए किया जाना है। लेकिन जब कोई अदालत खुद से गलत सवाल पूछती है या सवाल को अनुचित तरीके से हल करने का प्रयास करती है, तो भले ही वह किसी तथ्यात्मक निष्कर्ष पर पहुंचे, उस तथ्य के निष्कर्ष को क्षेत्राधिकार के साथ दिया गया नहीं माना जा सकता और वह संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट के हाथों सुधार योग्य होगा। अपने आदेश के समर्थन में आवश्यक निष्कर्ष देने में विफलता भी संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सुधारी जाने योग्य क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि होगी।”

इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय अदालत ने एस्टेट ऑफिसर के आदेश में पहले से उल्लिखित दस्तावेजों की अनदेखी करके रिकॉर्ड पर एक स्पष्ट त्रुटि की है। जमीन के सीमांकन की आवश्यकता पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:

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“प्रतिवादी/बीसीसीएल का यह मामला नहीं है कि उसने प्लॉट संख्या 84 के पूरे हिस्से का अधिग्रहण किया है। यदि ऐसी स्थिति है, तो संबंधित प्राधिकारी के लिए यह अनिवार्य था कि वह याचिकाकर्ता द्वारा की गई प्रार्थना के अनुसार भूमि की पैमाइश कराए, जो कि नहीं की गई।”

अदालत का निर्णय और निर्देश

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अपीलीय अदालत ने आवश्यक साक्ष्यों को नजरअंदाज किया है, इसलिए प्रधान जिला जज, धनबाद द्वारा 7 अगस्त 2023 को पारित आदेश को रद्द किया जाता है।

अदालत ने सिविल मिसलेनियस अपील संख्या 37/2017 को प्रधान जिला जज की अदालत में पुनर्बहाल कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करते हुए और दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर नए सिरे से निर्णय लिया जाए। हाईकोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी को यह छूट भी दी कि यदि सही निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आवश्यक हो, तो वह दोनों पक्षों की उपस्थिति में सक्षम राज्य प्राधिकारी से विवादित भूमि की पैमाइश करा सकते हैं। दोनों पक्षों को 5 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:30 बजे संबंधित अदालत के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: तपेश्वर सिंह बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सी.एम.पी. संख्या 691/2024
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 24.09.2026

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