मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि रेलवे स्टेशन के फुट ओवरब्रिज की सीढ़ियों पर भारी भीड़ के दबाव और आपाधापी या भगदड़ के कारण किसी वैध यात्री की मौत होना रेलवे एक्ट, 1989 के तहत एक “अप्रिय घटना” (अनटोवर्ड इंसिडेंट) के दायरे में आता है। इसके लिए रेलवे प्रशासन का पूर्ण दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) बनता है। सदर्न रेलवे द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि रेलवे स्टेशन परिसर के भीतर यात्रियों की सुरक्षा और सुचारू आवागमन तथा भीड़ के प्रभावी नियंत्रण की पूरी जिम्मेदारी और जवाबदेही रेलवे प्रशासन की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 11 नवंबर 2023 को हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना से जुड़ा है। मृतक रघुरामन कांचीपुरम से गिंडी के लिए उपनगरीय (लोकल) ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। सुबह लगभग 9:35 बजे गिंडी रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद वह स्टेशन से बाहर निकलने के लिए फुट ओवरब्रिज की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे। उसी दौरान यात्रियों की अत्यधिक भीड़ और आपाधापी के कारण अन्य यात्रियों ने उन्हें धक्का दे दिया, जिससे वह सीढ़ियों पर गिर पड़े और उनके सिर में गंभीर चोट आई। वह मौके पर ही बेहोश हो गए, जिसके बाद उन्हें तुरंत सैदापेट के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद मृतक की पत्नी और दो नाबालिग बच्चों ने रेलवे दावा अधिकरण (आरसीटी), चेन्नई पीठ का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 16 और रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 123, 124A और 125 के तहत 10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की।
रेलवे ट्रिब्यूनल ने 20 मार्च 2025 को अपने निर्णय में आश्रितों को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिस पर घटना की तारीख से निर्णय की तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय था। ट्रिब्यूनल ने मुआवजे की राशि में से 6 लाख रुपये मृतक की पत्नी को और 1-1 लाख रुपये दोनों बच्चों को देने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए सदर्न रेलवे के महाप्रबंधक के माध्यम से भारत संघ ने हाईकोर्ट में सिविल मिसलेनियस अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
सदर्न रेलवे की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि यह घटना रेलवे एक्ट की धारा 123(c)(2) के तहत “अप्रिय घटना” की वैधानिक परिभाषा में नहीं आती, क्योंकि यह प्रावधान विशेष रूप से किसी यात्री के ट्रेन से आकस्मिक रूप से गिरने की स्थिति पर लागू होता है। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने इस मामले को गलत तरीके से ‘ट्रेन से आकस्मिक गिरना’ करार दिया है।
रेलवे ने आगे तर्क दिया कि यात्री की मृत्यु फुट ओवरब्रिज की सीढ़ियों पर गिरने से हुई थी और यह मामला धारा 124A के अपवादों (प्रोवाइज़ो) के खंड (e) के अंतर्गत आता है, जो ‘प्राकृतिक कारणों’ से होने वाली मौत से संबंधित है। इसलिए रेलवे प्रशासन पर मुआवजा देने का कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
अदालत ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों की जांच करते हुए पाया कि मृतक के पास एक वैध मंथली सीजन टिकट (प्रदर्श A6) मौजूद था। इसलिए रेलवे एक्ट की धारा 2(29) सपठित धारा 124A के तहत वह निसंदेह एक प्रामाणिक (बोनाफाइड) यात्री थे। इसके अलावा, इनक्वेस्ट रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (प्रदर्श A5) से यह पूरी तरह साबित हुआ कि रघुरामन की मौत का कारण फुट ओवरब्रिज की सीढ़ियों से गिरने पर सिर में लगी गंभीर चोट थी। इस आधार पर अदालत ने रेलवे की ‘प्राकृतिक मौत’ वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
ट्रिब्यूनल द्वारा अपने आदेश में ‘ट्रेन से गिरने’ का उल्लेख किए जाने पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक लिपिकीय त्रुटि (क्लेरिकल एरर) प्रतीत होती है। अदालत ने ट्रिब्यूनल के उस विशिष्ट अंश को निरस्त कर दिया, लेकिन इस तथ्यपरक निष्कर्ष को बरकरार रखा कि मौत स्टेशन परिसर के भीतर स्थित फुट ओवरब्रिज पर गिरने के कारण ही हुई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि रेलवे ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि यह मामला धारा 124A के अपवाद खंड (a) से (e) के दायरे में आता है।
जस्टिस अहमद ने रेखांकित किया कि लोकल ट्रेन का वैध टिकट केवल ट्रेन में यात्रा करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह स्टेशन की अन्य सुविधाओं जैसे प्लेटफॉर्म, प्रतीक्षालय, फुट ओवरब्रिज, लिफ्ट और स्वचालित सीढ़ियों (एस्केलेटर) के उपयोग का भी अधिकार देता है। गिंडी रेलवे स्टेशन पर निर्माण कार्यों, मलबे और भारी भीड़भाड़ का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि भीड़ का प्रबंधन करना रेलवे का बुनियादी कर्तव्य है:
“रेलवे स्टेशन या रेलवे परिसर के भीतर भीड़ के प्रभावी नियंत्रण और यात्रियों की सुगम व सुरक्षित आवाजाही के लिए रेलवे अधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार और जवाबदेह हैं। देशभर के रेलवे स्टेशनों में व्याप्त जटिल परिस्थितियों और वास्तविकताओं की अदालतें अनदेखी नहीं कर सकतीं और न ही अदालतें सच्चाई तथा परिस्थितियों से अपनी आंखें मूंद सकती हैं। किसी भी ‘अप्रिय घटना’ के मामले में लापरवाही के आधार पर यात्रियों को ही दोषी ठहराने का तर्क अदालतें कभी स्वीकार नहीं कर सकतीं। ऐसी परिस्थितियों में अदालतों का यह दायित्व है कि वे उदारवादी व्याख्या के सिद्धांत को अपनाएं, ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा प्रभावी रहे और अपने प्रियजन तथा कमाने वाले मुखिया को खोने वाले आश्रितों की आजीविका सुरक्षित रह सके।”
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि धारा 123(c)(1)(ii) के परिप्रेक्ष्य में, आगे निकलने की होड़ में यात्रियों की भारी भीड़ द्वारा किसी यात्री को धक्का दिया जाना स्टेशन परिसर के भीतर एक हिंसक आघात के समान है।
संविधान के अनुच्छेद 38(1) के तहत कल्याणकारी राज्य के दायित्व और धारा 124A के तहत पूर्ण दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया:
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रभाकरण विजयकुमार (2008), जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि जन-कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या संकीर्ण या तकनीकी रूप से करने के बजाय उद्देश्यपूर्ण और उदार दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, ताकि दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजे से वंचित न होना पड़े।
- कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला श्यामल बरन साहा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1998), जिसमें माना गया था कि कतारों और भीड़ के प्रबंधन के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था न करना कानूनी कर्तव्य की विफलता और लापरवाही है।
- दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला यूनियन ऑफ इंडिया बनाम कृष्ण कुमार गोयल (2010), जिसमें यह निर्णय दिया गया था कि भगदड़ में होने वाली मौत ‘अप्रिय घटना’ मानी जाती है और इसके लिए रेलवे प्रशासन मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है।
हाईकोर्ट का निर्णय
मद्रास हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रेलवे परिसर के भीतर स्थित फुट ओवरब्रिज पर भारी भीड़, अत्यधिक आपाधापी या भगदड़ की वजह से गिरने से हुई यात्री की मौत पूरी तरह से “अप्रिय घटना” है। तदनुसार, अदालत ने सदर्न रेलवे की अपील को खारिज कर दिया और रेलवे दावा अधिकरण द्वारा दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे और ब्याज के आदेश की पूरी तरह से पुष्टि की।
हाईकोर्ट ने रेलवे प्रशासन को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर इस निर्णय का अनुपालन करते हुए मुआवजे की राशि जमा करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम आशा के. और अन्य
वाद संख्या: सीएमए संख्या 3280 / 2026
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 21-09-2026

