भूमि अधिग्रहण: अलग हुए गैर-अधिग्रहीत बचे भूखंड के नुकसान पर तय होगा सेवरेंस हर्जाना, अधिग्रहीत पट्टी पर नहीं — सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सेवरेंस (भूमि के दो टुकड़ों में बंटने से होने वाला नुकसान) हर्जाने की गणना अधिग्रहीत की गई संकरी पट्टी के आधार पर नहीं, बल्कि अधिग्रहण के बाद बची हुई गैर-अधिग्रहीत भूमि के मूल्य और उपयोगिता में आई गिरावट के आधार पर की जानी चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने भूमि का मुआवजा घटाने के लिए लागू किए गए एक काल्पनिक रेडियल स्टेप-डाउन (दूरी आधारित मूल्य ह्रास) फॉर्मूले को पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने पंजाब के फाजिल्का जिले में अस्पाल एक्सटेंशन ड्रेन (खाई नहर) के निर्माण से प्रभावित किसानों के लिए 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ का एकसमान बाजार मूल्य और गैर-अधिग्रहीत बची भूमि पर 50% सेवरेंस हर्जाना बहाल करने का निर्देश दिया।

47 सिविल अपीलों का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक सुविधा या कृत्रिम गणितीय मॉडल परियोजना-स्तरीय समानता के सिद्धांत को खत्म नहीं कर सकते। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्यूबवेल, पक्के ढांचे या फलदार पेड़ों जैसी सहायक संपत्तियों पर धारा 23(2) के तहत वैधानिक सोलेशियम (30%) और अतिरिक्त ब्याज का दावा कानूनी रूप से नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पंजाब के फाजिल्का जिले के छह गांवों—करणी खेड़ा, ओडियां, आवा, कोठा, आलमशाह और सलेम शाह—में 18.42 किलोमीटर लंबी और 264 से 340 फीट चौड़ी अस्पाल एक्सटेंशन ड्रेन के निर्माण के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण से जुड़ा है। अधिग्रहण की प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 के तहत 14 नवंबर 2000 और 24 नवंबर 2000 को जारी अधिसूचनाओं से शुरू हुई थी, जिसके बाद 2 मार्च 2001 को धारा 6 के तहत घोषणा की गई।

भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (एसडीएम), फाजिल्का ने 6 अगस्त 2001 को अपना अंतिम अवॉर्ड सुनाया। सिंचाई विभाग की एक समिति की सिफारिश के आधार पर नहरी (सिंचित) भूमि का बाजार मूल्य 2,25,000 रुपये प्रति एकड़ तय किया गया। कलेक्टर ने ड्रेन के कारण खेतों के दो टुकड़ों में कट जाने के बावजूद सेवरेंस हर्जाने के मद में शून्य (शून्य मुआवजा) का फैसला दिया। इसके अलावा, करणी खेड़ा के कुछ भूस्वामियों को फलदार पेड़ों के लिए 1,01,139.50 रुपये प्रति व्यक्ति और ट्यूबवेल के लिए मामूली मुआवजा दिया गया।

कम बाजार मूल्य और खेतों के विखंडन के बावजूद सेवरेंस हर्जाना न मिलने से क्षुब्ध होकर किसानों ने अधिनियम की धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रेफरेंस कोर्ट ने 13 नवंबर 2007 और उसके बाद के फैसलों में भूमि का बाजार मूल्य बढ़ाकर करणी खेड़ा, ओडियां और आलमशाह के लिए 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ तय कर दिया। गांव आवा में हाईवे किनारे की जमीन के लिए 3,00,000 रुपये और भीतरी जमीन के लिए 2,56,000 रुपये; गांव कोठा के लिए 2,56,000 रुपये निर्धारित किए, जबकि सलेम शाह के लिए कलेक्टर की 2,25,000 रुपये की दर बरकरार रखी। इसके अतिरिक्त, रेफरेंस कोर्ट ने करणी खेड़ा, आलमशाह और ओडियां के लिए 50% तथा अन्य गांवों के लिए 10% सेवरेंस हर्जाना दिया, 946 फलदार पेड़ों के लिए 9,00,000 रुपये का एकमुश्त मुआवजा मंजूर किया, ट्यूबवेल के मुआवजे को बढ़ाकर 1,00,000 रुपये तक किया और सहायक संपत्तियों पर भी 30% सोलेशियम लागू किया।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 29 मार्च 2019 को इस निर्णय को बदलते हुए एक नया “हब-एंड-स्पोक” रेडियल मूल्य मॉडल लागू कर दिया। हाईकोर्ट ने फाजिल्का शहर से दूरी बढ़ने पर प्रति गांव टियर 20,000 रुपये प्रति एकड़ की कटौती की और अंतरराष्ट्रीय सीमा की निकटता को आधार बनाकर 2,99,000 रुपये से 3,39,000 रुपये प्रति एकड़ की दरें तय कर दीं। हाईकोर्ट ने सेवरेंस हर्जाने को भी घटाकर अधिग्रहीत जमीन के मूल्य का 40% कर दिया, फलोद्यान के नुकसान को घटाकर 280 पेड़ों के लिए 5,38,300 रुपये तक सीमित कर दिया, ट्यूबवेल का मुआवजा 50,000 रुपये तय किया और सहायक संपत्तियों पर सोलेशियम व अतिरिक्त ब्याज पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके बाद भूस्वामियों ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता किसानों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अजय तिवारी ने दलील दी कि अधिग्रहीत भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग 10 (वर्तमान में एनएच-7) पर स्थित होने, फाजिल्का शहर से सटकर होने तथा बीएसएफ मुख्यालय और एम.आर. कॉलेज जैसे प्रमुख संस्थानों के नजदीक होने के कारण उच्च उपनगरीय और व्यावसायिक क्षमता रखती है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने खुद इन गांवों को ‘विशेष गांव’ की श्रेणी में रखा था और यहां ग्रामीण दर (5% से 6%) के बजाय 9% का शहरी स्टांप शुल्क वसूला जाता था। इसके अलावा, 1996 में इसी सड़क पर स्थित सुल्तानपुर गांव में इसी तरह के ड्रेन प्रोजेक्ट के लिए 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा तय किया गया था, जिसे हाईकोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि 100 से 130 फीट चौड़ी ड्रेन के कारण बची हुई विशाल जोत कटकर बेकार हो गई, ऐसे में सेवरेंस हर्जाना बची हुई जमीन के नुकसान पर ही मिलना चाहिए।

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पंजाब राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने हाईकोर्ट के रुख का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक होने के कारण ये जमीनें सैन्य सुरक्षा उपायों और रक्षात्मक मोर्चों से प्रभावित रहती हैं, जिससे इनका बाजार भाव नगर पालिका क्षेत्र जैसा नहीं हो सकता। राज्य ने कहा कि किसानों ने धारा 18 की अपनी मूल याचिका में केवल 280 पेड़ों के नुकसान का दावा किया था, इसलिए बाद में बिना याचिका संशोधित किए 482 अतिरिक्त पेड़ों के लिए पेश किए गए मौखिक साक्ष्य कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किए जा सकते। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि ट्यूबवेल की मोटरें और पंप हटाकर दोबारा उपयोग में लाए जा सकते हैं और सहायक संपत्तियों पर कानूनन सोलेशियम नहीं दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पांच प्रमुख कानूनी प्रश्न तय किए और उनका सिलसिलेवार विश्लेषण किया:

1. रेडियल स्टेप-डाउन मॉडल खारिज और समानता के सिद्धांत की बहाली

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने रेफरेंस कोर्ट के ठोस मूल्यांकन को दरकिनार कर एक काल्पनिक और अमूर्त गणितीय स्टेप-डाउन मॉडल लागू करने में गंभीर भूल की। बेंच ने रेखांकित किया कि रेफरेंस कोर्ट ने 1996 के सुल्तानपुर बेंचमार्क पर सही भरोसा किया था, जहां पांच साल पहले उसी सड़क पर गंदे पानी के ड्रेन के लिए 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से भूमि अधिग्रहीत की गई थी।

अदालत ने कहा कि जब किसी एकीकृत सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहीत की जाती है, तो आसपास के भूखंडों के बीच समानता और गैर-भेदभाव का सिद्धांत लागू होना चाहिए। अली मोहम्मद बेग बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य और भारत संघ बनाम हरिंदर पाल सिंह का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब तक कोई ठोस और स्पष्ट भिन्नता न हो, आपस में सटी जमीनों को कृत्रिम मूल्य क्षेत्रों में नहीं बांटा जा सकता। कृष्ण कुमार बनाम हरियाणा राज्य के फैसले को दोहराते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“भूमि अधिग्रहण न्यायशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि समान स्थान और विकास क्षमता वाली जमीनों को निष्पक्ष और समान मुआवजा दिया जाना चाहिए, जब तक कि स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ अंतर इसे अन्यथा उचित न ठहराएं… सतही आधारों पर मुआवजे में मनमाना भेदभाव, निष्पक्षता और समानता के स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।”

पीठ ने आगे कहा कि प्रशासनिक सीमाओं या राजस्व वर्गीकरण के आधार पर आस-पास की जमीनों के मूल्यांकन में भेदभाव नहीं किया जा सकता:

“प्रशासनिक सुविधा के लिए बनाई गई कृत्रिम सीमाओं को निष्पक्षता के मौलिक सिद्धांत के प्रयोग में बाधा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट द्वारा छोटे आकार के भूखंड के आधार पर 20% की कटौती करना गलत था। उधो दास बनाम हरियाणा राज्य और भगवथुला समाना बनाम स्पेशल तहसीलदार के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग से सटी हो और वहां 9% की शहरी स्टांप ड्यूटी लागू हो, तो विकास कटौती लगाना उचित नहीं है। इसके अलावा हाईकोर्ट के फॉर्मूले से यह विसंगति पैदा हो गई कि सीमा से 10 किलोमीटर दूर स्थित सबुआना गांव को 2,79,000 रुपये प्रति एकड़ मिले, जबकि सीमा से महज 1.5 किलोमीटर दूर स्थित आलमशाह गांव को 3,19,000 रुपये प्रति एकड़ दिए गए। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के रेडियल मॉडल को रद्द कर 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ की दर को बहाल कर दिया।

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2. फलोद्यान के मुआवजे में याचिकाओं (प्लीडिंग्स) का दायरा

दूसरे मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें फलदार पेड़ों के मुआवजे को केवल 280 पेड़ों (246 माल्टा संतरा और 34 अमरूद) तक सीमित कर 5,38,300 रुपये तय किया गया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 18 के तहत दायर रेफरेंस याचिका एक सिविल ‘वादपत्र’ (प्लेन्ट) की तरह होती है, जो विवाद के दायरे को निर्धारित करती है। भूस्वामियों ने अपनी मूल याचिका में केवल 280 पेड़ों के नुकसान का दावा किया था। हालांकि बाद में उन्होंने मौखिक गवाही दी कि ड्रिप-इरिगेशन सिस्टम टूटने के कारण 2005 में गैर-अधिग्रहीत जमीन पर 482 अतिरिक्त पेड़ सूख गए, लेकिन उन्होंने अपनी याचिका में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया। बच्चज नाहर बनाम नीलिमा मंडल मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि कोई भी पक्षकार अपनी याचिकाओं के दायरे से बाहर जाकर साक्ष्य पेश नहीं कर सकता और अदालत पक्षकारों द्वारा न उठाए गए नए मामले पर फैसला नहीं सुना सकती।

3. सेवरेंस हर्जाना: शेष गैर-अधिग्रहीत भूमि के नुकसान पर गणना जरूरी

सेवरेंस हर्जाने के अहम कानूनी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने धारा 23(1) के तीसरे उपबंध की व्याख्या में भारी भूल की। हाईकोर्ट ने गणना का आधार बची हुई गैर-अधिग्रहीत भूमि के बजाय अधिग्रहीत पट्टी को बना दिया था।

पीठ ने रिकॉर्ड पर दर्ज तथ्यों का विश्लेषण करते हुए बताया कि अस्पाल ड्रेन एक विशाल कृत्रिम खाई है। सिंचाई विभाग के उप-मंडल अधिकारी (आरडब्ल्यू-1) ने जिरह में खुद स्वीकार किया था:

“…ड्रेन की चौड़ाई लगभग 100 फीट है, इसकी गहराई 10 से 15 फीट है और ड्रेन के किनारे लगभग 10 से 12 फीट ऊंचे हैं तथा पुल के बिना ड्रेन को पार करना संभव नहीं है।”

अदालत ने पाया कि ड्रेन पर बने पुल महज 7 से 8 फीट चौड़े थे और वे दो-दो किलोमीटर की दूरी पर थे, जिन पर कंबाइन हार्वेस्टर या भरी हुई ट्रैक्टर-ट्रॉली नहीं जा सकती थी। इससे किसानों के बचे हुए खेत पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए। श्रीमती त्रिवेणी देवी बनाम कलेक्टर, रांची और वालचंदनगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सेवरेंस हर्जाना उस बची हुई जमीन की उपयोगिता और बाजार मूल्य में आई स्थायी गिरावट की भरपाई के लिए दिया जाता है, जिसे अधिग्रहीत नहीं किया गया है। इसलिए टहल सिंह बनाम पंजाब राज्य के फैसले को केवल दूरी का नियम मानकर यांत्रिक रूप से लागू करना गलत था। कोर्ट ने गैर-अधिग्रहीत बची जमीन के बाजार मूल्य पर 50% सेवरेंस हर्जाना देने का रेफरेंस कोर्ट का आदेश पूरी तरह बहाल कर दिया।

4. सहायक संपत्तियों पर सोलेशियम और ब्याज पर कानूनी रोक

चौथे मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की कि धारा 23(2) के तहत 30% सोलेशियम और धारा 23(1-ए) के तहत अतिरिक्त ब्याज केवल भूमि के मूल बाजार मूल्य पर ही देय है। यह लाभ पेड़ों, ट्यूबवेल, कोठों या सेवरेंस हर्जाने जैसी सहायक संपत्तियों पर नहीं दिया जा सकता।

इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, जींद बनाम नरिंदर कुमार के हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले पंजाब राज्य बनाम अमरजीत सिंह का हवाला दिया, जिसमें निर्णय दिया गया था:

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“धारा 23(1-ए) के तहत अतिरिक्त राशि और धारा 23(2) के तहत सोलेशियम, दोनों केवल अधिनियम की धारा 23(1) के तहत निर्धारित बाजार मूल्य पर ही देय हैं, किसी अन्य राशि पर नहीं। धारा 23(2) के तहत सोलेशियम अतिरिक्त राशि पर देय नहीं है और न ही धारा 23(1-ए) के तहत अतिरिक्त राशि सोलेशियम पर देय है। धारा 23(1) के दूसरे से छठे कारकों के तहत दिए जाने वाले नुकसान या खर्चों पर भी सोलेशियम और अतिरिक्त राशि देय नहीं है।”

चूंकि पेड़, सेवरेंस और पक्के ढांचे धारा 23(1) के दूसरे से छठे कारकों के अंतर्गत आते हैं, इसलिए उन पर वैधानिक सोलेशियम और अतिरिक्त ब्याज देय नहीं है।

5. ट्यूबवेल का मूल्यांकन और दस्तावेजी साक्ष्य साबित करने का नियम

अंतिम मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी गांवों में ट्यूबवेल विस्थापन के लिए 50,000 रुपये प्रति ट्यूबवेल का एकमुश्त मुआवजा देने के हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि रेफरेंस कोर्ट ने निजी मूल्यांकन रिपोर्टों के आधार पर 1,00,000 रुपये का मुआवजा देकर गलती की थी, क्योंकि उस रिपोर्ट को बनाने वाले प्राइवेट इंजीनियर को गवाह के तौर पर अदालत में पेश नहीं किया गया था।

एस. संगीता बनाम पी. पोन्नी और एलआईसी बनाम राम पाल सिंह बिसेन का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया:

“हमारी यह स्पष्ट राय है कि साक्ष्य में किसी दस्तावेज़ का मात्र स्वीकार होना ही उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं है। दूसरे शब्दों में, किसी दस्तावेज़ पर केवल प्रदर्श (एग्जिबिट) अंकित कर देने से उसे कानून के अनुसार साबित करने की अनिवार्यता समाप्त नहीं हो जाती।”

अदालत ने माना कि बिजली की मोटरें और डीजल इंजन जंगम (मूवेबल) संपत्तियां हैं, जिन्हें उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जा सकता है। 50,000 रुपये का निर्धारित मुआवजा प्रशासनिक कम-आंकलन और किसानों के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों के बीच एक संतुलित राशि है।

संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों के उपयोग पर चर्चा करते हुए प्रीतम सिंह बनाम राज्य, ढाकेश्वरी कॉटन मिल्स बनाम सीआईटी, दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य और कुन्हाम्मद बनाम केरल राज्य का उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 136 के तहत हस्तक्षेप का दायरा सीमित और विवेकाधीन है, लेकिन संस्थागत अन्याय और मनमाने फैसलों को दूर करने के लिए अदालत का दखल पूरी तरह न्यायसंगत है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सभी 47 सिविल अपीलों का निपटारा करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. हाईकोर्ट का रेडियल स्टेप-डाउन मॉडल रद्द करते हुए विवादित गांवों के लिए 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ का एकसमान बाजार मूल्य बहाल किया जाता है।
  2. फलोद्यान के नुकसान का मुआवजा 280 पेड़ों के लिए 5,38,300 रुपये पर सीमित रखा जाता है।
  3. बची हुई गैर-अधिग्रहीत भूमि के बाजार मूल्य पर 50% सेवरेंस हर्जाना देने का निर्णय पूरी तरह बहाल किया जाता है।
  4. 30% सोलेशियम और धारा 23(1-ए) के तहत अतिरिक्त ब्याज केवल मूल भूमि के बाजार मूल्य पर देय होगा, इसे पेड़ों, ट्यूबवेल या सेवरेंस हर्जाने पर नहीं दिया जाएगा।
  5. ट्यूबवेल विस्थापन के लिए प्रति ट्यूबवेल 50,000 रुपये की एकमुश्त दर बरकरार रखी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि संशोधित दर के अनुसार अतिरिक्त मुआवजे की गणना कर भूस्वामियों को छह महीने के भीतर भुगतान किया जाए। यदि पुनर्गणना के बाद किसी किसान से कोई राशि वसूल योग्य बनती है, तो संबंधित किसानों को लिखित नोटिस और सुनवाई का पर्याप्त अवसर देकर नौ महीने के भीतर वसूली की प्रक्रिया पूरी की जाए। मामले में लागत को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुरिंदर आहूजा एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 3800-3803/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

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