सुप्रीम कोर्ट ने संभल में नवंबर 2024 में भड़की हिंसा के कथित मुख्य साजिशकर्ता मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत की गई हिरासत को मंगलवार को रद्द कर दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में लिए गए इकबालिया बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखना कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 8 जून 2026 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें अफरोज की हिरासत को सही ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अफरोज की इस दलील को स्वीकार किया कि पुलिस अभिरक्षा के दौरान लिया गया बयान कानून की नजर में मान्य साक्ष्य नहीं है। अफरोज ने अदालत में पक्ष रखा था कि पुलिस ने प्रताड़ना और एनकाउंटर का डर दिखाकर उससे जबरन यह बयान लिया था।
जामा मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की थी हिंसा
यह मामला उत्तर प्रदेश के संभल स्थित जामा मस्जिद के अदालती सर्वे के दौरान नवंबर 2024 में हुए हिंसक उपद्रव से जुड़ा है। उस हिंसा में चार लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने मामले की जांच के सिलसिले में 17 जनवरी 2025 को मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया था। इसके बाद, जब वह पहले से ही न्यायिक हिरासत में जेल में बंद था, संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत हिरासत का आदेश तामील कर दिया।
अभियोजन पक्ष के आरोप
अभियोजन का दावा था कि अफरोज ने ही भीड़ को भड़काकर हिंसा की आग में झोंका था। सरकारी पक्ष के मुताबिक, उसके उकसावे से संभल शहर और आसपास के इलाकों में हालात बेकाबू हो गए, बाजार में भगदड़ मच गई, दुकानदारों ने शटर गिरा दिए और स्थानीय लोग दहशत के मारे घरों में कैद हो गए। जो लोग खरीदारी करने निकले थे, वे जान बचाने के लिए दुकानों और सुरक्षित ठिकानों की तरफ भागे, जिससे इलाके की लोक व्यवस्था पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई।
हाईकोर्ट के रुख को शीर्ष अदालत ने बदला
इससे पहले मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन के कदम को सही ठहराया था। हाईकोर्ट ने माना था कि संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार क्षेत्र का समुचित उपयोग किया है और उनका फैसला बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय नहीं है। हाईकोर्ट की राय थी कि अफरोज को लोक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए हिरासत में लेना जरूरी था और प्रशासन की यह संतुष्टि वस्तुनिष्ठ तथ्यों पर टिकी थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया था कि प्रशासन ने अफरोज को 22 सहायक दस्तावेज सौंपे थे, जिससे साफ था कि हिरासत का आदेश मनमाना या गैर-दलीली नहीं था। अदालत ने सरकार के हलफनामे का जिक्र करते हुए कहा था कि आगजनी, पुलिसकर्मियों के जख्मी होने और अवैध हथियारों की बरामदगी से यह साफ था कि यह मामला सामान्य कानून-व्यवस्था से कहीं आगे बढ़कर लोक व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालने वाला था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को दरकिनार करते हुए अफरोज की रासुका हिरासत को अवैध घोषित कर दिया।

