दिल्ली हाईकोर्ट ने एक किरायेदार की वह अपील खारिज कर दी, जिसमें उसने कब्जा खाली करने, बकाया किराया और मेस्ने प्रॉफिट के भुगतान की डिक्री को चुनौती दी थी। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि किरायेदार की अपनी स्वीकारोक्तियों से किरायेदारी की शुरुआत, किराये की दर और समय-समय पर हुए किराया समझौतों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य साबित होते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि किरायेदार ₹10 लाख की कथित मॉर्गेज राशि देने और उसके बदले मासिक भुगतान ₹2,900 तय होने का दावा साबित नहीं कर सका।
मामला मदhu चावला और संजय चावला की ओर से सिद्धांत मेंदीरत्ता के खिलाफ दायर मुकदमे से जुड़ा था। विवादित दुकान का क्षेत्रफल 238.38 वर्ग फुट था। मकान मालिकों के अनुसार, दुकान 2014 में ₹25,500 प्रति माह के किराये पर दी गई थी, जिसमें पानी और बिजली के शुल्क शामिल नहीं थे। किरायेदारी समय-समय पर बढ़ाई गई और 22 अगस्त 2018 को एक नया किराया समझौता भी किया गया।
मकान मालिकों का कहना था कि किरायेदारी 31 जुलाई 2019 को समाप्त हो गई थी और वे इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। इसके बाद 7 सितंबर 2019 को कानूनी नोटिस भेजकर किरायेदारी समाप्त कर दी गई और दुकान का खाली कब्जा तथा बकाया किराया मांगा गया।
इसके बाद मकान मालिकों ने कब्जा वापस पाने, ₹87,000 बकाया किराया और आगे की अवधि के लिए मेस्ने प्रॉफिट/हर्जाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
किरायेदार ने ₹10 लाख की मॉर्गेज व्यवस्था का दावा किया
किरायेदार ने मकान मालिकों के दावे का विरोध करते हुए कहा कि वास्तविक मासिक किराया केवल ₹2,900 था। उसका दावा था कि नवंबर 2016 से मार्च 2017 के बीच दुकान के संबंध में ₹10 लाख मॉर्गेज राशि के रूप में दिए गए थे और इसी कारण मासिक भुगतान ₹2,900 तय किया गया था।
उसने यह भी दावा किया कि मामला दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत प्रतिबंधित था।
किरायेदार का कहना था कि मकान मालिक ₹10 लाख लौटाए बिना उस पर दुकान खाली करने का दबाव बना रहे थे। उसने किराये का बकाया होने से भी इनकार किया।
डिस्ट्रिक्ट जज ने सबूतों पर विचार करते हुए पाया कि किरायेदार ने खुद स्वीकार किया था कि वह 2014 से दुकान में किरायेदार था। वर्ष 2014 के किराया समझौते में किराया ₹25,500 प्रति माह दर्ज था। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना कि ₹10 लाख के कथित भुगतान का दावा साबित नहीं हुआ।
इसके बाद कोर्ट ने बकाया किराया और मेस्ने प्रॉफिट देते हुए मकान मालिकों के पक्ष में मुकदमा डिक्री कर दिया।
2018 के किराया समझौते पर उठाया सवाल
हाईकोर्ट में अपील करते हुए किरायेदार ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने 22 अगस्त 2018 के किराया समझौते पर गलत तरीके से भरोसा किया, जबकि उसने उस दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर और उसके निष्पादन से इनकार किया था।
उसका कहना था कि केवल नोटरी द्वारा दस्तावेज के अंतिम पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर की पहचान कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि किरायेदार ने स्वयं उस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
उसने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 67 का हवाला देते हुए कहा कि मकान मालिकों पर यह साबित करने का दायित्व था कि दस्तावेज पर मौजूद हस्ताक्षर वास्तव में उसी के थे।
अपीलकर्ता ने नोटरी की गवाही की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। उसका कहना था कि नोटरी की ओर से जारी अलग-अलग प्रमाणपत्रों में समझौते के नोटरीकरण को लेकर विरोधाभासी बातें कही गई थीं।
उसने यह भी तर्क दिया कि यदि किराया समझौते को पांच वर्ष की अवधि वाला माना जाए तो रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 17(1)(d) के तहत उसका पंजीकरण जरूरी था।
मेस्ने प्रॉफिट में हर तीन साल बाद 15 प्रतिशत बढ़ोतरी को भी इस आधार पर चुनौती दी गई कि दुकान के बाजार किराये को लेकर कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था।
किरायेदार की अपनी स्वीकारोक्तियां बनीं अहम
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कहा कि अपीलकर्ता ने दो महत्वपूर्ण तथ्यों को स्वीकार किया था। पहला, वह 2014 से संपत्ति पर कब्जे में था और दूसरा, वह उस संपत्ति में किरायेदार था।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि मकान मालिक की जिरह के दौरान किरायेदार की ओर से स्वयं यह सुझाव दिया गया था कि 24 अप्रैल 2014 का पहला समझौता दोनों पक्षों के बीच किया गया था।
किरायेदार ने अपनी जिरह में यह भी स्वीकार किया कि उसने 2014 में दुकान ₹25,500 प्रति माह के किराये पर ली थी, जिसमें मेंटेनेंस शुल्क भी शामिल था। उसने यह माना कि किराया समझौता 11 महीने के लिए था और इसमें हर साल 10 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान था।
उसने 2015, 2017 और 2018 में भी नए किराया समझौते होने की बात स्वीकार की थी।
हाईकोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादी की अपनी स्वीकारोक्तियों से बेहतर कोई साक्ष्य नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता ने एक ओर 22 अगस्त 2018 के किराया समझौते को जाली बताया, लेकिन दूसरी ओर उसने यह स्वीकार किया कि 2018 में एक किराया समझौता हुआ था। वह 2018 का कोई दूसरा किराया समझौता भी रिकॉर्ड पर नहीं ला सका।
किरायेदार की मां की गवाही भी ₹10 लाख की कथित मॉर्गेज राशि के दावे के समर्थन में नहीं थी। उन्होंने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने ऐसी कोई राशि अदा नहीं की थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष की गवाही, जिरह में की गई स्वीकारोक्तियों और अन्य साक्ष्यों पर समग्र रूप से विचार करने के बाद ही यह निष्कर्ष निकाला था कि ₹10 लाख का भुगतान साबित नहीं हुआ।
मेस्ने प्रॉफिट का आदेश भी बरकरार
मेस्ने प्रॉफिट के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने M/s Sahara India v. M.C. Agrawal HUF मामले का उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि किरायेदारी समाप्त होने के बाद भी कब्जा बनाए रखने वाले पूर्व किरायेदार से वसूले जाने वाले मेस्ने प्रॉफिट का निर्धारण इस आधार पर किया जा सकता है कि अवैध कब्जे की अवधि में संपत्ति से कितना किराया मिल सकता था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जहां आसपास की समान संपत्तियों के किराये से संबंधित प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हो, वहां शहरी क्षेत्रों में किराये की सामान्य वृद्धि का न्यायिक संज्ञान लिया जा सकता है और अंतिम संविदात्मक किराये के आधार पर उचित बढ़ोतरी दी जा सकती है।
हाईकोर्ट ने M/s Priya Exhibitors (P) Ltd. v. Oriental Bank of Commerce मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें लगातार कब्जा बने रहने की स्थिति में संविदात्मक किराये पर 15 प्रतिशत वृद्धि के आधार पर मेस्ने प्रॉफिट तय किया गया था।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने 24 अप्रैल 2014 के समझौते के आधार पर ₹25,500 प्रति माह की किराया दर स्वीकार की थी, जिसे किरायेदार ने भी माना था।
इसी दर को आधार बनाकर मेस्ने प्रॉफिट और उपयोग एवं कब्जा शुल्क तय किया गया तथा अनधिकृत कब्जे की अवधि के दौरान हर तीन साल बाद मासिक किराये में 15 प्रतिशत की वृद्धि दी गई।
हाईकोर्ट ने अपील में कोई मेरिट नहीं पाई और उसे खारिज कर दिया। लंबित अर्जियों का भी निस्तारण कर दिया गया।
Case Title: Siddhanth Mendiratta v. Madhu Chawla & Anr.
Case No.: RFA 1008/2026, CM APPL. 62482/2026, CM APPL. 62483/2026
Bench: Justice Neena Bansal Krishna
Date: September 28, 2026

