रंगारेड्डी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (तेलंगाना) ने एक जूता निर्माता कंपनी को तकनीकी जांच के बिना ग्राहक का वारंटी दावा खारिज करने पर कड़ी फटकार लगाई है। आयोग ने कंपनी को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराते हुए पीड़ित ग्राहक को कुल 20,999 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
20 अगस्त को सुनाए गए इस फैसले में आयोग की अध्यक्ष चितनेनी लता कुमार तथा सदस्य डी. माधवी लता और कात्यायनी खांडविल्ली की पीठ ने कंपनी को जूते की पूरी खरीद राशि 12,999 रुपये लौटाने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त, ग्राहक को हुई मानसिक परेशानी और असुविधा के लिए 5,000 रुपये का मुआवजा तथा अदालती खर्च के तौर पर 3,000 रुपये देने को कहा गया है। आयोग ने इस पूरी राशि के भुगतान के लिए 45 दिनों का समय निर्धारित किया है। वहीं, रिफंड मिलते ही ग्राहक को जूते कंपनी को वापस सौंपने होंगे।
दो महीने में ही उधड़ने लगे थे जूते
यह मामला 45 वर्षीय एक उपभोक्ता की शिकायत से जुड़ा है, जिन्होंने अक्टूबर 2025 में 12,999 रुपये खर्च कर जूते खरीदे थे। शिकायतकर्ता के अनुसार, उचित और एहतियाती इस्तेमाल के बावजूद खरीद के महज दो महीने के भीतर ही जूते छिलने लगे और उनकी ऊपरी सतह खराब हो गई।
कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज नीति के अनुसार, यदि खरीद को 14 दिन से अधिक और तीन महीने से कम समय बीता हो, उत्पाद में निर्माण संबंधी खामी हो और उसका सही इस्तेमाल किया गया हो, तो वारंटी मान्य होती है। ग्राहक ने जूतों की तस्वीरों के साथ विधिवत वारंटी क्लेम दाखिल किया, लेकिन कंपनी ने बिना किसी तकनीकी पड़ताल के इसे ‘सामान्य घिसावट’ (रेगुलर वियर एंड टियर) बताकर खारिज कर दिया। कंपनी के अड़ियल रुख से परेशान होकर पीड़ित ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
तकनीकी रिपोर्ट के बिना दावा खारिज करना अनुचित
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि कानूनी नोटिस तामील होने के बावजूद जूता कंपनी अपना पक्ष रखने आयोग के समक्ष पेश नहीं हुई। इस कारण पीठ ने उपभोक्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और तस्वीरों के आधार पर मामले की एकतरफा समीक्षा की।
पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी उत्पाद में आई खराबी को केवल ‘सामान्य टूट-फूट’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक कि कंपनी इसके समर्थन में कोई आधिकारिक तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट पेश न करे। आयोग ने कहा कि जब खराबी खरीद के कुछ ही हफ्तों के भीतर सामने आई हो और उसके पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हों, तब कंपनी का ऐसा रवैया कतई स्वीकार्य नहीं है।
आयोग ने यह भी माना कि इस मोड़ पर जूते को दोबारा जांच के लिए भेजना ग्राहक के साथ न्याय नहीं होगा। लिहाजा, कंपनी की लापरवाही को देखते हुए पूरी खरीद राशि वापस दिलाना और हर्जाना तय करना ही एकमात्र उचित उपाय है।

