बच्चों की कस्टडी में माता-पिता के अधिकार नहीं, उनका कल्याण सर्वोपरि: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिता को सौंपी कस्टडी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी का फैसला केवल माता-पिता के कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में बच्चों का कल्याण तथा उनका सर्वोत्तम हित ही सबसे महत्वपूर्ण है। जस्टिस संदीप जैन ने परिवार की आर्थिक, आवासीय और भावनात्मक परिस्थितियों पर विचार करते हुए दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंप दी। साथ ही बच्चों की मां को नियमित मुलाकात और रोजाना वीडियो कॉल के जरिए बातचीत का अधिकार दिया गया।

मामला करीब सात साल के हुरेन जुबैर और करीब तीन साल के नूर जुबैर की कस्टडी से जुड़ा था। दोनों बच्चे अपनी मां वजीहा वजाहत और नाना के साथ रह रहे थे।

पहले पिता को मिली थी अस्थायी कस्टडी

हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2026 के आदेश में पिता को हर रविवार सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक बच्चों की अस्थायी कस्टडी दी थी। स्कूल की छुट्टियों और अवकाश के दौरान भी उन्हें बच्चों की कस्टडी की अनुमति दी गई थी। इसके अलावा पिता को रोजाना शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक मोबाइल फोन के जरिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बच्चों से बातचीत की इजाजत दी गई थी।

बाद में पिता ने कोर्ट को बताया कि एक रविवार जब वह बच्चों को लेने गए तो उनके और ससुराल पक्ष के बीच विवाद हो गया और बच्चों की कस्टडी उन्हें नहीं दी गई। उनका कहना था कि इस कारण वह बच्चों से स्वतंत्र और सार्थक तरीके से बातचीत नहीं कर पा रहे हैं।

पिता ने कोर्ट के सामने यह भी कहा कि वह अपनी पत्नी के साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने के लिए तैयार हैं और बच्चों की देखभाल, शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा तथा उनके विकास के लिए उचित माहौल उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।

कोर्ट ने पिता को बच्चों से बातचीत का मौका भी दिया। हालांकि बच्चे अपनी मां और नाना की गोद में रहे और उन्हीं के साथ सहज दिखाई दिए।

कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कम उम्र को देखते हुए उन लोगों के प्रति उनके भावनात्मक लगाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके साथ वे लगातार रह रहे हैं।

पत्नी ने साथ रहने से किया इनकार

बच्चों की मां ने कोर्ट को बताया कि उनके पास फूड टेक्नोलॉजी में B.Tech और M.Tech की डिग्री है, लेकिन फिलहाल वह नौकरी नहीं कर रही हैं और अपने पिता पर निर्भर हैं।

उन्होंने कहा कि वैवाहिक घर में उनके साथ कथित रूप से उत्पीड़न और क्रूरता हुई थी और इसी कारण वह फिलहाल पति के साथ दोबारा रहने के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह पेशेवर रूप से योग्य हैं और अपनी आजीविका कमाने की क्षमता रखती हैं।

हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच सुलह कराने की कोशिश भी की। कोर्ट ने कहा कि यह प्रयास उनके वैवाहिक संबंध के साथ-साथ बच्चों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए किया गया था, लेकिन यह सफल नहीं हो सका।

कोर्ट ने पाया कि पत्नी लगातार यह कहती रही कि वह वैवाहिक घर वापस नहीं जाना चाहती। इसके बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उसकी स्पष्ट इच्छा के खिलाफ पति के साथ रहने के लिए मजबूर करने से कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

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इसके बाद कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी के सवाल पर अलग से विचार किया।

बच्चे का कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Yashita Sahu v. State of Rajasthan फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि बच्चे की कस्टडी दूसरे माता या पिता के पास होने के बावजूद हैबियस कॉर्पस याचिका पर विचार किया जा सकता है और कोर्ट अपने असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल बच्चे के सर्वोत्तम हित के लिए कर सकता है।

कोर्ट ने Somprabha Rana v. State of Madhya Pradesh फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग की कस्टडी से जुड़े मामले में सबसे महत्वपूर्ण विचार बच्चे का कल्याण है और माता-पिता के अधिकार उसके ऊपर नहीं हो सकते।

हाईकोर्ट ने अपने पूर्व फैसले Reshu and Others v. State of U.P. and Others समेत अन्य निर्णयों पर भी विचार किया।

कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कस्टडी तय करते समय केवल आर्थिक संसाधन नहीं देखे जा सकते। उनकी भावनात्मक सुरक्षा, स्थिरता, देखभाल, शिक्षा, शारीरिक विकास और उन्हें मिलने वाला पारिवारिक वातावरण भी महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“नाबालिग का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित ही निर्णायक और सर्वोपरि विचार है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“माता-पिता का अधिकार, हालांकि प्रासंगिक है, लेकिन वह अनिवार्य रूप से बच्चे के कल्याण के अधीन है।”

कोर्ट ने कहा कि नाबालिग की कस्टडी से जुड़ी कार्यवाही में केवल दोनों पक्षों के कानूनी अधिकारों की तुलना नहीं की जा सकती। कोर्ट को बच्चे की शारीरिक, भावनात्मक, शैक्षणिक, विकास संबंधी और आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ उस माहौल की स्थिरता भी देखनी होती है जिसमें उसे रखा जाना है।

मां की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर भी विचार

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों की मां ने स्वयं स्वीकार किया कि फिलहाल उनकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह अपने पिता पर निर्भर हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस कारण कि वह पेशेवर रूप से योग्य हैं और कमाने की क्षमता रखती हैं, इसे उनके खिलाफ नहीं माना जा सकता।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि कस्टडी तय करते समय वर्तमान में मौजूद वास्तविक परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए, न कि भविष्य की किसी संभावित या काल्पनिक आर्थिक स्थिति पर।

बच्चों के नाना ने कोर्ट को बताया कि वह मोबाइल फोन की दुकान चलाते हैं और प्रॉपर्टी तथा रियल एस्टेट के कारोबार से भी जुड़े हैं। हालांकि उनकी वास्तविक आय या आर्थिक क्षमता साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया।

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कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि उनकी चार अन्य बेटियां भी अविवाहित हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यह परिस्थिति समग्र पारिवारिक स्थिरता का आकलन करते समय प्रासंगिक हो सकती है, हालांकि अकेले इसी आधार पर कस्टडी का फैसला नहीं किया जा सकता।

पिता ने आर्थिक और आवासीय स्थिति का दिया विवरण

दूसरी ओर, पिता ने अपनी आर्थिक और आवासीय स्थिति बताते हुए व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया।

उन्होंने कहा कि वह एक औद्योगिक प्रतिष्ठान चला रहे हैं जिसमें करीब 20 से 30 लोग काम करते हैं और उनके पास बच्चों की देखभाल और पालन-पोषण के लिए पर्याप्त आय है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनके पास अचल संपत्तियां, एक आवासीय मकान, एक कार, तीन दोपहिया वाहन और पर्याप्त आभूषण हैं तथा उन पर कोई बकाया देनदारी नहीं है।

पिता ने यह भी बताया कि उनके पास करीब 3,000 वर्ग फुट का आवास है जिसमें जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं।

उन्होंने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह बच्चों को उचित और अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाएंगे तथा उनके शारीरिक, शैक्षणिक और समग्र विकास के लिए सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि उनकी मां और परिवार के अन्य सदस्य बच्चों की देखभाल में सहायता के लिए उपलब्ध हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने रखी गई सामग्री से यह सामने आता है कि पिता के पास बच्चों को स्थिर और सुरक्षित आवासीय वातावरण देने के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन और आवासीय सुविधाएं मौजूद हैं।

मां से बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव भी अहम

कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि दोनों बच्चे कम उम्र के हैं और लंबे समय से अपनी मां तथा नाना के साथ रह रहे हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि उनके साथ बच्चों का भावनात्मक लगाव स्वाभाविक है और इसे उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान बच्चों का अपनी मां और नाना की गोद छोड़ने में हिचक दिखाना अपने आप में यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने अपने पिता को अस्वीकार कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि पिता को भी बच्चों के साथ सार्थक और लगातार संबंध बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार हमेशा बच्चों के कल्याण के अधीन रहेगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि कस्टडी की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें बच्चों का मां और पिता दोनों के साथ रिश्ता बना रहे।

कोर्ट ने कहा:

“कस्टडी का आदेश बच्चों के किसी भी माता-पिता के साथ संबंध को तोड़ने या कमजोर करने वाला नहीं होना चाहिए, बल्कि जहां तक उनके कल्याण के अनुकूल हो, दोनों के साथ स्वस्थ और लगातार संबंध को बढ़ावा देना चाहिए।”

पिता को सौंपी गई बच्चों की कस्टडी

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सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों की कम उम्र, दोनों पक्षों की मौजूदा आर्थिक और आवासीय स्थिति, पिता की आर्थिक क्षमता, उनके द्वारा बच्चों की शिक्षा और परवरिश की जिम्मेदारी लेने की इच्छा और ऐसा कोई तथ्य सामने न आने को देखते हुए जिससे वह बच्चों की कस्टडी के लिए अयोग्य हों, बच्चों का सर्वोत्तम हित फिलहाल पिता के साथ रहने में है।

कोर्ट ने कहा:

“इस कोर्ट की सुविचारित राय है कि नाबालिग बच्चों का कल्याण और सर्वोत्तम हित वर्तमान में उनकी कस्टडी उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंपने से बेहतर तरीके से पूरा होगा।”

इसके बाद हाईकोर्ट ने हुरेन जुबैर और नूर जुबैर की कस्टडी उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंप दी।

मां को हर रविवार मिलने की अनुमति

हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता को बच्चों की कस्टडी दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मां और बच्चों के बीच संबंध खत्म या कमजोर हो जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि बच्चों को अपनी मां के लगातार स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहयोग की जरूरत है और उनके कल्याण के लिए यह जरूरी है कि यह संबंध बना रहे और मजबूत हो।

कोर्ट ने मां को हर रविवार दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक पिता के घर जाकर बच्चों से मिलने की अनुमति दी।

इसके अलावा उन्हें रोजाना शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक मोबाइल फोन पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बच्चों से बातचीत करने का अधिकार दिया गया।

हाईकोर्ट ने पिता को निर्देश दिया कि वह मां के मुलाकात और बातचीत के अधिकार का पूरा सम्मान करें और न तो स्वयं और न ही परिवार के किसी सदस्य के जरिए इसमें किसी तरह की बाधा पैदा करें।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था बच्चों और उनकी मां के बीच संबंध को बनाए रखने और मजबूत करने के उद्देश्य से की गई है और इसे बच्चों के भावनात्मक कल्याण को ध्यान में रखते हुए लागू किया जाना चाहिए।

दोनों पक्षों को परिपक्वता और संयम से व्यवहार करने तथा बच्चों की मौजूदगी या उनकी सुनने की सीमा में एक-दूसरे के खिलाफ कोई प्रतिकूल बात नहीं कहने का निर्देश दिया गया।

राज्य अधिकारियों और संबंधित प्रतिवादियों को भी आदेश के पालन के लिए जरूरी सहायता उपलब्ध कराने को कहा गया।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने हैबियस कॉर्पस याचिका का निस्तारण कर दिया।

केस टाइटल: मोहम्मद जुबैर उस्मान एवं 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य

केस नंबर: हैबियस कॉर्पस रिट पिटिशन नंबर 779 ऑफ 2026

बेंच: जस्टिस संदीप जैन

तारीख: 28 सितंबर 2026

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