सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली-NCR में हाल के दिनों में सामने आए रेप के मामलों का स्वतः संज्ञान लिया। इनमें दक्षिण-पूर्व दिल्ली के एक सार्वजनिक पार्क में 17 वर्षीय लड़की से कथित गैंगरेप की घटना भी शामिल है। कोर्ट ने रजिस्ट्री को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका दर्ज कर मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई और कानून-व्यवस्था तथा प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर सवाल उठाए।
किशोरी से जुड़ी हालिया घटना का उल्लेख करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि इससे 2012 के निर्भया मामले की पीड़ादायक यादें ताजा होती हैं और यह सवाल उठता है कि पिछले एक दशक में कानून लागू करने वाली व्यवस्थाओं ने वास्तव में कितनी प्रगति की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 17 वर्षीय लड़की से 21 सितंबर को दक्षिण-पूर्व दिल्ली में कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में तीन लोगों ने कथित तौर पर गैंगरेप किया। आरोप है कि तीनों ने खुद को पुलिसकर्मी बताया था।
इस महीने राष्ट्रीय राजधानी में यौन उत्पीड़न के कम से कम 13 मामले सामने आए हैं।
सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर कोर्ट ने जताई चिंता
बेंच ने कहा कि दिल्ली-NCR में बढ़ती ऐसी घटनाएं कानून लागू करने वाली एजेंसियों और सार्वजनिक प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से बुनियादी सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में व्यवस्थागत विफलता को दर्शाती हैं।
कोर्ट ने कहा कि गरिमा के साथ और हिंसा के भय से मुक्त होकर जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पार्क, सड़कें, बसें, मेट्रो स्टेशन, सबवे और फुटब्रिज जैसे सार्वजनिक स्थान अपर्याप्त रोशनी, निगरानी की कमी, गश्त न होने या अन्य रोकी जा सकने वाली प्रशासनिक कमियों के कारण असुरक्षित क्षेत्र नहीं बनने दिए जा सकते।
जवाबदेही तय करने और ठोस कदम उठाने पर जोर
बेंच ने कहा कि ऐसी घटनाओं पर सार्वजनिक अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से चिंता जताना समझ में आता है, लेकिन जवाबदेही के बिना ऐसे बयान बड़े संस्थागत सवाल का जवाब नहीं देते।
कोर्ट ने कहा कि केवल एकजुटता जताना इस सामाजिक बुराई का समाधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की रोकथाम, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और कमजोर वर्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ ठोस और मापने योग्य कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

