भूमि राजस्व कानूनों के तहत रिवीजन (पुनरीक्षण) क्षेत्राधिकार को स्पष्ट करते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘आंध्र प्रदेश राइट्स इन लैंड एंड पट्टादार पासबुक्स एक्ट, 1971’ (ROR एक्ट) की धारा 9 के तहत सुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) रिवीजन कार्यवाही शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी के लिए कोई पूर्व कारण बताओ नोटिस जारी करना अनिवार्य नहीं है। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने एक रिट अपील खारिज करते हुए निर्णय दिया कि कोई भी प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले प्रभावित पक्षों को रिवीजन के आधारों की जानकारी देते हुए एक नोटिस जारी करना ही कानूनन पर्याप्त है। इसके साथ ही खंडपीठ ने हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा पहले दिए गए विपरीत फैसले को भी खारिज (ओवररूल) कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दुर्गम पड्डैया, दुर्गम पामुलु और दुर्गम अंकम्मा राव द्वारा दायर एक रिट अपील से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं ने एकल पीठ द्वारा रिट याचिका (W.P. No. 20706 of 2026) में अंतरिम आवेदन पर 12 अगस्त 2026 को दिए गए आदेश को चुनौती दी थी।
अपीलकर्ताओं ने मूल रूप से जॉइंट कलेक्टर-कम-रिवीज़नल अथॉरिटी, गुंटूर द्वारा 25 जून 2026 को जारी किए गए रिवीजन नोटिस (ROC No. 2265/2026/D1) को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जॉइंट कलेक्टर ने यह नोटिस एक निजी प्रतिवादी कोल्ली रंगा रेड्डी (कोल्ली चैतन्य की ओर से) द्वारा दिए गए प्रतिवेदन के आधार पर ROR एक्ट की धारा 9 के तहत जारी किया था। अपीलकर्ताओं ने रिट याचिका के साथ-साथ इस नोटिस के आधार पर होने वाली आगे की सभी कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी।
एकल पीठ ने कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया था कि वे क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्तियों सहित अपने सभी बिंदु जॉइंट कलेक्टर के समक्ष पूछताछ की तारीख पर रखें। एकल पीठ ने जॉइंट कलेक्टर को यह भी निर्देश दिया था कि वे गुण-दोष पर जाने से पहले सबसे पहले क्षेत्राधिकार के सवाल पर निर्णय लें। इस आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ताओं ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील श्री पी. साई सूर्य तेजा ने तर्क दिया कि सुओ मोटो कार्यवाही शुरू करने से पहले रिवीज़नल अथॉरिटी के लिए यह अनिवार्य था कि वह ऐसा अधिकार प्रयोग में लाने का प्रस्ताव रखते हुए पहले एक नोटिस जारी करे। उन्होंने दलील दी कि चूंकि नोटिस सुओ मोटो अधिकार का इस्तेमाल शुरू करने के बाद जारी किया गया था, इसलिए जॉइंट कलेक्टर के पास इस मामले में आगे बढ़ने का कोई क्षेत्राधिकार ही नहीं था।
अपने तर्क के समर्थन में अपीलकर्ताओं के वकील ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की ही एकल पीठ के पूर्व फैसले हेल्दी एग्रो एंटरप्राइजेज प्रा. लि. बनाम आंध्र प्रदेश राज्य पर भरोसा जताया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मेसर्स डी.एन. रॉय एंड एस.के. बनर्जी और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य वाले फैसले का हवाला दिया गया था। अपीलकर्ताओं का कहना था कि जब तक यह कारण बताने के लिए प्राथमिक नोटिस न दिया जाए कि सुओ मोटो कार्यवाही क्यों शुरू की जाए, तब तक प्राधिकारी का क्षेत्राधिकार ग्रहण करना अवैध माना जाएगा। इसके अलावा उन्होंने यह रेखांकित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रज़ा टेक्सटाइल्स लि. बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर, रामपुर निर्णय का भी हवाला दिया कि किसी अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र का न्यायिक परीक्षण किया जा सकता है।
दूसरी तरफ, आधिकारिक प्रतिवादियों (क्रमांक 1 से 5) की ओर से पेश असिस्टेंट गवर्नमेंट प्लीडर श्री के. दिलीप नायक ने अपील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ROR एक्ट, 1971 की धारा 9 सक्षम प्राधिकारी को स्पष्ट रूप से सुओ मोटो रिवीजन शुरू करने की शक्ति देती है। उन्होंने धारा 9 के परंतुक (प्रोवाइज़ो) और आंध्र प्रदेश राइट्स इन लैंड एंड पट्टादार पास बुक्स रूल्स, 1989 के नियम 23(2) का उल्लेख करते हुए बताया कि कानून केवल यह अपेक्षा करता है कि कोई भी प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले प्रभावित व्यक्ति को पक्ष रखने का अवसर मिले और रिवीजन के आधारों की सूचना दी जाए। उन्होंने कहा कि जारी किए गए नोटिस में विशिष्ट मुद्दों का उल्लेख था और स्पष्टीकरण मांगा गया था, इसलिए नोटिस में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और एकल पीठ ने अपीलकर्ताओं को जॉइंट कलेक्टर के समक्ष अपनी बात रखने का उचित निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
खंडपीठ ने विचार के लिए मुख्य कानूनी प्रश्न तय किया: क्या ROR एक्ट की धारा 9 के तहत सुओ मोटो कार्यवाही शुरू करने से पहले संबंधित व्यक्ति को नोटिस देना आवश्यक है, या फिर यह नोटिस धारा 9 और नियम 23(2) के तहत कार्यवाही शुरू करने के बाद केवल प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले दिया जाना चाहिए?
एक्ट की धारा 9 का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि यह कानून कलेक्टर को अधिकार देता है कि वह किसी रिकॉर्डिंग अथॉरिटी, मंडल रेवेन्यू ऑफिसर या रेवेन्यू डिवीशनल ऑफिसर द्वारा धारा 3, 5, 5-A या 5-B के तहत पारित आदेशों की वैधता, शुद्धता और औचित्य की जांच के लिए रिकॉर्ड तलब कर सकता है। धारा 9 का परंतुक स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा, जब तक उसे अपना पक्ष रखने का मौका न दिया गया हो। इसके साथ ही 1989 के नियमों का नियम 23(2) कहता है कि सुओ मोटो रिवीजन शुरू किए जाने पर इसके आधार प्रभावित होने वाले व्यक्ति को सूचित किए जाएंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कानून में किसी अतिरिक्त प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है, तो अदालतें अपनी तरफ से शर्तें नहीं जोड़ सकतीं:
“कानून या नियमों में जो अतिरिक्त शर्तें तय नहीं की गई हैं, उन्हें अपनी तरफ से नहीं थोपा जा सकता। कानून में जिसकी कल्पना ही नहीं की गई है, उसे जोड़ना अदालत द्वारा कानून बनाने जैसा होगा, जिसकी सामान्यतः अनुमति नहीं दी जा सकती।”
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के डी.एन. रॉय मामले की व्याख्या करते हुए उसे वर्तमान कानून से अलग बताया। अदालत ने पाया कि डी.एन. रॉय मामले में मिनरल कन्सेशन रूल्स, 1960 के नियम 54 और 55 पर विचार किया गया था, जिनमें न तो सुओ मोटो रिवीजन का स्पष्ट प्रावधान था और न ही नोटिस की कोई प्रक्रिया तय थी। वहां केंद्र सरकार ने पक्षकार को बताए बिना ही अपना पुराना आदेश रद्द कर दिया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने नियमों में स्पष्टता न होने के कारण प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लागू किया था।
इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश के ROR एक्ट और 1989 के नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पहले से ही शामिल हैं। इसलिए अदालत ने माना कि दोहरे नोटिस (पहले प्रक्रिया शुरू करने के लिए नोटिस और फिर आधारों का नोटिस) की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है:
“हमारे सुविचारित मत में, ROR एक्ट, 1971 की धारा 9 के तहत सुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) कार्यवाही शुरू करने के लिए ऐसी कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है कि पहले संबंधित व्यक्ति को यह कारण बताने के लिए नोटिस दिया जाए कि सुओ मोटो अधिकार क्यों न इस्तेमाल किए जाएं, और फिर दूसरा कारण बताओ नोटिस देकर वे आधार बताए जाएं जिनके तहत अधिकार का इस्तेमाल किया जा रहा है। कानून केवल एक नोटिस की अपेक्षा करता है और डी.एन. रॉय मामले में भी सुओ मोटो कार्यवाही शुरू करने के लिए ऐसे एक ही नोटिस की जरूरत थी।”
हाईकोर्ट ने एकल पीठ के पूर्व फैसले हेल्दी एग्रो एंटरप्राइजेज पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उस फैसले में डी.एन. रॉय के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया गया था। खंडपीठ ने उस पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए कहा:
“हेल्दी एग्रो एंटरप्राइजेज मामले में एकल पीठ ने डी.एन. रॉय फैसले को सही तरीके से लागू नहीं किया था… इसलिए हम एकल पीठ के उस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। उस सीमा तक हम हेल्दी एग्रो एंटरप्राइजेज के फैसले को खारिज (ओवररूल) करते हैं और यह तय करते हैं कि 1989 के नियमों के नियम 23(2) के साथ पठित ROR एक्ट की धारा 9 के प्रावधानों के तहत नोटिस जारी करना ही पर्याप्त कानूनी अनुपालन है।”
रज़ा टेक्सटाइल्स मामले पर खंडपीठ ने कहा कि हालांकि अर्ध-न्यायिक आदेशों की न्यायिक समीक्षा स्थापित कानून है, लेकिन वर्तमान मामला अभी केवल कारण बताओ नोटिस के स्तर पर है। कारण बताओ नोटिस की न्यायिक समीक्षा केवल अत्यंत सीमित आधारों (जैसे क्षेत्राधिकार का पूर्ण अभाव) पर ही की जा सकती है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की यह दलील पूरी तरह खारिज कर दी कि धारा 9 के तहत कार्यवाही शुरू करने से पहले कोई प्राथमिक नोटिस देना जरूरी था। अदालत ने निर्णय दिया कि जॉइंट कलेक्टर के पास इस मामले में सुनवाई का पूरा क्षेत्राधिकार है और जारी किया गया नोटिस कानूनी प्रावधानों के अनुरूप है।
इसी आधार पर खंडपीठ ने रिट अपील को खारिज कर दिया और अपीलकर्ताओं को प्राधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखने की छूट दी:
“रिट अपीलकर्ता सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नोटिस पर अपनी आपत्तियां या स्पष्टीकरण दाखिल कर सकते हैं। संबंधित प्राधिकारी कानून के अनुसार, त्वरित रूप से और सभी पक्षों को उचित अवसर देते हुए मामले पर विचार कर निर्णय लेगा।”
अदालत ने इस आदेश की प्रति जिला कलेक्टर और जॉइंट कलेक्टर, गुंटूर को भेजने का निर्देश दिया तथा सभी लंबित अंतरिम याचिकाओं को बिना किसी खर्च के समाप्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दुर्गम पड्डैया और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, राजस्व विभाग, प्रधान सचिव द्वारा प्रतिनिधित्व, अमरावती व अन्य
वाद संख्या: रिट अपील संख्या 999/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर
निर्णय की तिथि: 20.08.2026

