मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस शमीम अहमद ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच सिविल या रेंट कंट्रोल की कार्यवाही लंबित रहने से आपराधिक जांच पर कोई रोक नहीं लगती, बशर्ते शिकायत में संज्ञेय अपराध के तत्व स्पष्ट रूप से सामने आते हों। संपत्ति मालिकों द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सैदापेट, चेन्नई के 18वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पुलिस को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कर जबरन घुसपैठ, तोड़फोड़, चोरी और आपराधिक धमकी के आरोपों की जांच करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद चेन्नई के मायलापुर स्थित डॉ. राधाकृष्णन सलाई के एक व्यावसायिक परिसर (दुकान) से जुड़ा है, जिसकी मालकिन याचिकाकर्ताओं में से एक भानुमति वेझवेन्दन हैं। यह संपत्ति मूल रूप से मार्च 2016 में एम. अजान फिरोज को किराये पर दी गई थी। इसके बाद अक्टूबर 2016 में दूसरे प्रतिवादी एम. कामराज ने ‘ब्रंच चाट एंड ज्यूसेज’ नाम से पार्टनरशिप फर्म बनाकर इस परिसर के एक हिस्से में अपना कारोबार शुरू किया।
फरवरी 2019 में मूल किरायेदार की गिरफ्तारी के बाद किराये के भुगतान और कब्जे को लेकर विवाद गहरा गया। बेदखली की आशंका को देखते हुए कामराज ने चेन्नई की सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जहां अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के बिना उनके कब्जे में दखल न देने का स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) आदेश जारी किया। दूसरी तरफ, मालकिन ने रेंट कोर्ट में बेदखली की याचिका दाखिल की, जिस पर जुलाई 2023 में रेंट कोर्ट ने बेदखली का आदेश तो दे दिया लेकिन बकाया किराये की मांग खारिज कर दी। इस फैसले के खिलाफ दोनों पक्षों ने अपीलें दायर कीं, जो अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष विचाराधीन हैं।
कामराज का आरोप है कि नवंबर और दिसंबर 2024 के दौरान याचिकाकर्ताओं—वी. वेत्री वेन्दन, भानुमति वेझवेन्दन और एझिल वेन्धन—ने कई अज्ञात लोगों के साथ मिलकर जबरन दुकान में घुसपैठ की। उन्होंने ताले तोड़े, दुकान में तोड़फोड़ की, डीप फ्रीजर, फर्नीचर और लगभग 15 लाख रुपये का व्यावसायिक सामान हटा दिया तथा दुकान खाली कराने के लिए जान से मारने की धमकियां दीं। कामराज ने रोयापेट्टा पुलिस स्टेशन और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को शिकायतें दीं, लेकिन पुलिस ने इसे दीवानी विवाद बताकर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया। इसके बाद कामराज ने मजिस्ट्रेट अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसने 1 नवंबर 2025 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। इसी आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि यह पूरा मामला विशुद्ध रूप से दीवानी प्रकृति का है और मकान मालिक व किरायेदार के बीच का विवाद पहले से ही रेंट कोर्ट और अपीलीय अदालत में विचाराधीन है। उन्होंने दावा किया कि यह शिकायत केवल बेदखली आदेश के खिलाफ दबाव बनाने और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए गढ़ी गई है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने बिना न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए यह आदेश पारित किया, शिकायतकर्ता ने पहले की कार्यवाही को छुपाया और सीसीटीवी फुटेज की सत्यता भी संदिग्ध है।
इसके विपरीत, शिकायतकर्ता कामराज के वकील ने तर्क दिया कि धारा 156(3) के तहत दिया गया आदेश किसी के दोष या सिविल अधिकारों का फैसला नहीं करता, बल्कि सिर्फ जांच शुरू कराने का जरिया है। उन्होंने कहा कि सिविल कोर्ट का सुरक्षात्मक आदेश लागू होने के बावजूद याचिकाकर्ताओं ने गंभीर अपराध किए। शिकायतकर्ता ने पुलिस के समक्ष सभी वैधानिक विकल्प आजमाए थे और इसके बाद ही अदालत की शरण ली। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीसीटीवी फुटेज और साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी का प्रमाण पत्र मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, और तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच केवल पुलिस अनुसंधान व ट्रायल का विषय है।
सरकारी वकील ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि यह एक तर्कसंगत आदेश है और इसमें हाईकोर्ट के दखल की कोई आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियां
कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत प्रारंभिक जांच का दायरा सीमित होता है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मजिस्ट्रेट द्वारा निभाया जाने वाला वैधानिक दायित्व केवल यह देखने तक सीमित है कि क्या पूरी शिकायत को पढ़ने पर ऐसे संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है जिसमें पुलिस जांच आवश्यक है।”
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को सिरे से नकार दिया कि रेंट विवाद लंबित होने के कारण आपराधिक मामला नहीं चल सकता। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया:
“वास्तविक कसौटी यह नहीं है कि सिविल कार्यवाही लंबित है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या प्रथम दृष्टया दंडनीय अपराध के तत्व बनते हैं। यदि आरोपों से आपराधिक ट्रेसपास, चोरी, नुकसान पहुंचाने, आपराधिक धमकी या किसी अन्य संज्ञेय अपराध का पता चलता है, तो जांच एजेंसी पर सिविल मुकदमेबाजी के बावजूद जांच करने की वैधानिक बाध्यता है। सिविल दायित्व और आपराधिक दायित्व अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। एक का अस्तित्व दूसरे को समाप्त नहीं करता।”
अपने इस दृष्टिकोण की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई नजीरों का उल्लेख किया:
- रॉकी बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था कि यदि तथ्यात्मक आधार दोनों का समर्थन करते हैं तो सिविल और आपराधिक कार्यवाहियां एक साथ वैध रूप से चल सकती हैं।
- सी.एस. प्रसाद बनाम सी. सत्यकुमार व अन्य मामले में शीर्ष अदालत ने माना था कि सिविल अदालतों के निर्णय आपराधिक संलिप्तता को स्वतः खारिज नहीं करते और आपराधिक दायित्व की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
- नजीबुल रहीम खान व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में यह सिद्धांत पुष्ट किया गया था कि एक ही घटनाक्रम और कारण पर सिविल व आपराधिक दोनों प्रक्रियाएं पोषणीय हैं।
- अक्कम्मा सैम जैकब बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी मामले को केवल सिविल विवाद मानकर शुरुआती स्तर पर ही जांच को दबा देना अनुचित है।
- बिहार राज्य बनाम ए.सी. सल्दान्हा मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश देने की स्वतंत्र शक्तियों को रेखांकित किया।
हाईकोर्ट ने मकान मालिकों को आपराधिक दायित्व से किसी भी प्रकार की प्रतिरक्षा मिलने की दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा:
“याचिकाकर्ताओं का यह व्यापक तर्क अस्वीकार्य है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच उत्पन्न होने वाला हर विवाद आपराधिक जांच से अछूता रहेगा। ऐसा तर्क स्वीकार करने का अर्थ होगा सिविल मुकदमों के पक्षों को अनुचित छूट देना और सिविल कार्यवाही के दौरान किए गए आपराधिक कृत्यों को सिर्फ इसलिए जांच से बचा लेना क्योंकि एक सिविल उपाय भी मौजूद है। ऐसा परिणाम सिद्धांत और लोक नीति दोनों के विपरीत होगा।”
पुलिस की निष्क्रियता पर धारा 156(3) की भूमिका को रेखांकित करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“यह प्रावधान पुलिस की मनमानी निष्क्रियता के खिलाफ एक न्यायिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। जहां पुलिस निराधार आधारों पर संज्ञेय अपराधों की जांच करने से इनकार करती है, वहां मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह उन्हें अपने वैधानिक कर्तव्य का पालन करने का निर्देश दे।”
सीसीटीवी साक्ष्य के मुद्दे पर अदालत ने पाया कि पेन ड्राइव और धारा 65बी का प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर पेश किया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच, उनकी प्रामाणिकता और बचाव पक्ष के दावों का मूल्यांकन ट्रायल का विषय है, न कि रिवीजन के स्तर पर अदालत का।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट के आदेश में किसी प्रकार की अवैधता या क्षेत्राधिकार से जुड़ी त्रुटि नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया और सैदापेट के 18वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के 1 नवंबर 2025 के आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने रोयापेट्टा थाने के पुलिस इंस्पेक्टर को निर्देश दिया कि वह 22 नवंबर 2024 की शिकायत पर तत्काल एफआईआर दर्ज करें और कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच आगे बढ़ाएं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: वी. वेत्री वेन्दन और अन्य बनाम इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस, ई-2 रोयापेट्टा पुलिस स्टेशन और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन केस संख्या 2579/2025 एवं क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन संख्या 22724 व 2738/2025
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 25 सितंबर 2026

