संविधान के आर्टिकल 227 के तहत दायर एक याचिका का निपटारा करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि विवादित जमीन पर दावा करने वाला हस्तक्षेपकर्ता प्लॉट के कब्जे और हिस्से को लेकर बने असमंजस को दूर करने के लिए एक आवश्यक पक्षकार है। संपत्ति विवाद में हस्तक्षेप याचिका स्वीकार करने के निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने वादी की रिट याचिका खारिज कर दी और लंबित टाइटल सूट को गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद रांची के सबऑर्डिनेट जज-प्रथम की अदालत में याचिकाकर्ता शबाना खातून द्वारा दायर टाइटल सूट संख्या 173/2011 से जुड़ा है। इस मुकदमे में शबाना खातून ने विवादित संपत्ति पर अपने अधिकार, स्वत्व और हित की घोषणा के साथ-साथ रांची नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों को उनके शांतिपूर्ण कब्जे में दखल देने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी।
विवादित जमीन रांची के लोअर बाजार अंतर्गत कांटाटोली चौक, टमटमटोली रोड पर स्थित है। यह संपत्ति एम.एस. प्लॉट संख्या 375, होल्डिंग संख्या 218, वार्ड संख्या VI (पुराना) / वार्ड संख्या 23/13, खासतहाल प्लॉट संख्या 2048 के तहत आती है, जिसका कुल रकबा 3 कट्ठा 9 छटाक है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यह संपत्ति मूल रूप से सत्य रंजन भट्टाचार्य की थी, जिन्होंने वहां चारदीवारी और कमरों का निर्माण कराया था और अपने परिवार के साथ रहते थे। इसके बाद 1968 में मणीन्द्र नाथ चक्रवर्ती का नाम नगरपालिका रिकॉर्ड में दर्ज हुआ और वे नियमित रूप से टैक्स जमा करते रहे। चक्रवर्ती ने 26 सितंबर 1980 को रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए यह जमीन स्वपन कुमार साहा को बेच दी। इसके बाद स्वपन कुमार साहा ने 16 फरवरी 1995 को रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से यह संपत्ति शबाना खातून को बेच दी। खरीद के बाद शबाना खातून ने अंचल अधिकारी और रांची नगर निगम से अपने नाम पर म्यूटेशन भी करा लिया।
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान कांटाटोली चौक स्थित पब्लिक उर्दू मिडिल स्कूल के अध्यक्ष मो. साबिर ने मामले में हस्तक्षेप याचिका दायर की। सबऑर्डिनेट जज-प्रथम, रांची ने 24 फरवरी 2014 को इस याचिका को स्वीकार करते हुए मो. साबिर को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया। निचली अदालत के इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित कुमार दास और अधिवक्ता शिवम उत्कर्ष सहाय ने दलील दी कि निचली अदालत ने गलत आधार पर आदेश पारित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि हस्तक्षेपकर्ता का मुकदमे की संपत्ति में कोई अधिकार, स्वत्व या हित नहीं है, जिससे उसे प्रतिवादी बनाया जा सके। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा कि उर्दू स्कूल याचिकाकर्ता की जमीन पर नहीं, बल्कि उसी प्लॉट के किसी दूसरे हिस्से पर चल रहा है, जिसे टाइटल सूट में साक्ष्यों के आधार पर तय किया जा सकता है।
दूसरी ओर, रांची नगर निगम की ओर से पेश अधिवक्ता रे रजत नाथ ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हस्तक्षेपकर्ता एक आवश्यक पक्षकार है। उन्होंने दलील दी कि जब कोई तीसरा पक्ष ऐसे दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखता है जो संपत्ति में उसकी रुचि दर्शाते हैं, तो मुकदमों की बहुलता रोकने के लिए अदालत प्रथम दृष्टया उसके अधिकार को स्वीकार कर हस्तक्षेप की अनुमति दे सकती है।
वकालतनामा दाखिल होने के बावजूद हस्तक्षेपकर्ता (प्रतिवादी संख्या 4) की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ और न ही राज्य सरकार (प्रतिवादी संख्या 3) की ओर से कोई हाजिर हुआ। मामला 2014 से लंबित होने के कारण हाईकोर्ट ने उनकी अनुपस्थिति में ही गुण-दोष के आधार पर सुनवाई पूरी की।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
निचली अदालत के आदेश का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने हस्तक्षेपकर्ता द्वारा पेश किए गए कई प्रशासनिक और नगर निगम दस्तावेजों पर विचार किया था। इनमें रांची नगर निगम द्वारा जारी 7 मई 2010 का पत्र संख्या 1345 शामिल था, जिसमें एम.एस. प्लॉट संख्या 375 को निगम की संपत्ति बताते हुए होल्डिंग संख्या 218 को रद्द कर दिया गया था।
इसके अलावा 5 मई 2010 के एक पत्र में नगर निगम ने नगर अंचल अधिकारी से शबाना खातून का म्यूटेशन रद्द करने का अनुरोध किया था और प्लॉट संख्या 375 ‘परती कदम’ (रकबा 0.484) को निगम की संपत्ति बताया था। हस्तक्षेपकर्ता ने 10 मार्च 2010 का काम रोकने का नोटिस और पूर्व रिट याचिका में नगर निगम का आदेश पत्र भी पेश किया, जिसमें कहा गया था कि प्लॉट संख्या 375 खतियानी जमीन है जिस पर नगर निगम के कब्जे में उर्दू स्कूल संचालित है।
हाईकोर्ट ने पाया कि एक तरफ याचिकाकर्ता निर्माण और स्वामित्व का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ रिकॉर्ड बताते हैं कि उक्त प्लॉट पर स्कूल संचालित है। स्वयं याचिकाकर्ता के वकील ने माना कि स्कूल उसी प्लॉट के दूसरे हिस्से पर चल रहा है।
मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने के कानूनी सिद्धांतों पर विचार करते हुए जस्टिस द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले विदुर इम्पेक्स एंड ट्रेडर्स (पी) लिमिटेड बनाम तोश अपार्टमेंट्स (पी) लिमिटेड (2012) का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को उद्धृत करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“41. यद्यपि पूर्वोक्त कुछ निर्णयों में की गई टिप्पणियों में स्पष्ट विरोधाभास दिखता है, लेकिन पक्षकार बनाने के आवेदन के निपटारे के व्यापक सिद्धांत इस प्रकार हैं: 41.1. अदालत कार्यवाही के किसी भी चरण में, पक्षों के आवेदन पर या स्वतः संज्ञान लेते हुए, किसी भी ऐसे व्यक्ति को पक्षकार के रूप में जोड़ने का निर्देश दे सकती है जिसे वादी या प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जाना चाहिए था या जिसकी उपस्थिति मुकदमे के मुद्दों के प्रभावी और पूर्ण निपटारे के लिए आवश्यक है। 41.2. आवश्यक पक्षकार वह व्यक्ति है जिसे मुकदमे में शामिल किया जाना अनिवार्य है और जिसकी अनुपस्थिति में अदालत द्वारा कोई प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती। 41.3. उचित पक्षकार वह व्यक्ति है जिसकी उपस्थिति अदालत को सभी मामलों और मुद्दों पर पूरी तरह, प्रभावी और सही ढंग से निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, भले ही वह ऐसा व्यक्ति न हो जिसके पक्ष में या जिसके खिलाफ डिक्री पारित की जानी हो। 41.4. यदि कोई व्यक्ति उचित या आवश्यक पक्षकार नहीं पाया जाता है, तो अदालत को वादी की इच्छा के विरुद्ध उसे पक्षकार बनाने का अधिकार नहीं है। 41.5. विशिष्ट अनुपालन के मुकदमे में, अदालत ऐसे खरीदार को पक्षकार बनाने का आदेश दे सकती है जिसका आचरण निष्कलंक हो और जिसने लंबित मुकदमे की जानकारी मिलने के उचित समय के भीतर पक्षकार बनने का आवेदन किया हो। 41.6. हालांकि, यदि आवेदक अवमाननापूर्ण आचरण का दोषी है या किसी गुप्त लेनदेन का लाभार्थी है अथवा संपत्ति के मालिक द्वारा अदालत के रोक आदेश के उल्लंघन में किए गए लेनदेन का लाभार्थी है या आवेदन में अनुचित देरी की गई है, तो अदालत पक्षकार बनाने की प्रार्थना को खारिज करने के लिए पूरी तरह उचित होगी।”
इन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मौजूदा मामले में, पूर्वोक्त पृष्ठभूमि के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवादी संख्या 4 द्वारा उसी प्लॉट के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं और प्लॉट के हिस्से को लेकर असमंजस की स्थिति है। ऐसे में इस असमंजस को दूर करने के लिए हस्तक्षेपकर्ता एक आवश्यक पक्षकार था और इसे ध्यान में रखते हुए विद्वान अदालत ने हस्तक्षेप याचिका को सही तरीके से स्वीकार किया है। लंबित टाइटल सूट में उपस्थित पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर विद्वान अदालत द्वारा इसके गुण-दोष तय किए जा सकते हैं।”
अदालत का निर्णय
सबऑर्डिनेट जज-प्रथम, रांची द्वारा 24 फरवरी 2014 को पारित आदेश में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने शबाना खातून की रिट याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मामले में पहले दिए गए अंतरिम रोक आदेश को हटा दिया और दोनों पक्षों को निचली अदालत में पेश होने की छूट दी, ताकि लंबित टाइटल सूट कानून के अनुसार आगे बढ़ सके।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शबाना खातून बनाम रांची नगर निगम एवं अन्य
वाद संख्या: डब्लू.पी. (सी.) संख्या 2328/2014
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 21.09.2026

