तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि बार एसोसिएशन की ओर से बहिष्कार का आह्वान किसी वकील को कोर्ट जाने या अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाने से रोकने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक दिन के विरोध या बहिष्कार की स्थिति में भी किसी वकील को धमकाना, उस पर दबाव डालना, रास्ता रोकना या उसके साथ मारपीट करना स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने यह टिप्पणी मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट बार एसोसिएशन, नामपल्ली के पदाधिकारियों के खिलाफ एक वकील की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
याचिकाकर्ता वकील का आरोप था कि 16 जून 2025 को बार एसोसिएशन की ओर से बुलाए गए एक दिन के बहिष्कार में शामिल नहीं होने के कारण उसे कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोका गया और उसके साथ मारपीट की गई।
बहिष्कार में शामिल न होने पर मारपीट का आरोप
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसे कोर्ट में प्रवेश करने से रोका गया और बार एसोसिएशन के महासचिव ने उससे एडवोकेट बैंड उतारकर वहां से चले जाने को कहा।
उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे थप्पड़ मारा गया और उसके साथ मारपीट की गई, जिससे वह सीढ़ियों से गिर गया और उसके सिर तथा माथे पर चोट आई।
प्रतिवादियों ने इन आरोपों का खंडन किया। इस घटना को लेकर आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की गई थी।
किसी वकील को बहिष्कार में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने दोहराया कि वकीलों को सामान्य रूप से हड़ताल करने या कोर्ट के काम का बहिष्कार करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए किसी वकील को कोर्ट से दूर रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि बार एसोसिएशन ने बहिष्कार का फैसला किया है। यदि कोई वकील कोर्ट में पेश होना चाहता है, तो उसे धमकी, दबाव या किसी प्रतिकूल कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि किसी असाधारण परिस्थिति का हवाला देकर बहिष्कार या विरोध किया भी जाए, तब भी कोर्ट जाने या कानूनी उपाय अपनाने वाले वकील, पक्षकार या किसी अन्य व्यक्ति को डराया, रोका या नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
सीमित अपवाद भी धमकी या मारपीट की अनुमति नहीं देता
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन सिद्धांतों का उल्लेख किया जिनके तहत केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में, जब बार या बेंच की गरिमा, स्वतंत्रता या अखंडता का सवाल हो, सीमित अवधि के लिए कोर्ट कार्य से दूर रहने की गुंजाइश हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में भी बहिष्कार एक दिन से अधिक नहीं हो सकता। बार अध्यक्ष को पहले संबंधित चीफ जस्टिस या जिला जज से परामर्श करना होगा और संबंधित न्यायिक प्राधिकारी के निर्णय का पालन करना होगा।
इस मामले में हाईकोर्ट ने नोट किया कि बहिष्कार का प्रस्ताव वकीलों पर हमलों के विरोध और एकजुटता जताने के लिए पारित किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि किसी वकील पर कथित हमले को लेकर एकजुटता जताना अपने आप में न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता। उसने यह भी कहा कि वकीलों की सुरक्षा और गरिमा, बार की स्वतंत्रता और प्रभावी कामकाज से जुड़ी हुई है।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि प्रस्ताव पारित करने से पहले बार अध्यक्ष ने संबंधित मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज से परामर्श किया था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियां एक दिन के सीमित बहिष्कार के अपवाद के दायरे में आती भी हों, तब भी यह छूट केवल कोर्ट के काम से दूर रहने तक सीमित है। इससे कोर्ट जाने वाले वकील के खिलाफ धमकी, जबरदस्ती, रास्ता रोकने या शारीरिक हमला करने की अनुमति नहीं मिलती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिवादी संख्या 5 के खिलाफ जिस आचरण का आरोप लगाया गया है, यदि वह साबित होता है, तो वह किसी भी ऐसे अपवाद के दायरे से बाहर होगा।
सिर्फ पदाधिकारी होने से अवमानना की जिम्मेदारी तय नहीं हो सकती
इन टिप्पणियों के बावजूद हाईकोर्ट ने अवमानना कार्यवाही को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने पाया कि याचिका में बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के खिलाफ सामूहिक रूप से कार्रवाई की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की अलग भूमिका और उसके खिलाफ ठोस सामग्री के बिना आम तौर पर सभी प्रतिवादियों के खिलाफ सामूहिक रूप से अवमानना कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।
कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 5 को छोड़कर अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ किसी विशिष्ट कृत्य का पर्याप्त विवरण सामने नहीं आया। केवल बार एसोसिएशन में कोई पद संभालने के आधार पर किसी व्यक्ति पर अवमानना की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
मारपीट से जुड़े विवादित तथ्यों पर समानांतर जांच से इनकार
हाईकोर्ट ने पक्षों के अलग-अलग दावों और इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि कथित घटना को लेकर आपराधिक कार्यवाही पहले ही शुरू हो चुकी है।
कोर्ट ने कहा कि अवमानना अदालत के लिए उन्हीं विवादित तथ्यों पर समानांतर रूप से फैसला करना उचित नहीं होगा, खासकर जब कथित मारपीट का आरोप विशेष रूप से प्रतिवादी संख्या 5 के खिलाफ लगाया गया था, न कि सभी पदाधिकारियों के खिलाफ।
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता उसी दिन आखिरकार कोर्ट परिसर में प्रवेश कर सका और मजिस्ट्रेट के सामने मामले में उपस्थित हुआ।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह नहीं दिखा कि बहिष्कार के बावजूद कोर्ट आए किसी अन्य वकील के साथ भी पदाधिकारियों ने इसी तरह मारपीट, धमकी या दबाव का व्यवहार किया हो।
अवमानना याचिका खारिज, बार पदाधिकारियों को सावधानी बरतने की हिदायत
हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका खारिज कर दी, लेकिन यह साफ किया कि इस फैसले को किसी ऐसे कृत्य की मंजूरी या समर्थन नहीं माना जाए जिसमें बहिष्कार के बावजूद कोर्ट जाने वाले वकील के साथ मारपीट, धमकी, जबरदस्ती या रास्ता रोकने जैसी कार्रवाई की गई हो।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी विरोध या बहिष्कार के आयोजन या उसमें भागीदारी के दौरान बार पदाधिकारियों को पूरी सावधानी, संयम और जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी हड़ताल या बहिष्कार का आह्वान सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप ही होना चाहिए और उससे किसी व्यक्ति की कोर्ट तक पहुंच बाधित नहीं होनी चाहिए या न्याय प्रशासन में रुकावट नहीं आनी चाहिए।

