सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि क्या ऐसे टेंडर विवाद को जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है, जिसमें असल मुद्दा दो प्रतिस्पर्धी कंपनियों के दावों की तुलना करना हो। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील सुन रही थी, जिसमें करीब ₹23 करोड़ के सड़क निर्माण से जुड़े टेंडर को रद्द कर शेष काम के लिए दोबारा टेंडर जारी करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सफल ठेकेदार को तीन महीने के भीतर पूरा काम खत्म करने का मौका दिया है। काम उसी दर पर पूरा करना होगा, जिस दर पर 15 मार्च 2024 को ठेका दिया गया था। यदि तीन महीने में काम पूरा नहीं होता है, तो गुणवत्ता की जांच के बाद शेष काम के लिए मौजूदा बाजार दर पर नया टेंडर जारी किया जाएगा।
क्या इस तरह का टेंडर विवाद PIL का विषय बन सकता है?
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबसे अहम सवाल यह है कि जब विवाद दो टेंडर प्रतिभागियों के दावों की तुलना से जुड़ा हो, तो क्या उसे PIL के जरिए उठाया जा सकता है।
बेंच ने कहा:
“मौजूदा मामले में जो सवाल साफ तौर पर सामने आता है, वह यह है कि क्या ऐसे टेंडर की वैधता, जिसमें प्रतिस्पर्धी टेंडरदाताओं के दावों की तुलना करनी हो, PIL में चुनौती का विषय बन सकती है?”
कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताई क्योंकि हाईकोर्ट के सामने उठाए गए अधिकांश मुद्दे दो कंपनियों के बीच तुलनात्मक आकलन से जुड़े थे।
बेंच ने यह भी नोट किया कि काम की कुल लागत ₹23 करोड़ थी। कोर्ट ने कहा कि यह रकम ऐसी नहीं थी जिसके आधार पर PIL में सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी का मुद्दा उठाया जा सके।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था टेंडर
मामला PMGSY Package No. HP-09-694 के तहत Matiana-Mahori-Chhaila सड़क के Km 0/00 से 25/650 तक के उन्नयन कार्य से जुड़ा है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 24 दिसंबर 2024 को CWPIL No. 30 of 2024 में फैसला देते हुए सफल ठेकेदार के पक्ष में दिया गया काम रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को शेष काम के लिए एक महीने के भीतर नया टेंडर जारी करने का निर्देश दिया था।
इसी फैसले के खिलाफ सफल ठेकेदार और हिमाचल प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
हाईकोर्ट के सामने किन बातों पर था विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने उन मुद्दों का भी उल्लेख किया जिनके आधार पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया था।
इनमें यह सवाल शामिल था कि M/s PK Construction Pvt. Ltd. की शिकायत वास्तव में अधिकारियों को मिली थी या नहीं और यदि मिली थी तो बाद में वापस ली गई थी या नहीं।
यह भी विवाद था कि सफल ठेकेदार का अनुभव sub-contractor के रूप में था या prime contractor के रूप में। इसके अलावा यह सवाल भी उठा कि क्या वह टेंडर की शर्तों के तहत दो अलग-अलग नामों से काम कर सकता था।
हाईकोर्ट ने sub-contract से जुड़ी शर्तों और experience certificate में दर्ज काम की प्रकृति पर भी विचार किया था।
PIL याचिकाकर्ता को असफल कंपनी का ‘alter ego’ बताया
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट में PIL दाखिल करने वाला व्यक्ति असफल कंपनी के “alter ego” के रूप में टेंडर प्रक्रिया को चुनौती दे रहा था।
बेंच ने दर्ज किया:
“इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि हाईकोर्ट के सामने PIL याचिकाकर्ता ने असफल टेंडरदाता के alter ego के रूप में टेंडर प्रक्रिया को चुनौती दी।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि असफल कंपनी ने पहले सफल ठेकेदार के खिलाफ शिकायत की थी, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया।
तीन किलोमीटर सड़क का काम पूरा
सुनवाई के दौरान सफल ठेकेदार ने 3 सितंबर 2026 के हलफनामे के जरिए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शिमला जिले में Matiana-Mohri Road पर तीन किलोमीटर सड़क निर्माण का काम पूरा हो चुका है। इसके साथ retaining walls और breast walls का काम भी किया जा चुका है।
ठेकेदार ने कहा कि वह शेष काम भी उसी दर पर पूरा करने को तैयार है, जिस दर पर 15 मार्च 2024 को उसे ठेका दिया गया था। उसने कोर्ट को यह भी भरोसा दिलाया कि काम की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जाएगा।
तीन महीने में पूरा करना होगा बाकी काम
सुप्रीम कोर्ट ने ठेकेदार के आश्वासन को देखते हुए उसे पूरा काम खत्म करने के लिए तीन महीने का समय दिया।
कोर्ट ने साफ किया कि काम 15 मार्च 2024 वाली दरों पर ही पूरा किया जाएगा।
यदि तय समय में काम पूरा नहीं होता है, तो अधिकारियों द्वारा काम की गुणवत्ता की जांच के बाद शेष काम के लिए मौजूदा बाजार दर पर नया टेंडर जारी किया जाएगा।
दिसंबर में फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दिसंबर 2026 के पहले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया है। तब ठेकेदार को कोर्ट के सामने compliance report दाखिल करनी होगी।
यह आदेश हिमाचल प्रदेश सरकार की Civil Appeal No. 12969 of 2026 पर भी लागू होगा।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 7 मार्च 2025 के अंतरिम आदेश के जरिए अधिकारियों को तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने से रोका गया था। मौजूदा आदेश की सीमा तक उस अंतरिम आदेश में बदलाव किया गया है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: O.P. Mehta v. Mohinder Kalta & Ors.
केस नंबर: Civil Appeal No. 12968 of 2026
बेंच: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
तारीख: 23 सितंबर 2026

