इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पत्नी के खिलाफ परित्याग (डेजर्शन) के आधार पर तलाक की डिक्री पारित की गई हो, तब भी वह विवाह विच्छेद की तिथि से दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) पाने की हकदार है। सुल्तानपुर की फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण याचिका को पूरी तरह खारिज करने के आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने कहा कि विवाह के अस्तित्व के दौरान परित्याग के आधार पर पत्नी भरण-पोषण से वंचित हो सकती है, लेकिन तलाक के बाद पुनर्विवाह करने या स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम होने तक वह धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (b) के तहत ‘पत्नी’ का दर्जा बनाए रखती है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता महिला का विवाह बचपन में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था और विवाह के नौ वर्ष बाद उसका गौना संपन्न हुआ। गौने के बाद पति को भारतीय सेना के ईएमई कोर में नायक/ड्राइवर के पद पर नौकरी मिल गई। दोनों के दांपत्य जीवन से एक बच्चे का जन्म हुआ।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि वर्ष 2007 में पति और उसके ससुराल वालों ने एक लाख रुपये नकद, एक मोटरसाइकिल और रंगीन टीवी की अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उसने यह भी आरोप लगाया कि 12 फरवरी 2007 की रात उसे जिंदा जलाने का प्रयास किया गया, जिसकी शिकायत उसने पुलिस अधिकारियों से की थी। वर्ष 2008 में पति ने उसके साथ मारपीट की और दावा किया कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है। इसके बाद पति दूसरी महिला को अपने घर ले आया और याचिकाकर्ता व उसके बच्चे का भरण-पोषण करने से मना कर दिया।
अक्टूबर 2008 में याचिकाकर्ता ने आर्मी वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन के समक्ष भरण-पोषण के लिए आवेदन किया। इसके बाद वर्ष 2009 में उसने एसीजेएम, सुल्तानपुर की अदालत में धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण वाद दायर किया, जिसे बाद में फैमिली कोर्ट सुल्तानपुर में स्थानांतरित कर दिया गया।
दूसरी ओर, पति ने विवाह और गौने की बात तो स्वीकार की, लेकिन दावा किया कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी उचित कारण के उसका परित्याग कर दिया और ससुराल में रहने से मना कर दिया। पति के अनुसार 16 फरवरी 2007 को पुलिस के सामने एक समझौता हुआ था, जिसमें उसने बिना अनुमति ससुराल न छोड़ने की बात कही थी, फिर भी वह वापस नहीं लौटी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए भी याचिका दायर की थी। बाद में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक का वाद दायर किया, जिसे फैमिली कोर्ट ने 25 सितंबर 2014 को परित्याग के आधार पर एकतरफा (एक्स-पार्टी) मंजूर कर लिया। इसके बाद पति ने दूसरा विवाह कर लिया और सेना के सेवा अभिलेखों में अपनी दूसरी पत्नी का नाम दर्ज करा दिया।
22 दिसंबर 2018 को प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, सुल्तानपुर ने याचिकाकर्ता की धारा 125 सीआरपीसी की अर्जी खारिज कर दी। फैमिली कोर्ट ने माना कि वह अलग रहने का पर्याप्त और उचित कारण साबित करने में विफल रही और यह भी दर्ज किया कि पति के वेतन से सेना द्वारा भरण-पोषण के लिए 15 प्रतिशत की कटौती की जा रही थी। इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने उसका भरण-पोषण दावा एक गैर-मौजूद आधार पर खारिज किया है। सेना के रिकॉर्ड के अनुसार, 12 जुलाई 2011 के आदेश के तहत पति के वेतन और भत्तों से 15 प्रतिशत की कटौती केवल नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए स्वीकृत की गई थी, न कि याचिकाकर्ता के लिए। इसके अलावा, 31 दिसंबर 2018 को पति के सेवानिवृत्त होने के बाद सेना ने 19 जनवरी 2019 के पत्र द्वारा यह कटौती बंद कर दी और स्पष्ट किया कि पेंशन से भरण-पोषण राशि नहीं काटी जा सकती, इसलिए वह सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाए।
दूसरी तरफ, पति के वकील ने तर्क दिया कि वर्ष 2008 से याचिकाकर्ता और बच्चे दोनों के लिए उसके वेतन से 15 प्रतिशत राशि नियमित रूप से भेजी जा रही थी। पति के वकील ने 25 सितंबर 2014 की एकतरफा तलाक डिक्री का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि तलाक परित्याग के आधार पर हुआ था, इसलिए याचिकाकर्ता भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है। इसके साथ ही मद्रास हाईकोर्ट के माहेश्वरी बनाम अय्यप्पन उर्फ कुमार निर्णय का हवाला दिया गया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 के तहत पुनर्विवाह की वैधता पर दिल्ली हाईकोर्ट के सीमा देवी बनाम श्री रंजीत कुमार भगत और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—कृष्णावेणी राय बनाम पंकज राय, अनुराग मित्तल बनाम शैली मिश्रा मित्तल, और लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण पर चर्चा की गई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि सैन्य अधिकारियों के पत्रों में इस बात को लेकर विरोधाभासी बयान थे कि 15 प्रतिशत की कटौती केवल बेटे के लिए थी या मां और बेटे दोनों के लिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष सही था कि याचिकाकर्ता के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है, क्योंकि पति यह साबित करने में विफल रहा कि वह सिलाई, कढ़ाई, शिक्षण या दूध बेचकर 15,000 रुपये प्रति माह कमाती है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या जिस पत्नी के खिलाफ परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है, वह धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण की हकदार है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“इसलिए, इस पहलू पर कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि एक तलाकशुदा महिला भी तब तक भरण-पोषण पाने की हकदार है जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती या अपनी कमाई से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हो जाती, बशर्ते कोई कानूनी रोक न हो।”
कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले रोहताश सिंह बनाम श्रीमती रामेंद्री व अन्य (एआईआर 2000 एससी 952) पर भरोसा जताया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया था कि धारा 125(4) सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण से वंचित करने वाली शर्तें—जैसे जारकर्म (व्यभिचार) में रहना, बिना किसी पर्याप्त कारण के पति के साथ रहने से इनकार करना या आपसी सहमति से अलग रहना—वैवाहिक संबंधों के अस्तित्व पर निर्भर करती हैं। जब सक्षम अदालत द्वारा तलाक की डिक्री देकर विवाह समाप्त कर दिया जाता है, तो अलग रहने के ‘पर्याप्त कारण’ की अनिवार्यता अप्रासंगिक हो जाती है।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (b) के अनुसार, तलाकशुदा महिला अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने के सीमित उद्देश्य के लिए तब तक ‘पत्नी’ मानी जाती है जब तक कि वह पुनर्विवाह न कर ले। अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले शिव कुमार धीर बनाम अंजलि रानी (1983 सीआरएलजे 36) का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि पति द्वारा परित्याग के आधार पर प्राप्त तलाक डिक्री तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण के दावे में बाधा नहीं बन सकती।
इन नजीरों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा:
“भले ही विपक्षी संख्या 2 के तर्क के आधार पर और फैमिली कोर्ट द्वारा 25.09.2014 को परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री पारित किए जाने के कारण याचिकाकर्ता उस अवधि से पूर्व स्वयं के भरण-पोषण की हकदार न पाई जाए, फिर भी वह तलाक के बाद अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है, जो 25.09.2014 से प्रभावी हुआ है।”
अदालत ने आगे निर्देश दिया:
“याचिकाकर्ता तलाक की तिथि यानी 25.09.2014 से अपने जीवनकाल में पुनर्विवाह करने तक अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है।”
नाबालिग बेटे के संदर्भ में हाईकोर्ट ने माना कि वह आवेदन की तिथि से वयस्क होने की आयु प्राप्त करने तक भरण-पोषण का हकदार है, सिवाय उस अवधि के जब उसे सेना के माध्यम से भरण-पोषण राशि प्राप्त हुई थी।
अदालत का निर्णय
फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण की अर्जी को पूरी तरह खारिज करने के फैसले को कानूनी और तथ्यात्मक त्रुटियों से ग्रस्त मानते हुए हाईकोर्ट ने 22 दिसंबर 2018 का आदेश रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने आपराधिक रिवीजन को स्वीकार करते हुए मामले को फैमिली कोर्ट, सुल्तानपुर को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि कानून के अनुसार छह महीने के भीतर याचिका का त्वरित निस्तारण किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा ((2021) 2 एससीसी 324) मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुपालन में दोनों पक्षों को पुनर्विचार की शुरुआत में अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
फैमिली कोर्ट में मामले के अंतिम निस्तारण तक हाईकोर्ट ने पति को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में याचिकाकर्ता को 4,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया और कहा कि पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों के तहत किए गए किसी भी भुगतान को अंतिम बकाया राशि में समायोजित किया जाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्रीमती सुनीता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 254/2019
पीठ: जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर 2026

