फर्स्ट अपील में हाईकोर्ट के क्रमिक आदेश भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 28ए के तहत लिमिटेशन की नई मियाद नहीं देते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28ए के तहत मुआवजे के पुनर्निर्धारण की मांग के लिए हाईकोर्ट द्वारा फर्स्ट अपील में एक के बाद एक पारित किए गए आदेश कोई नया वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) पैदा नहीं करते और न ही तीन महीने की वैधानिक लिमिटेशन अवधि को आगे बढ़ाते हैं। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भूस्वामियों के आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसी अधिसूचना और उसी गांव से जुड़े मामले में हाईकोर्ट द्वारा मुआवजे में वृद्धि के पहले आदेश के तीन महीने बीतते ही लिमिटेशन समाप्त हो चुकी थी, इसलिए बाद के आदेश पर आधारित आवेदन समय-सीमा से बाहर (टाइम-बार्ड) था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4(1) सहपठित धारा 17 के तहत शुरू की गई अधिग्रहण की कार्यवाही से जुड़ा है। इसमें विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने 15 फरवरी, 1977 को अवॉर्ड पारित किया था। प्रतिवादी भूस्वामियों के पूर्वजों ने पूरा मुआवजा बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया और धारा 18 के तहत कोई रेफरेंस याचिका दायर नहीं की।

हालाँकि, उसी अधिसूचना के तहत अधिग्रहीत भूमि के अन्य स्वामियों ने धारा 18 के अंतर्गत रेफरेंस की मांग की। गाजियाबाद के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज ने 25 नवंबर, 1981 को उनकी रेफरेंस याचिका खारिज कर दी। इसके खिलाफ उन भूस्वामियों ने हाईकोर्ट में अधिनियम की धारा 54 के तहत फर्स्ट अपील (फर्स्ट अपील संख्या 458/1982) दाखिल की।

हाईकोर्ट ने 18 अप्रैल, 2022 को इस फर्स्ट अपील का निपटारा करते हुए मुआवजा बढ़ा दिया। हाईकोर्ट का यह फैसला 8 जुलाई, 2019 को फर्स्ट अपील संख्या 593/1982 में दिए गए एक पूर्व निर्णय पर आधारित था। इस 18 अप्रैल, 2022 के फैसले के बाद, प्रतिवादी भूस्वामियों ने 23 मई, 2022 को कलेक्टर के समक्ष धारा 28ए के तहत आवेदन प्रस्तुत किया और आदेश के तीन महीने के भीतर समानता के आधार पर बढ़ा हुआ मुआवजा मांगा।

कलेक्टर ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट के अवॉर्ड पर नहीं, बल्कि धारा 54 के तहत अपीलीय डिक्री पर आधारित होने के कारण पोषणीय (मेंटेनेबल) नहीं है। भूस्वामियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने तीन जजों की पीठ के फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रदीप कुमारी (1995) और खंडपीठ के निर्णय बनवारी बनाम हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (2024) का हवाला देते हुए कलेक्टर को आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया। नोएडा प्राधिकरण ने हाईकोर्ट के इसी निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

READ ALSO  केवल इस आशंका पर पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले के पासपोर्ट का दुरुपयोग किया गया होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता नोएडा प्राधिकरण की ओर से दलील दी गई कि धारा 28ए के तहत प्रतिवादियों का आवेदन न तो पोषणीय था और न ही समय-सीमा के भीतर था। प्राधिकरण का तर्क था कि धारा 28ए का लाभ केवल रेफरेंस कोर्ट के अवॉर्ड से ही मिल सकता है। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि यदि किसी अपीलीय आदेश को आधार बनाया भी जाए, तो लिमिटेशन की गणना उस पहले आदेश से होगी जिसमें मुआवजा बढ़ाया गया था, न कि उन बाद के आदेशों से जो केवल पहले के फैसले का अनुसरण करते हैं।

इसके विपरीत, प्रतिवादी भूस्वामियों के वकील ने तर्क दिया कि प्रदीप कुमारी के फैसले के अनुसार प्रत्येक नया अवॉर्ड एक स्वतंत्र अधिकार देता है। चूंकि भूमि अधिग्रहण कानून एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए फर्स्ट अपील में आने वाले क्रमिक अपीलीय आदेशों से भी धारा 28ए के तहत नया अधिकार मिलना चाहिए। प्रतिवादियों ने अंदानय्या बनाम डिप्टी चीफ इंजीनियर (2026), बबुआ राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995) और भारतसिंग बनाम महाराष्ट्र राज्य (2018) का हवाला देते हुए दलील दी कि मर्जर के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ मर्जर) के तहत हाईकोर्ट के अपीलीय आदेश के आधार पर धारा 28ए की अर्जी पूरी तरह वैध है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने धारा 28ए के कानूनी ढांचे और विभिन्न पीठों द्वारा दिए गए निर्णयों का गहन विश्लेषण किया।

पीठ ने उल्लेख किया कि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रदीप कुमारी (1995) में तीन जजों की पीठ ने पार्ट III के तहत रेफरेंस कोर्ट के किसी भी बाद के अवॉर्ड के तीन महीने के भीतर धारा 28ए की अर्जी लगाने की अनुमति इसलिए दी थी, ताकि साक्ष्य के अभाव या अलग-अलग गांवों के भूस्वामियों के बीच असमानता को दूर किया जा सके। लेकिन अदालत ने रेखांकित किया कि प्रदीप कुमारी का फैसला धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट द्वारा धारा 26 में दिए जाने वाले अवॉर्ड के संदर्भ में था, न कि हाईकोर्ट की फर्स्ट अपील के आदेशों के लिए।

READ ALSO  Govt must be given latitude to make adjustments necessary to save nation, says SC on Sec 6A of citizenship law

इसके बाद अदालत ने तीन जजों की पीठ के निर्णय जोस एंटोनियो क्रूज़ डॉस आर. रोड्रिग्स बनाम लैंड एक्विजिशन कलेक्टर (1996) का संदर्भ दिया। इस फैसले में तय किया गया था कि धारा 28ए में उल्लिखित “कोर्ट” शब्द का तात्पर्य केवल धारा 18 वाले रेफरेंस कोर्ट से है, और लिमिटेशन की गणना रेफरेंस कोर्ट के अवॉर्ड की तारीख से होती है, अपीलीय अदालत के आदेश से नहीं। इस सिद्धांत की पुष्टि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम हंसोली देवी (2010) में दो जजों की पीठ ने भी की थी।

समय-सीमा की कठोरता को रेखांकित करते हुए पीठ ने पोपट बहिरू गोवर्धन बनाम स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर (2013) के सिद्धांत को दोहराया:

“यहाँ हमें तत्काल पोपट बहिरू गोवर्धन और अन्य के मामले में आए फैसले पर ध्यान देना होगा, जिसमें स्पष्ट रूप से यह माना गया था कि धारा 28ए के तहत परिसीमा (लिमिटेशन) का समय अवॉर्ड की तारीख से शुरू होता है, न कि उसकी जानकारी मिलने की तारीख से।”

इसके बाद पीठ ने बनवारी बनाम एचएसआईआईडीसी (2024) के फैसले पर विचार किया, जिसमें अपीलीय आदेश के आधार पर धारा 28ए लागू करने की एक विशेष परिस्थिति बताई गई थी। बनवारी मामले में रेफरेंस कोर्ट ने धारा 18 के तहत रेफरेंस को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कोई वृद्धि नहीं की थी, जिससे उस स्तर पर धारा 28ए का कोई आधार नहीं बना था। जब हाईकोर्ट ने पहली बार फर्स्ट अपील में मुआवजा बढ़ाया, तब जाकर पहली बार धारा 28ए का अधिकार उत्पन्न हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक विधायी शून्यता (कैसस ओमीसस) माना:

“इसलिए, जब रेफरेंस कोर्ट द्वारा रेफरेंस खारिज कर दिया जाता है, तो अपील में पारित आदेश के आधार पर धारा 28ए के तहत आवेदन का यह उपाय एक ‘कैसस ओमीसस’ (कानून में छूटी हुई बात) है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि जैसा कि ‘बनवारी’ मामले में तय किया गया था, धारा 18 के तहत रेफरेंस खारिज होने की स्थिति में इस कल्याणकारी कानून का उद्देश्य विफल न हो; यह स्पष्ट रूप से एक ऐसी स्थिति थी जिसकी विधायिका ने कल्पना नहीं की थी।”

वर्तमान मामले के तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने पाया कि फर्स्ट अपील संख्या 458/1982 में 18 अप्रैल, 2022 का आदेश कोई नया मुआवजा तय नहीं कर रहा था। वह आदेश केवल 8 जुलाई, 2019 को फर्स्ट अपील संख्या 593/1982 में दिए गए पूर्व फैसले पर आधारित था, जो उसी अधिसूचना और उसी गांव की भूमि से संबंधित था। अदालत ने टिप्पणी की:

READ ALSO  बच्चों को विमान में चढ़ने से रोकने पर कतर एयरवेज पर भारी जुर्माना, उपभोक्ता आयोग ने लगाया 10.25 लाख का हर्जाना

“प्रतिवादी पक्षकारों का धारा 28ए के तहत दावा, जिसकी परिसीमा 08.07.2019 से शुरू हुई थी, उसके तीन महीने बीतने के साथ ही कालबाधित (टाइम-बार्ड) हो गया था।”

अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि हाईकोर्ट के हर नए आदेश से बार-बार नई लिमिटेशन शुरू होगी:

“हमें इस बात पर भी बल देना होगा कि फर्स्ट अपील में एक के बाद एक आने वाले आदेशों से धारा 28ए के तहत नया वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उत्पन्न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि फर्स्ट अपील में ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ होने के नाते हाईकोर्ट अपनी ही किसी समन्यवय पीठ (कोऑर्डिनेट बेंच) द्वारा पहली बार दिए गए आदेश से बंधा होता है।”

पीठ ने दो जजों की पीठ के निर्णय अंदानय्या बनाम डिप्टी चीफ इंजीनियर (2026) से भी असहमति जताई, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश के बाद मर्जर के सिद्धांत पर दूसरा धारा 28ए आवेदन स्वीकार किया गया था। पीठ ने कहा कि यह दृष्टिकोण जोस एंटोनियो क्रूज़ और प्रदीप कुमारी जैसी तीन जजों की पीठों के फैसलों के विपरीत है, क्योंकि प्रदीप कुमारी में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि एक आवेदक द्वारा केवल एक ही धारा 28ए आवेदन दायर किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी भूस्वामियों का आवेदन 8 जुलाई, 2019 से गिनी जाने वाली तीन महीने की वैधानिक लिमिटेशन अवधि बीत जाने के काफी समय बाद दायर किया गया था, इसलिए यह कानूनन समय-सीमा से बाहर था।

अदालत ने नोएडा की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया और भूस्वामियों के धारा 28ए के तहत दिए गए आवेदन को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी और अन्य बनाम राजवीर सिंह और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या … / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 18801/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 21 सितंबर, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles