सार्वजनिक निविदाओं में अयोग्यता को राजस्व लाभ से वैध नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने सबसे ऊंची बोली लगाने वाले की अयोग्यता बरकरार रखी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निविदा (टेंडर) की अनिवार्य पात्रता शर्तों को केवल अधिक राजस्व मिलने के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मिक्की ट्रेडर्स और पंजाब स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड की ओर से दायर अपीलों को खारिज करते हुए सबसे ऊंची बोली लगाने वाले (एच1) को टेंडर आवंटित करने के फैसले को रद्द करने के हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि “एक निविदा की शुरुआत प्रतिस्पर्धा से होती है, लेकिन वह नियमों के आधार पर ही आगे बढ़ती है।” कोर्ट ने दो टूक कहा कि निविदा जारी करने वाले प्राधिकारी द्वारा अपनी शर्तों की व्याख्या मूल दस्तावेज़ के शब्दों के दायरे में ही होनी चाहिए और लगभग 1.5 करोड़ रुपये की अधिक बोली किसी गैर-पात्र बोलीदाता को पात्र नहीं बना सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मार्केट कमेटी, लुधियाना द्वारा 13 फरवरी 2026 को जारी एक विस्तृत निविदा आमंत्रण नोटिस (डीएनआईटी) से जुड़ा है। इसके तहत 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक 12 महीनों की अवधि के लिए फल, सब्ज़ियों और अन्य खाद्य सामग्री लाने वाले खुदरा व अन्य वाहनों से मंडी के बुनियादी ढांचे के उपयोग पर यूज़र चार्ज (उपयोग शुल्क) की वसूली और वसूली अधिकार देने के लिए बोलियां आमंत्रित की गई थीं। इस कार्य के लिए वार्षिक आरक्षित मूल्य 12,21,58,500 रुपये निर्धारित किया गया था।

डीएनआईटी की शर्त 11(ix) और पंजाब स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड के ठेकेदार फर्मों के सूचीबद्धीकरण (एनलिस्टमेंट) संबंधी निर्देशों के क्लॉज 9(c)(a) के तहत बोलीदाताओं के पास कार्य समाप्ति प्रमाण पत्र होना आवश्यक था। इसमें शर्त रखी गई थी कि बोलीदाता के पास “सरकारी/अर्ध-सरकारी/पीएसयू संगठनों में पिछले 2 वर्षों (31 दिसंबर 2025 तक) के दौरान वार्षिक यूज़र चार्ज/पार्किंग फीस वसूली का सफल कार्य निष्पादन” होना चाहिए।

इस निविदा प्रक्रिया में कुल पांच बोलीदाताओं ने भाग लिया। मिक्की ट्रेडर्स (एच1 बोलीदाता) की तकनीकी बोली को पात्र पाया गया और उसकी 16,51,51,000 रुपये की वित्तीय बोली को सबसे अधिक होने के कारण स्वीकार कर लिया गया। दूसरे स्थान पर रहे एल.आर.वाई. लेबर कांट्रैक्टर (एच2 बोलीदाता) ने 15,03,33,000 रुपये की बोली लगाई थी। एच2 बोलीदाता ने आपत्ति जताते हुए कहा कि मिक्की ट्रेडर्स के पास पार्किंग फीस या यूज़र चार्ज वसूली का निर्धारित अनुभव नहीं है। इसके बावजूद 20 मार्च 2026 को मिक्की ट्रेडर्स के पक्ष में लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस (एलओए) जारी कर दिया गया।

इसके खिलाफ एल.आर.वाई. लेबर कांट्रैक्टर ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट के समक्ष यह दलील दी गई कि मिक्की ट्रेडर्स ने 31 दिसंबर 2025 तक के दो साल के यूज़र चार्ज संग्रह अनुभव के बजाय केवल 16 दिसंबर 2023 से 15 दिसंबर 2024 के बीच पशु मेलों (कैटल फेयर) के आयोजन में भागीदारी के प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए थे। 27 मई 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मिक्की ट्रेडर्स की तकनीकी और वित्तीय बोलियों की स्वीकृति के साथ-साथ एलओए को रद्द कर दिया और प्राधिकारियों को पात्र निविदाकार के पक्ष में एलओए जारी करने का निर्देश दिया। इसके बाद मिक्की ट्रेडर्स और बोर्ड दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं।

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पक्षों की दलीलें

मिक्की ट्रेडर्स के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे को पार करते हुए निविदा प्राधिकारी की व्याख्या की जगह अपनी व्याख्या को थोप दिया, जबकि प्राधिकारी के फैसले में दुर्भावना (माला फाइड), मनमानापन या विकृति का कोई आधार नहीं था। एफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम नागपुर मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और सिल्पी कंस्ट्रक्शंस कांट्रैक्टर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि टेंडर का लेखक ही उसकी शर्तों का सर्वोत्तम निर्णायक होता है। यह भी कहा गया कि क्लॉज 9(c)(a) की व्याख्या अत्यंत तकनीकी और शाब्दिक रूप से करने के बजाय व्यावहारिक और उद्देश्यपरक तरीके से की जानी चाहिए, जैसा कि के.पी. वर्गीज बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर में निर्धारित किया गया था। मिक्की ट्रेडर्स की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि सूचीबद्धीकरण निर्देश केवल मार्गदर्शक (डायरेक्टरी) थे, फर्म का अनुभव उसके मालिक या साझेदार का माना जाना चाहिए, और इस बोली को रद्द करने से सरकारी खजाने को लगभग 1.5 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा।

बोर्ड और मार्केट कमेटी के वकील ने भी मिक्की ट्रेडर्स का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सूचीबद्धीकरण के नियम प्रतिस्पर्धा और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से बनाए गए थे और वे केवल निर्देश मात्र थे, अनिवार्य नहीं। जगदीश मंडल बनाम स्टेट ऑफ ओडिशा और गैलेक्सी ट्रांसपोर्ट एजेंसीज बनाम न्यू जे.के. रोडवेज के निर्णयों का संदर्भ देते हुए कहा गया कि हाईकोर्ट को प्राधिकारी के वाणिज्यिक विवेक में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।

इसके विपरीत, एच2 बोलीदाता के वरिष्ठ वकील ने कहा कि मिक्की ट्रेडर्स ने 31 दिसंबर 2025 तक यूज़र चार्ज वसूलने के दो साल के अनुभव का कोई वैध प्रमाण पत्र नहीं दिया। उन्होंने तर्क दिया कि पंजाब कैटल फेयर्स (रेगुलेशन) रूल्स, 1968 के तहत पशु मेले का संचालन करने वाला व्यक्ति एक पट्टेदार (लेसी) होता है जो प्रशासन को किराया देता है, न कि किसी सार्वजनिक संस्था की तरफ से राजस्व संग्रह करने वाला एजेंट। इसके अलावा, जो प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए गए थे, वे तीन अलग-अलग फर्मों के नाम पर थे और मिक्की ट्रेडर्स के साथ उनका कोई कानूनी संबंध साबित नहीं किया गया था। यह भी रेखांकित किया गया कि बोर्ड ने खुद पटियाला और राजपुरा में इसी शर्त के आधार पर मिक्की ट्रेडर्स को अयोग्य घोषित किया था, और कोई भी प्राधिकारी एक ही नियम को एक जगह अनिवार्य और दूसरी जगह अपनी पसंद के बोलीदाता के लिए लचीला नहीं बना सकता।

कोर्ट का विश्लेषण

न्यायिक समीक्षा के दायरे का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टाटा सेल्युलर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, स्टर्लिंग कंप्यूटर्स लिमिटेड बनाम एम एंड एन पब्लिकेशंस लिमिटेड, एयर इंडिया लिमिटेड बनाम कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड, और मिशिगन रबर (इंडिया) लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटका के सिद्धांतों को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि अदालतें तकनीकी मूल्यांकन पर अपील अदालत की तरह विचार नहीं करती हैं, लेकिन यदि प्राधिकारी का फैसला मनमाना, विकृत या निविदा की शर्तों के विपरीत (डेहोर्स) हो, तो न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

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अग्माटेल इंडिया (पी) लिमिटेड बनाम रिसोर्सेस टेलीकॉम का उल्लेख करते हुए अदालत ने पाया कि निविदा प्राधिकारी की समझ का सम्मान तभी किया जा सकता है जब उसकी व्याख्या टेंडर दस्तावेज़ की भाषा के पूरी तरह अनुकूल हो। किम्बरले क्लब (पी) लिमिटेड बनाम कृषि उत्पादन मंडी परिषद का उद्धरण देते हुए पीठ ने कहा:

“निविदा मामलों में न्यायिक समीक्षा का प्रयोग करते समय अदालत निविदा प्राधिकारी द्वारा बोली को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले के खिलाफ अपील अदालत के रूप में कार्य नहीं करती है। केवल ऐसे मामलों में जहां ऐसा निर्णय एनआईटी की शर्तों के विपरीत हो या स्पष्ट रूप से मनमाना हो, अदालत न्यायिक समीक्षा की शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसे निर्णय को रद्द कर सकती है।”

विदर्भ इरिगेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनाम अनोज कुमार अग्रवाल का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि टेंडर के अनिवार्य शब्दों को निरर्थक या अतिरिक्त मानकर छोड़ा नहीं जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया:

“किसी प्राधिकारी द्वारा अपने ही टेंडर की दी गई व्याख्या सामान्यतः अंतिम होती है, बशर्ते वह व्याख्या ऐसी हो जिसे उसके द्वारा चुने गए शब्द वहन कर सकें और वह अनुचित, विकृत या मनमानी न हो।”

इन विधिक सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मिक्की ट्रेडर्स की बोली को स्वीकार करने में तीन बुनियादी कमियां रेखांकित कीं:

  1. आनुषंगिक संग्रह बनाम विशिष्ट दायित्व: कोर्ट ने कहा कि 16 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बड़े मंडी अनुबंध में वाहनों से यूज़र चार्ज वसूलने के लिए गेट प्रबंधन, टिकटिंग या टोकन प्रणाली, दैनिक मिलान, लेखा-जोखा और पूरे साल कर्मचारियों की देखरेख जैसे विशिष्ट अनुभव की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, पशु मेले के नियमों के तहत ठेकेदार एक पट्टेदार होता है जो नीलामी में तय किराया चुकाता है और अपने मुनाफे के लिए पार्किंग या स्टॉल शुल्क लेता है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के आनुषंगिक (इंसिडेंटल) शुल्क संग्रह को सार्वजनिक निकाय की ओर से सांविधिक यूज़र चार्ज संग्रह के समकक्ष मानना पात्रता शर्त को निरर्थक बना देगा और उस विशेषज्ञता के उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा जिसकी जांच के लिए यह शर्त रखी गई थी।
  2. असत्यापित तीसरे पक्ष के प्रमाण पत्र: प्रस्तुत किए गए प्रमाण पत्र मिक्की ट्रेडर्स के नाम पर नहीं थे, बल्कि तीन अलग-अलग फर्मों—”शादाब रविंदर एंड कंपनी, राजपुरा”, “राजपुरा, मुक्तसर कैटल फेयर, राजपुरा” और “कैपिटल कैटल फेयर, राजपुरा” के थे। कोर्ट ने पाया कि मिक्की ट्रेडर्स के मालिक रविंदर सिंह का इन फर्मों के साथ कोई कानूनी संबंध दर्शाने वाला दस्तावेज, जैसे कि साझेदारी विलेख (पार्टनरशिप डीड) या इंडियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 के तहत पंजीकरण, पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक दावे के आधार पर किसी तीसरे पक्ष के अनुभव को बोलीदाता का अनुभव नहीं माना जा सकता।
  3. विरोधाभासी आचरण: कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि मिक्की ट्रेडर्स ने पटियाला और राजपुरा मार्केट कमेटियों द्वारा इसी अनुभव शर्त के तहत अपनी बोलियों को तकनीकी रूप से अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को बिना किसी चुनौती के स्वीकार कर लिया था। पीठ ने कहा कि एक ही बोलीदाता अपनी सुविधा के अनुसार एक ही शर्त के अलग-अलग अर्थ नहीं निकाल सकता:
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“कोई भी पक्ष उसी संविदात्मक भाषा के अर्थ पर अपनी सुविधानुसार एक पक्ष से दूसरे पक्ष में जाकर अपनी ही बात से मुकर नहीं सकता (एप्रोबेट और रिप्रोबेट नहीं कर सकता)।”

मिक्की ट्रेडर्स द्वारा सरकारी खजाने को 1.5 करोड़ रुपये अधिक मिलने के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“राजस्व संबंधी विचार अयोग्यता को दूर नहीं कर सकते। बोलियों की तुलना केवल उन्हीं बोलीदाताओं के बीच की जा सकती है जो शुरुआत से ही तुलना किए जाने के लिए पात्र हों; इसके विपरीत व्यवस्था देने का अर्थ यह होगा कि प्रत्येक पात्रता शर्त को सबसे ऊंची बोली के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे, और इससे निविदा दस्तावेज़ तथा सार्वजनिक राजस्व के संग्रह में क्षमता और जवाबदेही तय करने के लिए बनाए गए सूचीबद्धीकरण निर्देश पूरी तरह निरर्थक हो जाएंगे। जिस जनहित का हवाला एच1 बोलीदाता दे रहा है, वह कमेटी को उसके द्वारा ही तय की गई शर्तों पर अडिग रखने से पूरा होता है, न कि उन्हें अनदेखा करने से।”

कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि सूचीबद्धीकरण निर्देश मात्र मार्गदर्शक थे:

“कोई शर्त सैद्धांतिक रूप से अनिवार्य और किसी पसंदीदा बोलीदाता पर लागू करते समय केवल मार्गदर्शक नहीं हो सकती।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मार्केट कमेटी द्वारा मिक्की ट्रेडर्स की बोली स्वीकार करने का फैसला पूरी तरह मनमाना और डीएनआईटी की शर्तों के विपरीत था। हाईकोर्ट के फैसले में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता न पाते हुए शीर्ष अदालत ने मिक्की ट्रेडर्स और बोर्ड दोनों की अपीलें खारिज कर दीं। इसके साथ ही पात्र निविदाकार को अनुबंध जारी करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मिक्की ट्रेडर्स बनाम एल.आर.वाई. लेबर कांट्रैक्टर एवं अन्य 

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 22161/2026 से उत्पन्न) एवं सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 23127/2026 से उत्पन्न) 

पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे

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