तेलंगाना हाईकोर्ट ने अदालती संरक्षण के बावजूद एक आरोपी को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत के आदेश की अवहेलना करने पर एक पुलिस अधिकारी को दोषी ठहराते हुए एक महीने की कैद और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
दहेज हत्या से जुड़े एक मामले में दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस के. सुजाना ने यह फैसला 18 सितंबर को सुनाया। हालांकि, सरकारी वकील के अनुरोध पर अदालत ने सजा के अमल पर चार सप्ताह के लिए रोक लगा दी है, ताकि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील दायर कर सके।
अदालत ने खारिज की अनभिज्ञता की दलील
अदालती कार्यवाही के दौरान आरोपी अधिकारी ने बिना शर्त माफी मांगते हुए दावा किया था कि उससे आदेश का जानबूझकर उल्लंघन नहीं हुआ। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि अधिकारी को संरक्षण आदेश की अवधि बढ़ाए जाने की जानकारी नहीं थी और न ही याचिकाकर्ता या उनके वकील ने गिरफ्तारी से पहले इस आदेश की प्रति सौंपी थी।
जस्टिस सुजाना ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब अधिकारी को 21 अप्रैल के मूल संरक्षण आदेश की जानकारी थी, तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि वह आगे की कानूनी स्थिति की जांच करे। अदालत ने टिप्पणी की कि जब याचिकाकर्ता के वकील ने सुरक्षा आदेश का हवाला दिया था, तब पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी करने से पहले सरकारी वकील से संपर्क करना चाहिए था या हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर स्थिति की पुष्टि करनी चाहिए थी।
दबाव में गिरफ्तारी की बात से याचिकाकर्ता के आरोपों की पुष्टि
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि व्यक्तिगत रूप से पेश होने पर अधिकारी ने खुद स्वीकार किया था कि उस पर आरोपी को गिरफ्तार करने का दबाव था। बेंच ने कहा कि अधिकारी का यह बयान याचिकाकर्ता के उन आरोपों को पुष्ट करता है कि गिरफ्तारी दबाव के तहत की गई थी। इन तथ्यों के मद्देनजर अदालत ने अधिकारी की सफाई को अस्वीकार्य करार देते हुए इसे न्यायिक आदेशों की जानबूझकर की गई अवहेलना माना।
अस्पताल से डिस्चार्ज कराकर की गई थी गिरफ्तारी
यह पूरा मामला सरूरनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक दहेज हत्या के मुकदमे से जुड़ा है। अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट पहुंचे आरोपी को अदालत ने 21 अप्रैल को राहत देते हुए जांच अधिकारी को 23 अप्रैल तक गिरफ्तारी न करने का निर्देश दिया था। इसके बाद अंतरिम संरक्षण को पहले 23 अप्रैल और फिर 27 अप्रैल तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया था।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, जब वह एक अस्पताल में इलाज करा रहे थे, तब पुलिसकर्मियों ने डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन पर उन्हें डिस्चार्ज करने का दबाव बनाया, ताकि संरक्षण के बावजूद उन्हें पकड़ा जा सके। इसके बाद 28 अप्रैल को उन्हें जबरन डिस्चार्ज कराकर पुलिस स्टेशन ले जाया गया और औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में जब पुलिस आरोपी को रिमांड के लिए स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने ले गई, तब बचाव पक्ष के वकील ने हाईकोर्ट के अंतरिम संरक्षण आदेश प्रस्तुत किए। इन आदेशों का संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिमांड याचिका खारिज कर दी और आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया था।

