चेन्नई कस्टम्स अधिकारी के एससी प्रमाण पत्र को रद्द करने का फैसला मद्रास हाईकोर्ट द्वारा निरस्त, सतर्कता समिति को नए सिरे से जांच के आदेश

मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई कस्टम्स विभाग के एक सहायक आयुक्त का अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय प्रमाण पत्र रद्द करने के प्रशासनिक फैसले को खारिज कर दिया है। अदालत ने पाया कि जिस पड़ताल समिति ने यह आदेश पारित किया था, उसने अधिकारी के शारीरिक रंग-रूप और भाषा जैसी अप्रासंगिक बातों को आधार बनाया था, जबकि अन्य निष्कर्षों के पक्ष में ठोस सबूत मौजूद नहीं थे।

जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय सतर्कता समिति को निर्देश दिया है कि वह सहायक आयुक्त एम. रविकुमार के मामले की दोबारा जांच करे। 11 सितंबर को पारित और 18 सितंबर को अपलोड किए गए इस आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह रविकुमार के जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दे रहा है, बल्कि पहले की प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाए जाने के कारण मामले को नई पड़ताल के लिए वापस भेज रहा है।

रविकुमार ने दिसंबर 1986 में जारी हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी सेवा हासिल की थी। उनके सेवाकाल के अंत में, 30 मई 2026 को होने वाली उनकी सेवानिवृत्ति से कुछ समय पहले सतर्कता समिति ने उनके प्रमाण पत्र का सत्यापन शुरू किया और 4 मई को इसे अमान्य घोषित कर दिया था।

जांच में शामिल किए गए अप्रासंगिक आधार और तथ्यात्मक खामियां

सतर्कता समिति के फैसले को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने दर्ज किया कि उसके कई मुख्य निष्कर्ष आधारहीन थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में परिवार की कद-काठी और रूप-रंग का उल्लेख करते हुए लिखा था कि वे गोरे, लंबे और मजबूत बनावट वाले हैं, घुंघराले बाल रखते हैं तथा तमिल व अंग्रेजी बोलते हैं। न्यायाधीश ने कहा कि इन शारीरिक और भाषाई विशेषताओं को किसी नृविज्ञानी (एंथ्रोपोलॉजिस्ट) के मूल्यांकन के संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया गया था और जाति की पहचान निर्धारित करने में इनकी कोई प्रासंगिकता नहीं हो सकती।

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अदालत ने समिति के निष्कर्षों में बड़ी तथ्यात्मक गड़बड़ियों की ओर भी इशारा किया। समिति ने दावा किया था कि 1994 के राशन कार्ड में रविकुमार की बेटी का नाम ईसाई दर्ज था। इसके विपरीत, रविकुमार ने यह साबित किया कि उनकी सबसे बड़ी बेटी का जन्म ही 10 नवंबर 1998 को हुआ था। न्यायाधीश ने कहा कि प्रशासन का यह निष्कर्ष पूरी तरह साक्ष्यविहीन है और टिकने योग्य नहीं है। इसके साथ ही, स्थानीय समुदाय द्वारा उन्हें स्वीकार न किए जाने के दावे के समर्थन में भी समिति ने कोई ठोस कारण या तथ्य प्रस्तुत नहीं किए थे।

परिवार का इतिहास और पुनर्वापसी की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद इस बात पर केंद्रित था कि क्या रविकुमार का हिंदू धर्म में लौटना वास्तविक था और क्या उनके समुदाय ने उन्हें स्वीकार कर लिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि रविकुमार मूल रूप से अनुसूचित जाति से ही संबंध रखते हैं।

रविकुमार के पिता मूल रूप से हिंदू आदि द्रविड़ थे, जिन्होंने 1960 में ईसाई धर्म अपना लिया था। रविकुमार का जन्म 1966 में एक ईसाई परिवार में हुआ और उनका नाम ए. सौंदरराजन रखा गया। रविकुमार के अनुसार, 1983 में उन्होंने और उनके पिता ने चेन्नई के आर्य समाज केंद्र में विधि-विधान से दोबारा हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया। इसके बाद उनके पिता का नाम आर. अय्यावू जेम्स से बदलकर आर. मुनुसामी और उनका अपना नाम ए. सौंदरराजन से एम. रविकुमार हो गया। 1986 में जब उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी हुआ, तो उसमें धर्म परिवर्तन और फिर हिंदू धर्म में वापसी के इस पूरे विवरण को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया था।

धार्मिक आचरण पर पक्षों की दलीलें

सतर्कता जांच के दौरान सरकार और कस्टम्स कमिश्नर के वकीलों ने तर्क दिया था कि यह परिवार असल में ईसाई धर्म का ही पालन कर रहा था और नौकरी तथा आरक्षण लाभ लेने के लिए ही हिंदू होने का दावा किया गया। उन्होंने रविकुमार के पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने, 1983 के बाद के कुछ दस्तावेजों व 1986 के प्रमाण पत्र पर पिता के पुराने नाम के इस्तेमाल, और चर्च के एक पत्र का हवाला दिया जिसमें पुराने नाम दर्ज थे। सरकारी पक्ष ने यह भी दलील दी कि रविकुमार चेन्नई और बेंगलुरु में रहे, उनकी मां आदि द्रविड़ बस्ती से बाहर रहती थीं, और समिति द्वारा रूप-रंग को ध्यान में रखना सही था।

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इसके जवाब में रविकुमार ने अपने हिंदू आचरण के पक्ष में कई साक्ष्य रखे। उन्होंने कहा कि वह और उनकी पत्नी हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, अपने बच्चों को उसी परंपरा में पाला है और हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उन्होंने अपने विवाह, बच्चों के मुंडन और कान छिदवाने के संस्कार तथा बेटी के हिंदू रीति से हुए विवाह की तस्वीरें पेश कीं। उनके वकील ने बताया कि एक नृविज्ञानी ने उनके घर का दौरा कर वहां पूजा कक्ष देखा था। पिता के अंतिम संस्कार को लेकर वकील ने स्पष्ट किया कि रविकुमार का छोटा भाई ईसाई धर्म मानता था और पिता की देखभाल वही कर रहा था, जबकि रविकुमार चेन्नई में सेवारत थे। इसलिए छोटे भाई द्वारा किए गए अंतिम संस्कार को रविकुमार की आस्था तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि पिता का अंतिम संस्कार विचार योग्य बिंदु हो सकता है, लेकिन बाकी आधार न्यायिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

नई जांच के लिए हाईकोर्ट के दिशानिर्देश

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि धर्म वापसी के बाद प्रमाण पत्र की पात्रता केवल औपचारिक प्रक्रिया से सिद्ध नहीं होती, बल्कि इसके लिए धर्म में स्पष्ट व दृढ़ आस्था और संबंधित समुदाय द्वारा स्वीकृति का होना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने रविकुमार को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रति मिलने के चार सप्ताह के भीतर तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय सतर्कता समिति के समक्ष पेश हों और अपनी धार्मिक आस्था व समुदाय द्वारा स्वीकृति से जुड़े फोटो और अन्य साक्ष्य दाखिल करें। समिति को आदेश दिया गया है कि वह रविकुमार को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दे, जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त साक्ष्य जुटाए, और उनके पेश होने के आठ सप्ताह के भीतर अपना नया फैसला जारी करे।

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