बच्चा न अनाथ था, न छोड़ा गया था: कलकत्ता हाईकोर्ट ने CWC को तीन वर्षीय बच्चे की कस्टडी दत्तक माता-पिता को लौटाने का दिया निर्देश

कलकत्ता हाईकोर्ट ने तीन वर्षीय बच्चे की कस्टडी उसके दत्तक माता-पिता को वापस सौंपने का निर्देश देते हुए कहा है कि बच्चा न तो अनाथ था और न ही उसे छोड़ा गया था। वह ‘देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों’ की श्रेणी में भी नहीं आता था। ऐसे में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) द्वारा बच्चे को दत्तक माता-पिता से लेकर अपनी कस्टडी में रखना कानून के अनुरूप नहीं था।

जस्टिस कृष्णा राव ने 17 सितंबर को दत्तक माता-पिता की याचिका पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने CWC को निर्देश दिया कि बच्चे की कस्टडी 18 सितंबर शाम 4 बजे तक दत्तक माता-पिता को सौंप दी जाए।

इसके साथ ही बच्चे के हित और उसकी देखभाल पर नजर रखने के लिए कोर्ट ने दक्षिण 24 परगना की जिला विधिक सेवा समिति के सदस्य सचिव को दिसंबर 2026 से हर तीन महीने में दत्तक माता-पिता से बच्चे की स्थिति और प्रगति की रिपोर्ट लेने का निर्देश दिया।

CWC को ऐसे बच्चे की कस्टडी लेने का अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि जैविक माता-पिता ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना बच्चे को दत्तक माता-पिता को सौंपा था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत केवल नोटरीकृत एडॉप्शन डीड के आधार पर दत्तक माता-पिता बच्चे की कस्टडी पर कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकते।

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि दूसरी ओर CWC को भी ऐसे बच्चे के मामले में कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था, जो न तो अनाथ था, न छोड़ा गया था और न ही ‘देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे’ की श्रेणी में आता था।

कोर्ट ने कहा कि बच्चे को उसके जैविक माता-पिता ने स्वयं दत्तक माता-पिता को सौंपा था और इसके बाद से वह उनकी देखरेख और कस्टडी में रहा। इन परिस्थितियों में CWC द्वारा बच्चे को उनकी कस्टडी से लेना कानून के अनुरूप नहीं था।

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2023 में जैविक माता-पिता ने सौंपा था बच्चा

बच्चे का जन्म 24 फरवरी 2023 को समय से पहले हुआ था। जन्म के तुरंत बाद उसे स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में भर्ती कराया गया और 21 मार्च 2023 को अस्पताल से छुट्टी मिली।

दत्तक माता-पिता के अनुसार, बच्चे के जैविक माता-पिता उसकी देखभाल करने में सक्षम नहीं थे। इसलिए उन्होंने अस्पताल से छुट्टी मिलने वाले दिन ही अपनी इच्छा से बच्चे को दत्तक माता-पिता को सौंप दिया।

इसके बाद 3 अप्रैल 2023 को जैविक और दत्तक माता-पिता ने एक एडॉप्शन डीड पर हस्ताक्षर किए। यह डीड रजिस्टर्ड नहीं थी, लेकिन इसे नोटरी कराया गया था। इसके बाद बच्चा लगातार दत्तक माता-पिता की देखरेख और कस्टडी में रहा और उन्होंने अपने बच्चे की तरह उसका पालन-पोषण किया।

स्कूल में एडमिशन के लिए जन्म प्रमाणपत्र लेने पहुंचे तो शुरू हुआ विवाद

मामला तब सामने आया जब दत्तक माता-पिता ने बच्चे का स्कूल में एडमिशन कराने के लिए जन्म प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने उस अस्पताल से संपर्क किया जहां बच्चे का जन्म हुआ था।

अस्पताल प्रशासन ने उन्हें पहले बच्चे की गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए CWC के पास जाने को कहा, जिसके बाद जन्म प्रमाणपत्र प्राप्त किया जा सकता था।

दत्तक माता-पिता के मुताबिक, वे 18 फरवरी 2026 को CWC के सामने पहुंचे और पूरे मामले की जानकारी दी। इसके बाद CWC ने बच्चे को अपनी कस्टडी में ले लिया। तभी से बच्चा CWC की कस्टडी में था।

दत्तक माता-पिता ने कहा, बच्चे के साथ दुर्व्यवहार का कोई आरोप नहीं

दत्तक माता-पिता की ओर से पेश एडवोकेट शामिक चटर्जी ने हाईकोर्ट में कहा कि बच्चे के उनके पास रहने के दौरान उसके साथ दुर्व्यवहार, उपेक्षा, शोषण, तस्करी या गलत व्यवहार किए जाने का कोई आरोप नहीं था। बच्चे को छोड़े जाने या उसे किसी तरह का शारीरिक, भावनात्मक अथवा मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाए जाने का भी कोई आरोप नहीं था।

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उनकी ओर से कहा गया कि दत्तक माता-पिता जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के उद्देश्य से CWC के पास गए थे ताकि बच्चे को उचित शिक्षा दिलाई जा सके। उनका कहना था कि प्रक्रिया पूरी कराने में मार्गदर्शन करने के बजाय CWC ने बच्चे को ही अपनी कस्टडी में ले लिया और एडॉप्शन की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि एडॉप्शन की प्रक्रिया में अनियमितता होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि बच्चा असुरक्षित था या उसे उस परिवार से अलग करना जरूरी था, जहां उसकी लगातार देखभाल हो रही थी।

राज्य ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी बताया

राज्य की ओर से पेश एडवोकेट स्वागता दत्ता ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 और एडॉप्शन रेगुलेशंस के तहत बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया निर्धारित कानून के अनुसार ही पूरी होनी चाहिए।

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राज्य की ओर से दलील दी गई कि एडॉप्शन की प्रक्रिया केवल मान्यता प्राप्त स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी के माध्यम से हो सकती है और उससे पहले CWC द्वारा बच्चे को कानूनी रूप से गोद दिए जाने के लिए स्वतंत्र घोषित किया जाना आवश्यक है।

राज्य ने कहा कि वैधानिक प्रक्रिया से बाहर की गई निजी व्यवस्था या नोटरीकृत एडॉप्शन डीड को कानूनी मान्यता नहीं मिलती।

18 सितंबर शाम 4 बजे तक बच्चा सौंपने का निर्देश

हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में बच्चे को गोद लेने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। इसके बावजूद कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि न्यायहित में बच्चे की कस्टडी दत्तक माता-पिता को वापस सौंपना उचित होगा।

कोर्ट ने CWC को 18 सितंबर शाम 4 बजे तक बच्चे को दत्तक माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया।

बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी किया। दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल की जिला विधिक सेवा समिति के सदस्य सचिव को दिसंबर 2026 से हर तीन महीने में दत्तक माता-पिता से बच्चे के कल्याण और प्रगति की रिपोर्ट लेने का निर्देश दिया गया।

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