मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि पिता की कथित रूप से उपेक्षा हुई है या उसे परिवार से नैतिक और भावनात्मक सहारा नहीं मिल रहा, वह बेटे से धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार नहीं हो जाता। जस्टिस सुंदर मोहन ने बेटे को अपने बुजुर्ग पिता को हर महीने 75,000 रुपये भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य से पिता की किराये और कारोबार से आय सामने आती है और वह अभाव या निराश्रयता की स्थिति में नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि पिता-पुत्र के रिश्ते से जुड़ी परिस्थितियां परेशान करने वाली हो सकती हैं, लेकिन उनके आधार पर धारा 125 CrPC की कानूनी शर्तों को अलग तरीके से नहीं पढ़ा जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“मामले के तथ्य निश्चित रूप से परेशान करने वाले हैं। लेकिन केवल इस कारण कानून की अलग व्याख्या नहीं की जा सकती।”
क्या था मामला?
पिता ने अपने बेटे के खिलाफ भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट का रुख किया था। उनका कहना था कि वह करीब 80 वर्ष के हैं और अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने बताया कि 17 वर्ष की उम्र से उन्होंने M/s Conjap Electronics Industries का कारोबार खड़ा किया, अपनी कमाई से कई संपत्तियां खरीदीं और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई।
पिता के मुताबिक, 2021 में बेटे ने कारोबार से जुड़ने की इच्छा जताई, जिसके बाद उसे कारोबार में 50 प्रतिशत हिस्सा दिया गया। आरोप था कि बाद में बेटे ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर M/s Conjap Electronics Private Limited बनाई और पुराने कारोबार को उसकी ओर मोड़ दिया।
पिता ने यह भी आरोप लगाया कि बेटे ने उन्हें ऑफिस जाने से रोका और उसके पक्ष में सेटल की गई अपार्टमेंट की संपत्ति के बिजली बिल, मेंटेनेंस चार्ज और प्रॉपर्टी टैक्स देना बंद कर दिया। उनका दावा था कि इन परिस्थितियों के कारण उनके पास आय का कोई साधन नहीं बचा।
दूसरी ओर, बेटे ने इन आरोपों का विरोध किया। उसका कहना था कि पिता के पास माउंट रोड पर कई कमर्शियल प्रॉपर्टी और पुरसावलकम में एक आवासीय संपत्ति है। इन संपत्तियों से उन्हें किराया मिलता है, वे अपने प्रोपराइटरशिप कारोबार से भी आय प्राप्त करते हैं और उनके पास 10 लाख रुपये से अधिक की फिक्स्ड डिपॉजिट भी है।
VI एडिशनल जज, फैमिली कोर्ट, चेन्नई ने पिता को अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ मानते हुए बेटे को हर महीने 75,000 रुपये देने का निर्देश दिया था।
बेटे ने हाईकोर्ट में दी चुनौती
बेटे की ओर से सीनियर एडवोकेट पी.आर. रमन ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पिता ने पहले Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act के तहत दो फ्लैटों से संबंधित सेटलमेंट डीड रद्द कराने की कोशिश की थी।
दलील दी गई कि संबंधित अधिकारियों और अपीलीय प्राधिकारी के सामने सेटलमेंट डीड रद्द कराने में सफल नहीं होने के बाद पिता ने भरण-पोषण की कार्यवाही शुरू की। यह भी बताया गया कि पिता अब भी उन्हीं फ्लैटों में रहते हैं क्योंकि उन्होंने उनमें अपना जीवनपर्यंत हित सुरक्षित रखा था।
बेटे की ओर से पांच कमर्शियल प्रॉपर्टी से संबंधित रेंट एग्रीमेंट भी पेश किए गए। बैंक खाते के जरिए कारोबार से आय होने का दावा किया गया। इसके अलावा असेसमेंट ईयर 2023-24 के इनकम टैक्स चालान का हवाला देते हुए बताया गया कि पिता ने 52,728 रुपये इनकम टैक्स का भुगतान किया था।
बेटे ने पिता की ओर से दाखिल संपत्ति और देनदारियों से संबंधित दो अलग-अलग हलफनामों में किए गए खुलासों पर भी सवाल उठाए।
पिता की ओर से एडवोकेट रोहिणी रविकुमार ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पिता की आर्थिक स्थिति और बेटे के दायित्व पर सही तरीके से विचार किया था। उन्होंने वृद्धावस्था में पिता को कथित रूप से अकेला छोड़ने के बेटे के आचरण का भी उल्लेख किया।
कमर्शियल प्रॉपर्टी से 82 हजार रुपये किराये का रिकॉर्ड
हाईकोर्ट ने पाया कि Ex.R7 से Ex.R11 के रूप में पेश रेंट एग्रीमेंट विवादित नहीं थे और उनसे पता चलता था कि पिता कमर्शियल प्रॉपर्टी से कुल 82,000 रुपये किराया प्राप्त कर रहे थे। ये एग्रीमेंट 2020 से 2022 के बीच किए गए थे, लेकिन 22 दिसंबर 2023 को दाखिल पहले संपत्ति और देनदारी संबंधी हलफनामे में इस आय का खुलासा नहीं किया गया था।
कोर्ट ने 18 मार्च 2024 को दाखिल दूसरे हलफनामे की भी जांच की और उसमें बताई गई किराये की आय में अंतर पाया।
Tony Vision नाम से बताई गई एक संपत्ति से पिता ने हर महीने 16,000 रुपये किराया दिखाया था, जबकि Ex.R7 के मुताबिक 11 नवंबर 2024 को उस संपत्ति का मासिक किराया 30,000 रुपये था। जिरह के दौरान किराया कम होने के संबंध में दिए गए स्पष्टीकरण को हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।
रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का आकलन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पिता अपने फ्लैट में रह रहे थे, उनकी कमर्शियल दुकानों से आय थी और कारोबार से भी उन्हें पैसा मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उनके पास अपने पोते-पोतियों को पर्याप्त रकम देने की क्षमता थी।
कोर्ट ने कहा:
“साक्ष्य से यह पता चलता है कि वह ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अभाव या निराश्रयता की स्थिति में जीवन जी रहा हो।”
उपेक्षा या नैतिक सहारे की कमी धारा 125 CrPC के लिए पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai फैसले का उल्लेख किया। इसमें कहा गया था कि भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसकी पिछली उपेक्षा के लिए दंडित करना नहीं, बल्कि अभाव और निराश्रयता को रोकना है।
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट इस बात से प्रभावित हुआ था कि पिता ने अपने बच्चों का पालन-पोषण किया और उन्हें अच्छी शिक्षा व जीवन दिया, लेकिन वृद्धावस्था में कथित रूप से बच्चों ने उनकी उपेक्षा की।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने यह तय करने का प्रश्न नहीं था कि बेटे या अन्य बच्चों ने पिता की उपेक्षा की या उनका ऐसा करना नैतिक रूप से उचित था। कोर्ट को केवल यह देखना था कि क्या पिता धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण पाने की कानूनी शर्तों को पूरा करते हैं।
कोर्ट ने कहा:
“इस कोर्ट को यह तय नहीं करना है कि प्रतिवादी की याचिकाकर्ता या उसके अन्य बच्चों ने उपेक्षा की है या नहीं और क्या उनका ऐसा करना नैतिक रूप से उचित है। इस कोर्ट को केवल यह देखना है कि मामले के तथ्यों में प्रतिवादी धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार है या नहीं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि पिता को कथित रूप से धोखे से सेटलमेंट डीड करने के लिए राजी किया गया, वह उसे रद्द कराने में सफल नहीं हुए और बिना किसी नैतिक सहारे के अकेले रह रहे हैं, ये परिस्थितियां अपने आप में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण देने का आधार नहीं बन सकतीं।
कोर्ट कानून के मुताबिक न्याय करेगा, भावनाओं के आधार पर नहीं
जस्टिस सुंदर मोहन ने मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस.ए. खादर के लेख ‘A hard case should not make a bad law’ का उल्लेख किया। फैसले में इस सिद्धांत पर चर्चा की गई कि किसी पक्ष की कठिन परिस्थितियां या उससे जुड़ी भावनात्मक बातों को कानून के वैधानिक प्रावधानों की जगह नहीं दी जा सकती।
इस विचार से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“कोर्ट को कानून के अनुसार न्याय करना है, न कि नैतिक मूल्यों, न्यायसंगत सिद्धांतों और भावनात्मक विचारों के अनुसार।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों का काम यह घोषित करना है कि कानून क्या है, न कि यह कि कानून क्या होना चाहिए।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने माना कि यह निश्चित रूप से एक कठिन मामला है, जहां बेटे पर अपने पिता की स्व-अर्जित संपत्ति सेटलमेंट के जरिए प्राप्त करने और उसके बाद पिता को नैतिक सहारा नहीं देने का आरोप है। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक धारा 125 CrPC की निर्धारित शर्तें पूरी नहीं होतीं, इन परिस्थितियों के आधार पर पिता को भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने बेटे की क्रिमिनल रिवीजन मंजूर करते हुए 15 अक्टूबर 2025 का फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटे ने अब तक पिता को जो भी भरण-पोषण राशि दी है, उसे वापस नहीं लिया जाएगा। इससे जुड़ी क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशंस भी बंद कर दी गईं।
केस टाइटल: सूरज गोयल बनाम सी.एम. गोयल @ चंद्रकुमार एम. गोयल
केस नंबर: CRL RC No. 97 of 2026
बेंच: जस्टिस सुंदर मोहन
तारीख: 16 सितंबर 2026

