बिना निजी लाभ के केवल बिना अनुमति व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आधार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के एक प्रोफेसर की अनिवार्य सेवानिवृत्ति को रद्द करते हुए कहा है कि संस्थान की अनुमति के बिना केवल व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना किसी कर्मचारी के लंबे करियर को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर जब इससे कर्मचारी को कोई निजी लाभ मिलने का निष्कर्ष न हो। जस्टिस एम. एस. कार्णिक और जस्टिस संदेश डी. पाटिल की डिवीजन बेंच ने विभागीय जांच के निष्कर्षों को विकृत और सजा को बेहद असंगत पाया। कोर्ट ने प्रोफेसर को सेवा की निरंतरता, सभी परिणामी लाभ और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश दिया।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता 13 जुलाई 1985 से TISS में कार्यरत थे और संस्थान के स्कूल ऑफ सोशल वर्क में प्रोफेसर के पद पर काम कर रहे थे। उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई “TISSians Career Impact2” नाम का व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने को लेकर शुरू हुई थी। आरोप था कि यह ग्रुप संस्थान की अनुमति के बिना बनाया गया और शुरुआत में इसमें TISS के आधिकारिक लोगो का भी इस्तेमाल किया गया।

TISS का आरोप था कि यह ग्रुप समानांतर प्लेसमेंट सेवा की तरह चलाया जा रहा था और इसके जरिए छात्रों तथा पूर्व छात्रों को याचिकाकर्ता के निजी लाभ के लिए जोड़ा जा रहा था। संस्थान का यह भी कहना था कि पूर्णकालिक स्थायी फैकल्टी होने के कारण याचिकाकर्ता सेवा नियमों के तहत किसी व्यापार या व्यवसाय में शामिल नहीं हो सकते थे। उन पर संस्थान के लोगो, संसाधनों, जानकारी और ज्ञान का इस्तेमाल करने के आरोप भी लगाए गए।

याचिकाकर्ता को 29 मार्च 2016 को केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के नियम 10 के तहत निलंबित कर दिया गया। इसके बाद 22 अप्रैल 2016 को आरोपों का ज्ञापन जारी किया गया और विभागीय जांच शुरू हुई।

जांच के बाद 6 सितंबर 2017 को उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा दी गई। इसके खिलाफ उनकी विभागीय अपील भी 16 जनवरी 2018 को खारिज कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि व्हाट्सऐप ग्रुप में करियर के अवसरों से जुड़े कुछ पोस्ट को व्यापार या व्यवसाय मानना गलत था। उनके वकील ने विभागीय जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारी के निष्कर्षों को विकृत बताया।

यह भी दलील दी गई कि जांच रिपोर्ट में जिन व्हाट्सऐप संदेशों का उल्लेख किया गया, उन्हें वैसे ही पढ़ने पर याचिकाकर्ता की ओर से कोई कदाचार सामने नहीं आता। याचिकाकर्ता ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और CCS (CCA) Rules, 1965 के नियम 15(2) के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।

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याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि सेवा शर्तों के अनुसार वह 65 वर्ष की आयु तक सेवा में बने रहने के हकदार थे, लेकिन 58 वर्ष की उम्र में ही उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई। उन्होंने सजा को असंगत बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की। इसके समर्थन में अन्य फैसलों के साथ सुप्रीम कोर्ट के Ranjit Thakur v. Union of India के फैसले पर भरोसा किया गया।

TISS ने अनुशासनात्मक कार्रवाई का किया बचाव

TISS की ओर से कहा गया कि पूरी अनुशासनात्मक प्रक्रिया कानून के अनुसार अपनाई गई और साबित आरोपों को देखते हुए याचिकाकर्ता को दी गई सजा असंगत नहीं थी।

संस्थान ने व्हाट्सऐप बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि ग्रुप में धन जुटाने की अपील की गई थी, नौकरी के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे थे और नौकरी चाहने वाले लोगों को आमंत्रित किया जा रहा था। यह भी कहा गया कि ग्रुप बनाने और उसकी गतिविधियां चलाने के लिए TISS से अनुमति लेने का कोई रिकॉर्ड नहीं था।

TISS ने इसे समानांतर प्लेसमेंट सेवा बताते हुए कहा कि 23 फरवरी 2016 की बातचीत में मुंबई स्थित Godrej & Boyz में CSR अवसर से संबंधित Naukri.com का एक मेल भी साझा किया गया था। संस्थान की ओर से यह भी दलील दी गई कि संवैधानिक अदालतों में न्यायिक समीक्षा का दायरा निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच तक सीमित है।

व्हाट्सऐप चैट में निजी लाभ का कोई सबूत नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने संबंधित व्हाट्सऐप बातचीत का विस्तार से परीक्षण किया और पाया कि ऐसा कुछ नहीं था जिससे पता चले कि याचिकाकर्ता प्लेसमेंट सेवाओं के लिए पैसे ले रहे थे।

23 फरवरी 2016 की चैट मुंबई में CSR अवसर से संबंधित थी। कोर्ट ने पाया कि संदेश भेजने वाला व्यक्ति स्वयं उस अवसर के लिए आवेदन नहीं करना चाहता था, बल्कि यह जानकारी व्हाट्सऐप ग्रुप के किसी दूसरे सदस्य के लिए उपयोगी हो सकती थी।

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कोर्ट ने यह भी पाया कि यह ग्रुप सभी स्ट्रीम के “TISSians” के लिए था। 24 फरवरी 2016 की चैट में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि यह प्लेटफॉर्म केवल “TISSians career” के लिए था और जो सदस्य TISS से संबंधित नहीं थे, उन्हें हटाया जाना था। कोर्ट के अनुसार इससे पता चलता है कि याचिकाकर्ता को इससे किसी तरह का निजी लाभ नहीं हो रहा था।

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि कथित रूप से धन जुटाने की कोशिश का भी ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं था कि रकम का इस्तेमाल याचिकाकर्ता के फायदे के लिए किया गया। इसी तरह यह दिखाने के लिए भी कुछ नहीं था कि प्लेसमेंट सेवाएं किसी भुगतान के बदले दी गई थीं या कोई रकम याचिकाकर्ता के लाभ के लिए इस्तेमाल हुई थी।

कोर्ट ने पाया कि व्हाट्सऐप ग्रुप के सदस्य केवल उद्योग में उपलब्ध प्लेसमेंट अवसरों को साझा कर रहे थे। संस्थान का लोगो शुरुआत में इस्तेमाल किया गया था, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया था।

बेंच ने कहा:

“यह निष्कर्ष कि समानांतर प्लेसमेंट सेवा चलाई जा रही थी, पूरी तरह विकृत है।”

एलुमनाई एसोसिएशन ने भी नहीं की थी शिकायत

हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि TISS Alums Association (TISSAA) नाम की पंजीकृत एलुमनाई एसोसिएशन 11 मार्च 2013 से अस्तित्व में थी और उसका रजिस्टर्ड ऑफिस TISS के मुंबई कैंपस में था।

कोर्ट ने पाया कि इस एसोसिएशन ने संबंधित व्हाट्सऐप ग्रुप को लेकर कोई शिकायत नहीं की थी। वह न तो विभागीय कार्यवाही में गवाह थी और न ही पक्षकार। इस स्थिति में बेंच ने कहा कि यह समझना मुश्किल है कि TISS को वास्तव में क्या नुकसान पहुंचा था।

बिना अनुमति ग्रुप बनाना इतनी कठोर सजा के लिए पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि व्हाट्सऐप ग्रुप शुरू करने के लिए TISS की अनुमति नहीं ली गई थी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ यही तथ्य इतनी कठोर सजा देने के लिए पर्याप्त नहीं था।

बेंच ने कहा:

“किसी कर्मचारी द्वारा संगठन की अनुमति के बिना केवल व्हाट्सऐप ग्रुप शुरू करना अपने आप में किसी व्यक्ति के लंबे और उपलब्धियों से भरे करियर को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

कोर्ट ने Ranjit Thakur v. Union of India के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सजा कदाचार की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए और कदाचार की गंभीरता से असंगत सजा संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी। हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में Lord Diplock की टिप्पणी का भी उल्लेख किया:

“आप अखरोट तोड़ने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

हाईकोर्ट ने Omsairam Steels & Alloys (P) Ltd. v. State of Odisha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा proportionality के सिद्धांत पर की गई चर्चा का भी उल्लेख किया।

बेंच ने आखिरकार पाया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा बेहद असंगत थी और जांच अधिकारी के निष्कर्ष विकृत थे। कोर्ट के मुताबिक सजा इतनी अधिक थी कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उसमें हस्तक्षेप जरूरी था।

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50 प्रतिशत बकाया वेतन और सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश

बकाया वेतन के सवाल पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल के निर्देश पर कोर्ट को बताया कि वह 50 प्रतिशत बकाया वेतन मिलने पर संतुष्ट होंगे। कोर्ट ने इस बयान और याचिकाकर्ता के सुपरएनुएशन की आयु तक रोजगार से बाहर रहने की अवधि को ध्यान में रखते हुए 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का फैसला किया।

हाईकोर्ट ने 29 मार्च 2016 का निलंबन आदेश, 6 सितंबर 2017 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश और 16 जनवरी 2018 का अपीलीय आदेश रद्द कर दिया।

TISS को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को सेवा समाप्ति की तारीख से सुपरएनुएशन तक 50 प्रतिशत बकाया वेतन दिया जाए। साथ ही सेवा की निरंतरता और सभी परिणामी लाभ भी दिए जाएं। उनके रिटायरमेंट लाभों की दोबारा गणना करने और कोई बकाया राशि होने पर उसे आदेश अपलोड होने की तारीख से तीन महीने के भीतर चुकाने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: डॉ. स्वपन गराइन बनाम टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज एवं अन्य

केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 1487 ऑफ 2018

बेंच: जस्टिस एम. एस. कार्णिक और जस्टिस संदेश डी. पाटिल

तारीख: 16 सितंबर 2026

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