अंतिम बहस का चरण ऑर्डर VII रूल 14(3) सीपीसी के तहत दस्तावेज़ दाखिल करने पर पूर्ण रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के प्रक्रियात्मक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि गवाही पूरी होने के बाद अंतिम बहस के चरण में पहुंच जाने मात्र से वाद पत्र के साथ संलग्न न किए गए प्रासंगिक दस्तावेज़ों को रिकॉर्ड पर लेने पर कोई पूर्ण रोक नहीं लग जाती। जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने अपर जिला जज, कोर्ट संख्या 18, कानपुर नगर के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए वादी-मकान मालिक के बाद में प्राप्त हुए नगर निगम टैक्स असेसमेंट दस्तावेज़ को रिकॉर्ड पर लाने के प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रक्रियात्मक कानून न्याय के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए है, न कि उसे विफल करने के लिए; बशर्ते देरी सद्भावनापूर्ण हो, दस्तावेज़ पहले से मौजूद अभिवचनों से जुड़ा हो और विपक्षी पक्षकार को आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा दी जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एससीसी सिविल वाद संख्या 46/2019 (जो मूल रूप से वर्ष 2014 में नियमित सिविल वाद के रूप में दायर हुआ था) से उत्पन्न हुआ, जिसे वादी मोना और अन्य ने प्रतिवादी ज्ञानेंद्र कटियार के खिलाफ विवादित परिसर से बेदखली तथा किराया व क्षतिपूर्ति वसूली के लिए दायर किया था। बाद में 21 अगस्त 2023 को वाद पत्र में संशोधन की अनुमति मिलने के बाद वादी ने पैरा 2-ए और 4-ए जोड़कर दावा किया कि विवादित निर्माण 26 अप्रैल 1985 के बाद का है, इसलिए इस पर यूपी शहरी भवन (किराए पर देने, किराया तथा बेदखली विनियमन) अधिनियम, 1972 (यूपी एक्ट संख्या 13/1972) के प्रावधान लागू नहीं होते।

वादी पक्ष के साक्ष्य 3 जुलाई 2025 को और प्रतिवादी पक्ष के साक्ष्य 20 जनवरी 2026 को पूरे हो गए, जिसके बाद मामला अंतिम बहस के लिए तय कर दिया गया। वादी का कहना था कि कार्यवाही के दौरान उन्होंने नगर निगम कानपुर से विवादित परिसर का प्रथम गृहकर निर्धारण (फर्स्ट टैक्स असेसमेंट) प्राप्त करने का प्रयास किया था, जो आखिरकार सरकारी पोर्टल पर शिकायत के जरिए 13 फरवरी 2026 को प्राप्त हुआ।

इसके बाद वादी ने 21 फरवरी 2026 को सीपीसी के ऑर्डर VII रूल 14(3) सपठित धारा 151 के तहत प्रार्थना पत्र संख्या 158-सी दाखिल कर प्रथम टैक्स असेसमेंट, पोर्टल पर की गई शिकायत की प्रति और स्वीकृत नक्शा रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी। निचली अदालत ने 2 अप्रैल 2026 को यह प्रार्थना पत्र खारिज करते हुए कहा कि दस्तावेज़ वाद दायर होने के वर्षों बाद, गवाही समाप्त होने और अंतिम बहस के चरण में पेश किए गए हैं, जबकि हाईकोर्ट ने मुकदमे के त्वरित निस्तारण के समयबद्ध निर्देश दे रखे हैं। इस आदेश के खिलाफ वादी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि सीपीसी का ऑर्डर VII रूल 14(3) स्पष्ट रूप से न्यायालय की अनुमति से बाद के चरण में दस्तावेज़ पेश करने की व्यवस्था देता है। उन्होंने कहा कि प्रथम टैक्स असेसमेंट का दस्तावेज़ विवाद की मूल जड़—यानी निर्माण की तिथि और 1972 के अधिनियम की प्रयोज्यता—से सीधा जुड़ा हुआ है। यह दस्तावेज़ जानबूझकर नहीं छिपाया गया था, बल्कि नगर निगम से 13 फरवरी 2026 को ही उपलब्ध हुआ। इसके अलावा, यह पहले से मौजूद अभिवचनों का समर्थन करता है और वाद का आधार नहीं बदलता। त्वरित निस्तारण के निर्देश निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर लागू नहीं किए जा सकते।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार महेश लांगा को ईडी के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अंतरिम जमानत दी, सख्त शर्तें लगाईं

वहीं, प्रतिवादी के वकील ने निचली अदालत के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि इसमें कोई अधिकारिता संबंधी त्रुटि नहीं है। दोनों पक्षों की गवाही पूरी हो चुकी थी और वादी केवल गवाही के चरण को फिर से खोलकर 2014 से लंबित मामले को लंबा खींचना चाहते थे। प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि देरी का कोई ठोस आधार नहीं दिया गया, कुछ दस्तावेज़ (जैसे नक्शा) पहले से रिकॉर्ड पर थे और बाकी फोटोकॉपी थे जिनकी सत्यता व ग्राह्यता संदिग्ध है।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि ऑर्डर VII रूल 14(3) सीपीसी गवाही समाप्त होने के बाद दस्तावेज़ पेश करने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता। हाईकोर्ट के पूर्व फैसले मोहम्मद आरिफ बनाम लाइक अहमद (2026) का हवाला देते हुए कोर्ट ने न्यायिक विवेक के तीन आयामी परीक्षण को दोहराया:

READ ALSO  अयोग्यता विवाद: शिवसेना (यूबीटी) ने स्पीकर और महाराष्ट्र के सीएम के बीच "अत्यधिक अनुचित" बैठक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

“15. ऑर्डर VII रूल 14(3) सीपीसी के तहत विवेक का प्रयोग तीन-आयामी परीक्षण लागू करके न्यायिक रूप से किया जाना चाहिए: (i) क्या दस्तावेज़ को पहले दाखिल न करने में सद्भावना थी, (ii) क्या दस्तावेज़ विवाद के प्रभावी न्यायनिर्णयन के लिए प्रासंगिक और आवश्यक है; और (iii) क्या बाद के चरण में इसे पेश करने की अनुमति देने से प्रतिवादी को गंभीर पूर्वाग्रह या अपूरणीय अन्याय होगा।”

सुप्रीम कोर्ट के संग्राम सिंह बनाम इलेक्शन ट्रिब्यूनल, कोटा और स्टेट ऑफ पंजाब बनाम शामलाल मुरारी के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक नियम न्याय को आगे बढ़ाने के लिए हैं। यद्यपि अंतिम बहस के चरण में अधिक सतर्कता और कड़ी जांच की आवश्यकता होती है, लेकिन यह चरण मात्र न्यायालय के न्यायिक विवेक पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं बन सकता।

कोर्ट ने ऑर्डर VII रूल 14(3) के तहत विवेक के प्रयोग के लिए निम्नलिखित मुख्य दिशा-निर्देश दिए:

  • क्या दस्तावेज़ पहले से पक्षकार की जानकारी या कब्जे में था और जानबूझकर छिपाया गया था।
  • यदि दस्तावेज़ उचित प्रयास के बावजूद पहले उपलब्ध नहीं था, तो उसकी बाद में उपलब्धता एक प्रासंगिक तथ्य है।
  • पूर्व में लिए गए अभिवचनों का समर्थन करने वाला दस्तावेज़, नए मामले की नींव रखने वाले दस्तावेज़ से भिन्न स्थिति में होता है।
  • बहस का चरण गहन समीक्षा की मांग करता है, किंतु यह दस्तावेज़ ग्रहण करने पर पूर्ण कानूनी रोक नहीं लगाता।
  • विपक्षी पक्षकार को होने वाली असुविधा या अतिरिक्त प्रक्रियात्मक कार्रवाई को तब तक कानूनी नुकसान नहीं माना जा सकता, जब तक कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों से उसकी भरपाई संभव हो।
  • दस्तावेज़ को रिकॉर्ड पर ग्रहण करना और उसकी अंतिम ग्राह्यता, प्रमाण व साक्ष्यिक महत्व दोनों पूरी तरह अलग विषय हैं।
  • यदि कई दस्तावेज़ पेश किए जाएं, तो सबका मूल्यांकन अलग-अलग किया जाना चाहिए, न कि थोक में सबको खारिज किया जाए।
  • न्यायालय हर्जाना, गवाहों को पुनः बुलाना (रीकॉल) या सीमित साक्ष्य की अनुमति जैसे सुरक्षा उपाय समयबद्ध तरीके से तय कर सकता है।

सीपीसी की धारा 151 के संदर्भ में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पदम सेन बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश मामले का हवाला देते हुए कहा कि अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग स्पष्ट कानूनी प्रावधानों को दरकिनार करने के लिए नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहयोग के लिए ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, त्वरित निस्तारण के निर्देशों को प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के साथ सामंजस्य बनाकर लागू किया जाना चाहिए।

READ ALSO  कर्नाटक में अवैध होर्डिंग्स लगाने के लिए राजनीतिक दल दोषी: बीबीएमपी ने हाई कोर्ट को बताया

हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथम टैक्स असेसमेंट नगर निगम से 13 फरवरी 2026 को ही प्राप्त हुआ था और यह पैरा 2-ए व 4-ए में निर्माण की तिथि के संबंध में किए गए दावों से सीधे संबंधित है। मात्र इसलिए पूरे प्रार्थना पत्र को खारिज कर देना गलत था कि एक दस्तावेज़ (नक्शा) पहले से रिकॉर्ड पर था या अन्य दस्तावेज़ फोटोकॉपी थे।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए अपर जिला जज, कोर्ट संख्या 18, कानपुर नगर के 2 अप्रैल 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। प्रार्थना पत्र संख्या 158-सी को उन दस्तावेज़ों की सीमा तक स्वीकार किया गया जो याचिकाकर्ताओं के पास पहले उपलब्ध नहीं थे, बशर्ते उनकी सत्यता और ग्राह्यता विधि के अनुसार साबित की जाए। जो दस्तावेज़ पहले से रिकॉर्ड पर हैं, उन्हें पुनः दाखिल करने की आवश्यकता नहीं होगी।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह प्रतिवादियों को इन दस्तावेज़ों के निरीक्षण और जवाब का उचित अवसर दे। साथ ही, यदि विधि सम्मत और आवश्यक हो, तो संबंधित गवाहों से पुनः जिरह या प्रतिवादी को खंडन साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन अनुषंगिक कार्यवाहियों को तय समय-सीमा में संचालित किया जाए ताकि अनावश्यक देरी न हो, और इसके उपरांत हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुरूप वाद का शीघ्र निस्तारण किया जाए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: केएम. मोना शुक्ला और 4 अन्य बनाम ज्ञानेंद्र कटियार
वाद संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 6369/2026
पीठ: जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 15 सितंबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles