पति के पहले विवाह से अनजान महिला पर नहीं चलेगा द्विविवाह का केस, मद्रास हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

यदि किसी अविवाहित महिला को यह जानकारी नहीं है कि जिस पुरुष से वह विवाह कर रही है, उसकी पहली शादी कानूनी रूप से अभी भी बरकरार है, तो उस महिला पर द्विविवाह (दूसरी शादी) का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। मद्रास हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए मामले में सह-आरोपी बनाई गई एक महिला को गिरफ्तारी पूर्व अग्रिम जमानत दे दी है।

जस्टिस एन. रमेश की एकल पीठ ने 28 अगस्त को यह आदेश पारित किया। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए कहा कि कानून की सीधी भाषा के अनुसार, अपराध का मुख्य दायित्व उस व्यक्ति पर आता है जिसका जीवनसाथी पहले से जीवित हो। यदि कोई अविवाहित महिला इस पूर्व विवाह के तथ्य से पूरी तरह अनजान रहकर ऐसे व्यक्ति से शादी करती है, तो वह इस धारा के तहत अपराधी नहीं बन जाती।

भारतीय न्याय संहिता में सजा के कड़े प्रावधान

बीएनएस के कानूनी प्रावधानों के तहत, पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए कोई भी ऐसा दूसरा विवाह करना जो कानूनन शून्य (अमान्य) हो, एक दंडनीय अपराध है। इस जुर्म में दोषी साबित होने पर संबंधित व्यक्ति को सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सजा हो सकती है।

कानून में यह सजा तब और अधिक गंभीर हो जाती है, जब कोई व्यक्ति अपने नए जीवनसाथी से अपने पूर्व विवाह की बात जानबूझकर छिपाता है। धोखे से शादी करने के ऐसे मामलों में कारावास की अवधि को बढ़ाकर दस वर्ष तक किया जा सकता है, साथ ही अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।

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पहली शादी छिपाने और धोखे का दावा

यह मामला तब सामने आया जब पति की पहली पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर दूसरी शादी करने वाली महिला के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी। गिरफ्तारी के डर से इस महिला ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि निकाह या विवाह के समय उसके पति ने अपनी पहली शादी की बात उससे पूरी तरह गोपनीय रखी थी। उसने यह संबंध पूरी नेकनीयती से जोड़ा था और उसे पति के पहले से शादीशुदा होने की तनिक भी जानकारी नहीं थी। महिला का कहना था कि वह किसी साजिश या अपराध की भागीदार नहीं, बल्कि खुद धोखे और फरेब की शिकार हुई है।

अग्रिम जमानत और कोर्ट का प्रथम दृष्टया आकलन

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मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए जस्टिस रमेश ने पाया कि द्विविवाह का मुख्य आरोप उस व्यक्ति के विरुद्ध बनता है जिसकी पहली शादी कानूनन जारी थी—यानी इस मामले में पति के खिलाफ। वहीं याचिकाकर्ता महिला का बचाव इस आधार पर टिका है कि उसे इस सच्चाई की कोई जानकारी नहीं थी।

हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि अग्रिम जमानत पर विचार के इस पड़ाव पर अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी ठोस साक्ष्य अदालत के सामने नहीं रख सका, जिससे यह साबित हो सके कि महिला को पहले विवाह के बारे में पता था। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत के अधिकार का इस्तेमाल आरोपों की प्रकृति व गंभीरता, आरोपी की विशिष्ट भूमिका, हिरासत में पूछताछ की जरूरत और न्याय से भागने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंकाओं को ध्यान में रखकर किया जाता है।

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पति व अन्य आरोपियों के खिलाफ जारी रहेगी जांच

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता महिला को वास्तव में अपने पति की पूर्व शादी की जानकारी थी अथवा नहीं, यह तथ्य आगे की जांच और मुकदमे की सुनवाई (ट्रायल) के दौरान ही तय होगा।

जस्टिस रमेश ने बल देकर कहा कि अदालत की यह टिप्पणी केवल अग्रिम जमानत अर्जी के निपटारे के लिए प्रथम दृष्टया मूल्यांकन तक ही सीमित है। इसे अभियोजन पक्ष के मूल मामले, दोनों शादियों की कानूनी वैधता या संबंधित दंडात्मक धाराओं के लागू होने पर अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए उसे अग्रिम जमानत प्रदान कर दी, जबकि पति और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ पुलिस जांच स्वतंत्र रूप से जारी रखने का निर्देश दिया।

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