चार्जशीट से पहले पीएफ बकाया जमा करने से आपराधिक मंशा समाप्त, कलकत्ता हाईकोर्ट ने आपराधिक विश्वासघात का मामला किया रद्द

चार्जशीट दाखिल होने से पूर्व कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) के बकाये का पूर्ण भुगतान और निपटान कर दिए जाने से ‘मेन्स रिया’ (आपराधिक मंशा) का मूल तत्व समाप्त हो जाता है, जिससे आपराधिक विश्वासघात (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) की कानूनी कार्यवाही का आधार नहीं रह जाता। कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस उदय कुमार ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 401 सहपठित धारा 482 के तहत दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने एक बंद हो चुके सिनेमा हॉल के पूर्व मालिक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 406 और 409 के तहत दर्ज आपराधिक मामले और संज्ञान आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि पूरा बकाया चुकाने और प्रतिष्ठान बंद हो जाने के बाद मुकदमा चलाने के लिए बाध्य करना अभियोजन नहीं बल्कि उत्पीड़न के समान है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बैरकपुर स्थित ‘मेसर्स देबश्री सिनेमा’ से जुड़ा है, जिसे याचिकाकर्ता के पिता ने 1991 में फीचर फिल्मों के व्यावसायिक प्रदर्शन के लिए शुरू किया था। 9 नवंबर 1992 को पिता के निधन के बाद इस एकल स्वामित्व (सोल प्रोप्राइटरशिप) वाले प्रतिष्ठान की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता श्री कौशिक सेन पर आ गई। बाद के वर्षों में मल्टीप्लेक्स सिनेमा परिसरों के तेजी से विस्तार और घरों में टेलीविजन की व्यापक पहुंच के कारण सिंगल-स्क्रीन सिनेमा हॉलों के दर्शकों में भारी गिरावट आई। गंभीर वित्तीय संकट के चलते याचिकाकर्ता को यह प्रतिष्ठान स्थायी रूप से बंद करना पड़ा और कर्मचारियों का वेतन, अंतिम भुगतान और सभी वैधानिक बकाये चुकाने के बाद 11 नवंबर 2014 से सिनेमा लाइसेंस औपचारिक रूप से सरेंडर कर दिया गया।

इस बीच, ईपीएफओ के बैरकपुर उप-क्षेत्रीय कार्यालय से जुड़े प्रवर्तन अधिकारी द्वारा 2 जून 2010 को दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर यह आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 2 जून 2010 को किए गए निरीक्षण के दौरान पाया गया कि नियोक्ता ने जनवरी 2010 से अप्रैल 2010 की अवधि के लिए कर्मचारियों के वेतन से भविष्य निधि अंशदान के रूप में 20,128 रुपये काटे थे, लेकिन कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के पैरा 38 और कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 6 के तहत निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के भीतर इसे जमा नहीं कराया।

इसके आधार पर 2 जून 2010 को टीटागढ़ पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 406 और 409 के तहत केस दर्ज किया गया। हालांकि, जांच एजेंसी द्वारा 27 जुलाई 2010 को चार्जशीट नंबर 444 दाखिल किए जाने से पहले ही, जून 2010 में याचिकाकर्ता ने 20,128 रुपये की पूरी बकाया राशि आधिकारिक बैंक चालान के माध्यम से जमा करा दी थी। इसके बावजूद जांच एजेंसी ने चार्जशीट दाखिल कर दी और न्यायिक मजिस्ट्रेट, तृतीय न्यायालय, बारासात ने 10 अगस्त 2010 को इन अपराधों पर संज्ञान ले लिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने इस कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दोनों पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि आईपीसी की धारा 405 के तहत आपराधिक विश्वासघात के अनिवार्य तत्व—जैसे बेईमानी से हड़पना, अपने उपयोग में बदलना और आपराधिक मंशा (मेन्स रिया)—चार्जशीट और रिकॉर्ड से पूरी तरह नदारद हैं। यह तर्क दिया गया कि राशि जमा करने में हुआ अस्थायी विलंब गंभीर व्यावसायिक संकट और नकदी की कमी के कारण हुआ था, न कि किसी धोखाधड़ी या बेईमानी के इरादे से।

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धोखाधड़ी के इरादे के बिना केवल वैधानिक बकाये का भुगतान न करने पर धारा 406 लागू न होने के संबंध में याचिकाकर्ता ने एन. श्रीधर बनाम तेलंगाना राज्य मामले पर भरोसा जताया। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश गुप्ता बनाम सेबी फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि जहां किसी कानून का मूल आर्थिक उद्देश्य बकाये की भरपाई से पूरा हो चुका हो और सजा की संभावना नगण्य हो, वहां प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कार्तिक चंद्र दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, एयर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, एटेलियर फैशन फ्लैश प्राइवेट लिमिटेड बनाम प्रोविडेंट फंड इंस्पेक्टर, और अदोनी कॉटन मिल्स लिमिटेड बनाम रीजनल प्रोविडेंट फंड कमिश्नर के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया था कि बकाये का भुगतान हो जाने के बाद मुकदमों को जारी रखना अदालत के समय की बर्बादी और प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीएफ प्राधिकरण के वकील ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि जैसे ही 15 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर कटौती की गई राशि जमा नहीं की जाती, वैधानिक चूक स्थापित हो जाती है। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि श्रम कल्याण कानून गैर-परक्राम्य हैं और वैधानिक देनदारियों का इस्तेमाल निजी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं किया जा सकता।

अभियोजन पक्ष ने आईपीसी की धारा 405 के स्पष्टीकरण 1 पर मुख्य रूप से जोर दिया। उन्होंने कहा कि कानून में यह विधिक कल्पना (डीमिंग फिक्शन) की गई है कि यदि कोई नियोक्ता कर्मचारियों के वेतन से पीएफ की कटौती करता है और उसे जमा करने में चूक करता है, तो यह मान लिया जाता है कि उसे वह राशि सौंपी गई थी और उसने कानून का उल्लंघन करते हुए बेईमानी से उसका उपयोग किया है। इसके लिए अलग से अमानत सौंपने के सबूत की आवश्यकता नहीं होती, जैसा कि अजय जालान बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में भी माना गया था। जय किशोर सिंह बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, तपन विश्वास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, और मेसर्स इनोवेटिव कमोडिटीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम शंकर चक्रवर्ती के मामलों का हवाला देते हुए राज्य ने तर्क दिया कि बाद में किया गया भुगतान आपराधिक दायित्व को पूर्व प्रभाव से खत्म नहीं कर सकता और इसे सजा तय करते समय केवल एक राहतकारी पहलू माना जा सकता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने निर्णय के लिए दो मुख्य प्रश्न तय किए:

  1. क्या चार्जशीट से पहले ईपीएफ बकाये का पूर्ण भुगतान आपराधिक मंशा के आवश्यक तत्वों को समाप्त कर देता है, जिससे आईपीसी की धारा 406/409 के तहत कार्यवाही रद्द की जा सकती है?
  2. क्या इस तरह के सामाजिक सुरक्षा उल्लंघन ऐसे सार्वजनिक अपराध हैं जिनकी गंभीरता बाद में किए गए भुगतान के बावजूद अंतर्निहित शक्तियों के प्रयोग को रोकती है?
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पहले प्रश्न का विश्लेषण करते हुए अदालत ने माना कि धारा 405 के स्पष्टीकरण 1 के तहत कटौती जमा न करने पर अमानत और दुरुपयोग की कानूनी कल्पना उत्पन्न होती है। हालांकि, एन. श्रीधर और प्रकाश गुप्ता मामलों के सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब दंडात्मक कानून का आर्थिक उद्देश्य, यानी श्रमिकों के बकाये की वसूली, मुकदमे की सुनवाई से पहले ही पूरी तरह हासिल हो जाता है, तो लगातार बेईमानी से गबन करने का अनिवार्य तत्व समाप्त हो जाता है।”

अदालत ने माना कि चार्जशीट दाखिल होने से पूर्व की गई भरपाई ने ‘मेन्स रिया’ को निष्प्रभावी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “चार्जशीट से पहले बकाया राशि का पूर्ण निपटान, सक्रिय दुरुपयोग के अभाव के साथ मिलकर, आपराधिक कार्यवाही की कानूनी नींव को समाप्त कर देता है।” कोर्ट ने पीयूडीआर बनाम भारत संघ मामले को अलग बताते हुए स्पष्ट किया कि वह फैसला श्रमिकों के व्यापक शोषण के खिलाफ जनहित के संदर्भ में था, जबकि वर्तमान मामला एक बंद हो चुके एकल स्वामित्व वाले प्रतिष्ठान का है, जहां चूक का पता चलने के कुछ ही हफ्तों के भीतर पूरी रकम चुका दी गई थी।

दूसरे प्रश्न पर अदालत ने माना कि आदतन या धोखाधड़ी वाले मामलों में आपराधिक कानून को केवल वसूली का साधन न बनाने का सैद्धांतिक तर्क सही हो सकता है, लेकिन यह इस मामले के विशिष्ट तथ्यों पर लागू नहीं होता। यह सिनेमा हॉल व्यावसायिक मंदी के चलते बंद हो चुका था और 2014 में सभी देनदारियां निपटाने के बाद लाइसेंस भी सरेंडर कर दिया गया था।

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सीआरपीसी की धारा 482 के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यदि किसी नियोक्ता ने चूक को सुधार लिया है, वैधानिक कोष में राशि लौटा दी है और स्वयं प्रतिष्ठान का अस्तित्व समाप्त हो चुका है, तो किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे की अग्निपरीक्षा से गुजरने के लिए बाध्य करना किसी सार्वजनिक हित, सार्वजनिक नैतिकता या निवारक मूल्य की पूर्ति नहीं करता। यह अभियोजन नहीं बल्कि उत्पीड़न के समान है।”

अदालत ने माना कि जब मुकदमे की शुरुआत से पहले ही पूर्ण और बिना शर्त भरपाई कर दी जाती है, तो सामाजिक सुरक्षा उल्लंघन की गंभीरता काफी हद तक कम हो जाती है, और यह मामला हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों के दायरे से बाहर नहीं है।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि “त्वरित भरपाई से मेन्स रिया का मूलभूत तत्व निष्प्रभावी हो चुका है, और प्रतिष्ठान के स्थायी रूप से बंद होने के कारण अंतिम सजा की संभावना पूरी तरह काल्पनिक रह जाती है।” इसलिए इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना उचित नहीं है।

फैसला

जस्टिस उदय कुमार ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए बारासात के न्यायिक मजिस्ट्रेट, तृतीय न्यायालय के समक्ष लंबित जी.आर. केस संख्या 2329/2010 (टीटागढ़ पुलिस स्टेशन केस संख्या 240, दिनांक 2 जून 2010), चार्जशीट संख्या 444 (दिनांक 27 जुलाई 2010) और 10 अगस्त 2010 के संज्ञान आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया। पूर्व में दिए गए सभी अंतरिम आदेश समाप्त कर दिए गए और वाद व्यय को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री कौशिक सेन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: सीआरआर 2767/2017
पीठ: जस्टिस उदय कुमार
निर्णय की तिथि: 08.09.2026

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