अलप्पुझा केरल के अलप्पुझा जिला उपभोक्ता आयोग ने बच्चे की पढ़ाई के लिए खरीदे गए मोबाइल फोन की जगह डमी हैंडसेट भेजने के मामले में एक प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और उसके विक्रेता को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराया है। आयोग ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे पीड़िता को मुआवजे और रिफंड सहित कुल 18,514 रुपये का भुगतान करें।
जिला उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष शोली पी. आर. और सदस्य लेखामा सी. के. की पीठ ने 13 अगस्त को यह आदेश जारी किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि वेयरहाउसिंग, पैकेजिंग और डिलीवरी जैसे सभी मुख्य काम खुद संभालने के बाद ई-कॉमर्स कंपनियां डिलीवरी में हुई गड़बड़ियों के दायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं।
उपभोक्ता आयोग ने ई-कॉमर्स कंपनी को 30 दिनों के भीतर मूल उत्पाद के मूल्य के रूप में 11,514 रुपये वापस करने, मानसिक परेशानी और सेवा में कमी के लिए 6,000 रुपये का मुआवजा देने तथा अदालती खर्च के तौर पर 1,000 रुपये चुकाने का आदेश दिया है। वित्तीय देनदारियों का निपटारा होने के बाद कंपनी को आयोग की निगरानी में रखे गए डमी फोन को वापस लेने की अनुमति भी दी गई है।
मॉल जैसी भूमिका होने की दलील खारिज
सुनवाई के दौरान ई-कॉमर्स कंपनी के प्रतिनिधि ने दलील दी थी कि उनका ऑनलाइन प्लेटफॉर्म किसी शॉपिंग मॉल या व्यावसायिक परिसर की तरह काम करता है। कंपनी का कहना था कि मॉल में खरीदारी करने पर ग्राहक सीधे दुकानदार को भुगतान करता है, इसलिए किसी भी प्रकार की खराबी या शिकायत के लिए सीधे विक्रेता ही उत्तरदायी होता है, न कि मॉल प्रबंधन।
उपभोक्ता आयोग ने कंपनी के इस तर्क को पूरी तरह नामंजूर कर दिया। आयोग ने पाया कि ई-कॉमर्स कंपनी केवल ग्राहक और विक्रेता को जोड़ने वाला जरिया भर नहीं थी। कंपनी ने सामान को अपने गोदाम में रखा, ऑर्डर प्रोसेस किया और अपने कूरियर तंत्र के माध्यम से डिलीवरी कराई। इसलिए उत्पाद की सही सुपुर्दगी की सीधी जिम्मेदारी उसी पर बनती है।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि पार्सल के भीतर किसी अन्य व्यक्ति के नाम का बिल कैसे पहुंचा, इस पर ई-कॉमर्स कंपनी कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण या साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। आयोग ने इसे ऑर्डर प्रबंधन में लापरवाही का स्पष्ट प्रमाण माना।
कर्ज लेकर खरीदा था फोन, पोर्टल ने रिटर्न लेने से किया इनकार
यह विवाद 25 अगस्त 2025 को दर्ज कराए गए एक ऑर्डर से जुड़ा है। पीड़िता ने अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए बड़ी कठिनाई से ब्याज पर पैसे उधार लेकर 11,499 रुपये का स्मार्टफोन बुक किया था। पार्सल मिलने पर उन्होंने डिलीवरी कर्मी को पूरी रकम नकद चुका दी थी।
पैकेट खोलने पर महिला को असली फोन के स्थान पर किसी अन्य ब्रांड का प्लास्टिक डमी फोन और किसी अजनबी के नाम का इनवॉइस मिला। जब उन्होंने तुरंत कस्टमर केयर से संपर्क कर सही हैंडसेट भेजने या पैसे लौटाने की मांग की, तो उन्हें ऑनलाइन रिटर्न की प्रक्रिया अपनाने को कहा गया। हालांकि, जब महिला ने पोर्टल पर रिटर्न दर्ज करने का प्रयास किया, तो उत्पाद को आउट ऑफ स्टॉक बताकर रिटर्न स्वीकार करने से मना कर दिया गया।
खुद को ठगा हुआ पाकर महिला ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और सबूत के तौर पर मिले डमी फोन को आयोग के समक्ष जमा करा दिया।
विक्रेता की गैर-मौजूदगी में हुई सुनवाई
इस मामले में नामजद विक्रेता की ओर से न तो कोई वकील पेश हुआ और न ही कोई लिखित पक्ष रखा गया। इसके चलते आयोग ने विक्रेता के खिलाफ एकतरफा सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया।
उपभोक्ता आयोग ने रेखांकित किया कि कोई भी ई-कॉमर्स कंपनी खुद को केवल मध्यस्थ बताकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती। यदि कंपनी ऑर्डर को प्रोसेस करने, स्टोर करने और ग्राहक तक पहुंचाने का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में रखती है, तो गलत या नकली सामान पहुंचने पर उसकी सीधी जवाबदेही तय होगी।

