बॉम्बे हाई ने एक अहम फैसले में पुणे की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें आठ साल के एक बालक की अंतरिम कस्टडी उसकी मां से छीनकर सिंगापुर में रह रहे पिता को सौंपने और बच्चे को विदेश भेजने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत अंतरिम कस्टडी तय करते समय भी बच्चे का कल्याण, उसकी स्थिरता और जीवन की निरंतरता ही सबसे प्रमुख पैमाना है। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने बच्चे के हित की स्वतंत्र पड़ताल करने के बजाय गैर-जरूरी moralistic टिप्पणियों और रूढ़िवादिता के आधार पर फैसला सुनाया।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष सी. चव्हाण की खंडपीठ ने मां की याचिका स्वीकार करते हुए 2 सितंबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने रेखांकित किया कि बच्चा जून 2025 से पुणे के एक स्कूल में पढ़ रहा है, वह वहां के माहौल में पूरी तरह रच-बस चुका है और अपने नाना-नानी, परिवार तथा स्थानीय सामाजिक दायरे से भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है।
निचली अदालत के उपदेशों और रूढ़िवादी टिप्पणियों पर हाईकोर्ट की सख्त आपत्ति
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तौर-तरीकों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि निचली अदालत के जज ने पति के प्रति एक आदर्श पत्नी के कथित कर्तव्यों को लेकर उपदेश दिए और इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि बच्चे का अपने पिता के साथ रहना बेहतर होगा।
पीठ ने कहा कि नैतिक उपदेशों के अलावा फैमिली कोर्ट ने बच्चे और उसके दादा के रिश्ते को लेकर कहावतों का सहारा लेकर सतही और सामान्य टिप्पणियां कीं। साथ ही, महिला के परिवार की ‘बहू’ होने के नाते उसके खिलाफ तीखी बातें कहीं। खंडपीठ ने दर्ज किया कि निचली अदालत ने माता-पिता के आपसी आरोपों में से सिर्फ मां की कथित कमियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया। निचली अदालत ने यह तक टिप्पणी कर दी कि मां यह भूल गई है कि प्रतिवादी बच्चे का ‘जनक पिता’ है और वह सुलह करने की जगह केवल भारी आर्थिक सहायता की मांग कर रही है।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी माता या पिता द्वारा अपने जीवनसाथी के खिलाफ कानूनी मुकदमे दायर करने मात्र से यह मान लेना पूरी तरह गलत और पूर्वाग्रह से ग्रसित है कि वह बच्चे की परवरिश के अयोग्य हो गया है। इसके अलावा, फैमिली कोर्ट ने यह स्वीकार करने के बावजूद कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को पूरे ट्रायल में परखा जाना जरूरी है, असत्यापित व्हाट्सएप संदेशों पर भरोसा करके यह मान लिया कि मां बच्चे को पिता के खिलाफ भड़का रही है।
कल्याणकारी मूल्यांकन के बिना अंतरिम कस्टडी में बदलाव गलत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी स्थापित व्यवस्था को अंतरिम स्तर पर बदलने के लिए बेहद ठोस और अनिवार्य कारण होने चाहिए। फैमिली कोर्ट ने बिना किसी विस्तृत ट्रायल, साक्ष्य, मनोवैज्ञानिक जांच या स्वतंत्र वेलफेयर रिपोर्ट के ही बच्चे को पिता को सौंपने का निर्देश दे दिया, जो कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है।
अदालत में मां की ओर से पेश वकील अक्षय पेटकर और अभिषेक सालियान ने दलील दी थी कि बच्चे की स्थिरता, मानसिक स्वास्थ्य और इच्छाएं किसी भी विवाद से ऊपर हैं, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज किया। वहीं, पिता का पक्ष रख रहे वकील अभिजीत सरवटे ने फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि मां बच्चे को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही थी और पिता के खिलाफ कर रही थी, जिसका पर्याप्त आधार अदालत के पास था।
विवाह से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुकदमों तक का घटनाक्रम
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, दोनों का विवाह मार्च 2012 में पुणे में हुआ था और मार्च 2016 में उनके बेटे का जन्म हुआ। बच्चा जुलाई 2022 तक पुणे में रहा और स्कूल गया। इसके बाद पूरा परिवार सिंगापुर शिफ्ट हो गया और बच्चे का दाखिला वहां के स्कूल में कराया गया।
बाद में वैवाहिक कलह, घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना के आरोपों के बीच मार्च 2025 में मां बच्चे को लेकर भारत लौट आई और तब से वह पुणे में ही रह रही है। इसके बाद पिता ने कस्टडी के लिए पुणे फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शुरुआत में मुलाकात के अधिकार को लेकर आदेश हुआ था, लेकिन हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए भेजते हुए बच्चे के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने को कहा था।
इस बीच, जुलाई 2025 में सिंगापुर की फैमिली जस्टिस कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी पिता को देने का आदेश जारी किया। पिता ने भारत में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर की थी, जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और इस साल जून में वापस ले ली गई।
पुणे की फैमिली कोर्ट ने पुनर्विचार के बाद मई महीने में अंतरिम कस्टडी पिता को सौंपते हुए बच्चे को सिंगापुर भेजने का आदेश दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया है।

