वयस्क होने पर मनपसंद जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक हक, माता-पिता की आपत्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बालिग होने के बाद किसी भी व्यक्ति को अपना जीवनसाथी और रहने का स्थान चुनने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि माता-पिता की चिंताएं चाहे कितनी भी स्वाभाविक क्यों न हों, वे किसी वयस्क की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हावी नहीं हो सकतीं।

जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने 7 सितंबर को यह आदेश देते हुए 18 वर्षीय युवती को अपनी मर्जी से पति के साथ रहने की इजाजत दे दी। इसके साथ ही कोर्ट ने प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिया कि यदि दंपति के जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई खतरा सामने आता है, तो उन्हें तुरंत सुरक्षा मुहैया कराई जाए। पुलिस को यह भी सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया कि दोनों को सुरक्षित उनके गंतव्य तक पहुंचाया जाए और उनके रास्ते में कोई बाधा न आए।

अदालत के समक्ष युवती और परिजनों का पक्ष

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यह पूरा मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। इससे पहले अदालत ने राज्य सरकार और युवती के पिता को निर्देश दिया था कि वे युवती को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

अदालत में व्यक्तिगत बातचीत के दौरान युवती ने बताया कि उसका जन्म वर्ष 2008 में हुआ था और वह अब बालिग है। उसने 10वीं तक की पढ़ाई की है और अपनी मर्जी से विवाह किया है। युवती ने जोर देकर कहा कि उसका विवाह किसी दबाव, जोर-जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव के बिना हुआ है और वह अपने वैवाहिक घर में पति के साथ रहना चाहती है।

कोर्ट में मौजूद पति ने भी विवाह की पुष्टि की और कहा कि वह युवती के साथ दांपत्य जीवन बिताने को तैयार है। वहीं, युवती के पिता ने बेटी के फैसले पर नाराजगी तो जताई, लेकिन उन्होंने भी अदालत के सामने स्वीकार किया कि उनकी बेटी बालिग हो चुकी है।

अदालत की अहम टिप्पणियां और निष्कर्ष

जस्टिस संदीप जैन ने युवती के बयान को पूरी तरह स्पष्ट, सुसंगत और दृढ़ पाया। अदालत ने दर्ज किया कि युवती के हाव-भाव या रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता जिससे यह लगे कि उसका विवाह किसी धमकी, लालच या दबाव का परिणाम है।

कोर्ट ने कहा कि बालिग होने के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिंदगी जीने के तरीके और जीवनसाथी का चयन करने का स्वतंत्र अधिकार मिल जाता है। इस निर्णय को माता-पिता या रिश्तेदारों की मर्जी से बदला या थोपा नहीं जा सकता। पीठ ने रेखांकित किया कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा से जुड़ा एक अहम पहलू है, जिसका सम्मान करना कानूनी सीमाओं के तहत राज्य और उसकी संस्थाओं की जिम्मेदारी है।

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उत्पीड़न और दखल पर सख्त रोक

अदालत ने कहा कि चूंकि युवती वयस्क है और अपने विवेक से निर्णय ले रही है, इसलिए उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध माता-पिता की कस्टडी में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों सहित कोई भी व्यक्ति युवती के वैध फैसले में दखल नहीं देगा। अदालत ने चेतावनी दी कि विवाह और साथ रहने के निर्णय को लेकर दंपति को किसी भी तरह की धमकी, दबाव, डर या उत्पीड़न का सामना न करना पड़े। इसके बाद अदालत ने युवती को अपनी पसंद के स्थान पर पति के साथ जाने की पूरी छूट दे दी।

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