कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि पहली शादी छिपाकर किसी महिला के साथ पति-पत्नी की तरह रहने वाला व्यक्ति विवाह की वैधता पर सवाल उठाकर घरेलू क्रूरता के मुकदमे से नहीं बच सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क पति-पत्नी के तौर पर एक साथ रह रहे हों, तो केवल औपचारिक या कानूनी शादी न होने के आधार पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत दर्ज मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस उदय कुमार की एकल पीठ ने यह फैसला 2 सितंबर को एक व्यक्ति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ 2022 में धोखाधड़ी, जबरन वसूली और क्रूरता के आरोपों में दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत सुरक्षा पाने के लिए पारंपरिक और कानूनी रूप से त्रुटिहीन विवाह की अनिवार्यता अब बदल चुकी है। अदालत के अनुसार, आधुनिक कानूनी व्याख्या के तहत जब दो वयस्क सहमति से साझा घर में रहते हैं, समाज उन्हें पति-पत्नी के रूप में देखता है और उनका इरादा वैवाहिक जीवन जीने का होता है, तो धारा 498ए का सुरक्षात्मक दायरा ऐसे संबंधों पर पूरी तरह लागू होता है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने पहली शादी की बात छिपाकर महिला को साथ रहने के लिए राजी किया हो, तो विवाह की कानूनी वैधता की आड़ में उसे प्रताड़ना के आरोपों से मुक्त कर देना सरासर अन्याय होगा।
पहचान छिपाने और धर्म परिवर्तन के आरोप
शिकायतकर्ता महिला के अनुसार, वह वर्ष 2019 में इस व्यक्ति के संपर्क में आई थी। उस समय व्यक्ति ने खुद को एक अविवाहित अनाथ बताया था। महिला का आरोप है कि उसके समझाने पर उसने इस्लाम धर्म अपनाया और जुलाई 2020 में दोनों का निकाह हुआ।
कुछ समय बाद महिला को पता चला कि वह व्यक्ति पहले से शादीशुदा था। महिला का कहना है कि जब यह सच सामने आया, तो उसके साथ शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना शुरू कर दी गई। यह सिलसिला मई 2022 तक चला, जिसके बाद आरोपी ने उसे घर से बाहर निकाल दिया।
वैधता को लेकर याचिकाकर्ता की दलील
कार्यवाही रद्द कराने के लिए याचिकाकर्ता ने दलील दी कि महिला के पास उनके मुस्लिम विवाह का कोई औपचारिक दस्तावेज नहीं है। इसके अलावा, उसने दावा किया कि महिला की पिछली शादी अभी कानूनी तौर पर खत्म नहीं हुई थी, इसलिए दोनों के बीच का संबंध कभी वैध विवाह की श्रेणी में आया ही नहीं।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि धोखेबाजी और उनके रिश्ते की वास्तविक प्रकृति से जुड़े तथ्य विवादित हैं, जिनका फैसला केवल ट्रायल के दौरान ही हो सकता है।
मकान मालिक की गवाही और कोर्ट का निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले में दंपति के मकान मालिक के बयान को महत्वपूर्ण माना। मकान मालिक ने पुष्टि की कि दोनों उसके परिसर में पति-पत्नी की तरह ही रह रहे थे।
अदालत ने कहा कि एक साथ वैवाहिक रूप में रहने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, लिहाजा इस आपराधिक मुकदमे को चलने देना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह इस मामले की सुनवाई तेजी से पूरी करे। साथ ही स्पष्ट किया कि निचली अदालत हाईकोर्ट द्वारा की गई प्रासंगिक टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, पूरी तरह स्वतंत्र रूप से ट्रायल चलाए।

