डेरिवेटिव मार्केट के विनियामक ढांचे पर एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने माना कि एनएसई क्लीयरिंग लिमिटेड (एनसीएल) की ‘मेंबर एंड कोर सेटलमेंट गारंटी फंड कमेटी’ (एमसीएसजीएफसी) के पास प्रोफेशनल क्लीयरिंग मेंबर्स (पीसीएम) के खिलाफ बेची गई कोलैटरल सिक्योरिटीज (जमानती प्रतिभूतियों) को बहाल करने का आदेश देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने एमसीएसजीएफ कमेटी और उसके आदेश की पुष्टि करने वाले सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (सैट) के समवर्ती फैसलों को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956 (एससीआरए) की धारा 9(3)(बी) के तहत स्टॉक एक्सचेंज के उप-नियम (बायलॉज) ऐसा कोई दंड नहीं लगा सकते जिसमें धन का भुगतान या डिसगॉर्जमेंट (अवैध लाभ की जब्ती/वापसी) शामिल हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जुलाई 2021 में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा दैनिक रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू किए जाने से पहले, पीसीएम का ट्रेडिंग मेंबर्स (टीएम) के व्यक्तिगत ग्राहकों के साथ कोई प्रत्यक्ष अनुबंध (प्रिविटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट) नहीं था, और न ही किसी ब्रोकर के डिफॉल्ट करने पर गिरवी रखी गई सिक्योरिटीज को बेचने से पहले व्यक्तिगत ग्राहकों के क्रेडिट या डेबिट बैलेंस की पड़ताल करने की कोई विनियामक विजिबिलिटी या कानूनी बाध्यता थी।
विवाद की गंभीरता को रेखांकित करते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने फैसले में टिप्पणी की: “जहां भविष्य हर किसी के लिए वादों और विकल्पों को संजोए रहता है, वहीं फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफएंडओ) सेगमेंट में उन्हें शाश्वत बर्बादी और अपनी मूल्यवान प्रतिभूतियों के नुकसान का सामना करना पड़ा; इन अपीलों में हस्तक्षेप करने वाले व्यक्तिगत निवेशकों का यही विलाप है।”
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफएंडओ) सेगमेंट में बड़े पैमाने पर हुए डिफॉल्ट से जुड़ा है। बाजार के बहुस्तरीय ढांचे में व्यक्तिगत निवेशक (ग्राहक) अपने शेयर ब्रोकर या ट्रेडिंग मेंबर (टीएम) के पास कोलैटरल (जमानत) जमा करते हैं। इसके बाद टीएम यह कोलैटरल क्लीयरिंग कॉरपोरेशन (एनसीएल) में पंजीकृत प्रोफेशनल क्लीयरिंग मेंबर (पीसीएम) के पास रखता है, जो सौदों के निपटान (सेटलमेंट) की गारंटी देता है।
जनवरी से जुलाई 2020 के बीच ब्रोकर अनुग्रह स्टॉक एंड ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड को भारी कारोबारी नुकसान हुआ और वह अपने सेटलमेंट दायित्वों को पूरा करने में विफल रहा। इस कमी की भरपाई के लिए पीसीएम एडलवाइस कस्टोडियल सर्विसेज लिमिटेड ने अनुग्रह द्वारा उसके पास जमा कराई गई कोलैटरल सिक्योरिटीज को 29 मौकों पर बाजार में बेच दिया, जिसका मूल्य जब्ती के समय 460.32 करोड़ रुपये था। इसके चलते अनुग्रह के उन व्यक्तिगत ग्राहकों को भी अपनी सिक्योरिटीज से हाथ धोना पड़ा, जिनका कोई डेबिट बैलेंस नहीं था या जिनकी कोई सेटलमेंट देनदारी बाकी नहीं थी।
इसी तरह के डिफॉल्ट और परिसमापन से जुड़े मामले अन्य पीसीएम और उनके संबंधित टीएम (जिनमें व्राइस सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड, एक्शन फाइनेंशियल सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड और युवराज सिक्योरिटीज शामिल थे) की अपीलों में भी सामने आए।
प्रभावित निवेशकों ने सेबी, सैट और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अंततः एनएसई के समक्ष मुआवजे की मांग की। एनसीएल द्वारा गठित एमसीएसजीएफ कमेटी ने माना कि पीसीएम उचित सतर्कता बरतने में विफल रहे, उन्होंने टीएम को अत्यधिक ढील दी और व्यक्तिगत डेबिट/क्रेडिट स्थिति की जांच किए बिना ग्राहकों की सिक्योरिटीज बेचकर विनियामक परिपत्रों (सर्कुलर) का उल्लंघन किया। कमेटी ने पीसीएम को निर्देश दिया कि वे बेची गई सिक्योरिटीज को 15 दिनों के भीतर बहाल करें, अन्यथा 16वें दिन के बाजार मूल्य में 5 प्रतिशत जोड़कर उनके उपलब्ध कोलैटरल से राशि काट ली जाएगी, साथ ही जुर्माना भी लगाया गया। सैट ने इस फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि बहाली का निर्देश निष्कासन से कमतर और न्यायोचित अनुशासनात्मक उपाय है तथा सैट (प्रोसीजर) रूल्स, 2000 के नियम 21 के तहत अपनी शक्तियों का हवाला दिया। इसके बाद पीसीएम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
मुख्य अपीलकर्ता एडलवाइस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि एमसीएसजीएफ कमेटी के पास सिक्योरिटीज की बहाली का आदेश देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, जिनका मूल्य आदेश की तारीख तक बढ़कर 900 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका था। उन्होंने दलील दी कि बहाली का आदेश वास्तव में डिसगॉर्जमेंट के समान है, और यह शक्ति सेबी एक्ट, 1992 की धारा 11बी तथा एससीआरए की धारा 12ए के तहत केवल सेबी में निहित है। एससीआरए की धारा 9(3)(बी) के अंतर्गत स्टॉक एक्सचेंज के उप-नियम केवल जुर्माने, निष्कासन और निलंबन तक सीमित हैं और वे स्पष्ट रूप से “समान प्रकृति के किसी भी अन्य दंड को प्रतिबंधित करते हैं जिसमें धन का भुगतान शामिल हो।” उन्होंने आगे कहा कि 2019-2020 में लागू साप्ताहिक रिपोर्टिंग व्यवस्था के तहत पीसीएम के पास व्यक्तिगत ग्राहकों के बही-खातों की स्थिति जानने का न तो कोई तंत्र था और न ही कोई कानूनी कर्तव्य; संविदात्मक संबंध केवल पीसीएम और टीएम के बीच था। अन्य पीसीएम का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी और अमर नाथ सैनी ने भी इन दलीलों का समर्थन किया और बताया कि जून 2020 से पहले ग्राहकों के कोलैटरल सकल (ग्रॉस) और समेकित आधार पर रखे जाते थे।
इसके विपरीत एनसीएल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने तर्क दिया कि निष्कासन की बड़ी शक्ति में बहाली की छोटी शक्ति स्वतः समाहित होती है। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद सेंट जेवियर्स कॉलेज सोसाइटी बनाम गुजरात राज्य में संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने डायरेक्टर ऑफ एन्फोर्समेंट बनाम एम.सी.टी.एम. कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड और शिव दत्त राय फतेह चंद बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा कि दंड की अवधारणा बाजार की शुचिता बनाए रखने के लिए व्यापक है। उन्होंने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य, कविता त्रेहन बनाम बलसारा हाइजीन प्रोडक्ट्स लिमिटेड और डॉ. पूर्णिमा आडवाणी बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार का उल्लेख कर कहा कि बहाली एक अंतर्निहित अधिकार है जिसका प्रयोग न्याय के हित में संपत्ति को उसके वास्तविक मालिक को लौटाने के लिए किया जा सकता है।
निवेशकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि पीसीएम न्यासीय (फिड्यूशरी) क्षमता में कार्य करते हैं और उन्होंने सेबी के 17.04.2008, 26.09.2016 और 20.06.2019 के सर्कुलर तथा एनसीएल विनियम 1.7, 4.5.4 और 10.2.4 का उल्लंघन किया है। इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बिना उचित जांच-पड़ताल के अंधाधुंध सिक्योरिटीज बेचकर पीसीएम अनुचित लाभ (अनजस्ट एनरिचमेंट) के दायित्व से बच नहीं सकते।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने एफएंडओ सेगमेंट की कार्यप्रणाली, एससीआरए के प्रावधानों, सेबी सर्कुलर और एनसीएल विनियमों की विस्तृत समीक्षा की।
विनियम 1.7 में परिभाषित ‘ग्राहक/घटक’ (क्लाइंट/कांस्टिट्यूएंट) और विनियम 4.5.4 के तहत एक ग्राहक के मार्जिन का उपयोग दूसरे के लिए करने पर लगे प्रतिबंध का विश्लेषण करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि पीसीएम के लिए घटक उसका टीएम होता है, जबकि टीएम के लिए घटक व्यक्तिगत निवेशक होता है। अतः पीसीएम पर प्रतिबंध यह है कि वह एक टीएम द्वारा दिए गए कोलैटरल का उपयोग दूसरे टीएम के बकाए को निपटाने के लिए नहीं कर सकता।
अदालत ने पाया कि अनुग्रह अवैध रूप से ‘तीन भूमिकाएं’ निभा रहा था—वह एक साथ टीएम, डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (डीपी) और डेरिवेटिव्स एडवाइजरी सर्विसेज (डीएएस) के रूप में काम कर रहा था। वह बिना सेबी पंजीकरण के पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (पीएमएस) की तर्ज पर ‘गोल्ड’ और ‘प्लैटिनम’ नामक योजनाओं के तहत 12 प्रतिशत वार्षिक सुनिश्चित रिटर्न की पेशकश कर रहा था। सेबी की कार्यवाहियों से यह साबित हुआ था कि अनुग्रह ने 2017-2018 से ही ग्राहकों की प्रतिभूतियों का दुरुपयोग और गबन किया था। पीठ ने टिप्पणी की:
“न तो टीएम अपनी देनदारियों से बच सकता है और न ही निवेशक यह शिकायत कर सकते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ, क्योंकि उन्होंने एक निश्चित रिटर्न के लालच में अपनी प्रतिभूतियों को कोलैटरल के रूप में इस्तेमाल करने की पूरी जानकारी के साथ इस योजना में प्रवेश किया था। सुनिश्चित रिटर्न का दायित्व केवल टीएम पर है और एनएसई द्वारा भी इसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह पूरी तरह से एक अवैध गतिविधि थी।”
विनियामक विकासक्रम को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा कि सेबी के 2016 के सर्कुलर और एनसीएल के 20.05.2019 के सर्कुलर के तहत कोलैटरल की रिपोर्टिंग समय-समय पर (मासिक और साप्ताहिक) ‘क्लाइंट मार्जिन या कोलैटरल’ के नाम से समेकित खातों में की जाती थी। मार्जिन प्लेज और री-प्लेज के माध्यम से डिपॉजिटरी ट्रेल की पारदर्शी व्यवस्था 25.02.2020 के सर्कुलर द्वारा लाई गई (जो 30.06.2020 से प्रभावी हुई), जबकि ग्राहक-स्तरीय कोलैटरल के वास्तविक समय और दैनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था सेबी के 20.07.2021 के सर्कुलर से लागू हुई। अदालत ने माना कि 2020 की शुरुआत में हुई इन कार्यवाहियों के समय पीसीएम के पास न तो व्यक्तिगत खाता-बही की विजिबिलिटी थी और न ही कोलैटरल बेचने से पहले उनकी जांच करने का कोई वैधानिक कर्तव्य था।
अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर अदालत ने एनसीएल के इस तर्क को खारिज कर दिया कि निष्कासन की बड़ी शक्ति में बहाली की छोटी शक्ति शामिल है। एससीआरए की धारा 9(3)(बी)(iv) के स्पष्ट शब्दों पर जोर देते हुए अदालत ने कहा:
“विधानमंडल ने दो संबंधित कानूनों में सेबी को तो डिसगॉर्जमेंट की शक्ति प्रदान की, लेकिन स्टॉक एक्सचेंज के उप-नियमों के तहत इसे जानबूझकर शामिल नहीं किया; जिसे साम्या, न्याय और अंतरात्मा की आवाज के आधार पर, वह भी एक स्पष्ट वैधानिक रोक के विरुद्ध, लागू नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने सैट द्वारा नियम 21 के तहत प्रक्रियात्मक शक्तियों के प्रयोग को भी अनुचित ठहराया और सेबी बनाम एस. कुमार्स नेशनवाइड लिमिटेड के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि अपीलीय न्यायाधिकरण मूल प्राधिकारी को कानून द्वारा दी गई शक्तियों से अधिक शक्ति अपने हाथ में नहीं ले सकता। सीपीसी की धारा 144 (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स) और अनजस्ट एनरिचमेंट (इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन) से जुड़े फैसलों को अलग बताते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि पीसीएम द्वारा की गई बिक्री उस समय के विनियामक ढांचे के तहत अपने संभावित नुकसान की भरपाई के लिए कानूनी रूप से वैध थी।
‘मासूम निवेशकों’ के नुकसान के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“प्रतिवादियों ने बार-बार एक सुर में ‘मासूम निवेशकों’ की जीवन भर की कमाई लुट जाने का तर्क दिया। हम इस दलील को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, क्योंकि न तो निवेशक में और न ही उनकी गतिविधि में मासूमियत देखी जा सकती है, जो स्वाभाविक रूप से अत्यधिक सट्टेबाजी वाली और इसलिए अस्थिर व नाजुक है।”
एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग में खुदरा निवेशकों के नुकसान पर प्रकाशित अध्ययनों का हवाला देते हुए अदालत ने आगे कहा:
“निवेशक खुली आंखों से आसान मुनाफे की उम्मीद में इस भंवर में कूदता है, लेकिन वह उन अंतर्निहित धाराओं का अनुमान नहीं लगा पाता जो उसे कंगाली और कर्ज की उस अगाध गहराई में ले जा सकती हैं, जहां वह हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।”
निर्णय
कानून के तीनों प्रश्नों का उत्तर पीसीएम के पक्ष में और एनसीएल व निवेशकों के विरुद्ध देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 31/2024, 2187/2024, 3179/2024 और 7313/2024 को स्वीकार कर लिया तथा एमसीएसजीएफ कमेटी व सैट के आदेशों को निरस्त कर दिया। नकद मार्जिन की बहाली की मांग करने वाले एक व्यक्तिगत निवेशक की सिविल अपील संख्या 4238/2026 को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया गया। अदालत ने प्रभावित निवेशकों को कानून के दायरे में अपने संबंधित डिफॉल्टिंग ट्रेडिंग मेंबर्स के खिलाफ कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: एडलवाइस कस्टोडियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम एनएसई क्लीयरिंग लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 31/2024 (सिविल अपील संख्या 7313/2024, 2187/2024, 3179/2024 और 4238/2026 के साथ)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 2 सितंबर 2026

