बच्चा तस्करी मामले में आरोपी को नवजात सौंपने से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का इनकार, याचिका खारिज

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नवजात शिशु की कस्टडी की मांग कर रहे एक व्यक्ति की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता पर आठ लाख रुपये देकर बच्चा खरीदने और नवजात शिशुओं की तस्करी के गिरोह से जुड़े होने का आरोप है।

जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी कथित तस्कर को बच्चा सौंपना न्याय का खुला मखौल होगा। अदालत ने स्वीकार किया कि बच्चे की कस्टडी के लिए हेबियस कॉर्पस याचिका विचारणीय हो सकती है, भले ही गोदनामा कानूनी रूप से वैध हो या न हो, लेकिन याचिकाकर्ता पर लगे गंभीर आपराधिक आरोपों को देखते हुए उसे बच्चे की कस्टडी नहीं दी जा सकती।

अदालत की टिप्पणी और विधिक आधार

25 अगस्त के अपने आदेश में अदालत ने कहा कि वह इस स्तर पर गोद लेने के कागजातों की वैधता या आपराधिक आरोपों की सत्यता की अंतिम जांच नहीं कर रही है, क्योंकि यह ट्रायल कोर्ट के क्षेत्राधिकार का विषय है। हालांकि, हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता खुद बच्चा तस्करी की प्राथमिकी में नामजद आरोपी है, इसलिए बच्चे को दोबारा उसके संरक्षण में भेजना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।

गोद लेने का दावा और पुलिस कार्रवाई की पृष्ठभूमि

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मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी को दिसंबर 2025 में बच्चे के जैविक माता-पिता से एक नोटरीकृत गोदनामे (अडॉप्शन डीड) के जरिए नवजात की कस्टडी मिली थी। इसके बाद जनवरी 2026 में स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र में इस दंपती को ही बच्चे का अभिभावक दर्ज किया गया।

इस मामले में नया मोड़ 1 अप्रैल को आया, जब पुलिस ने नवजात बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त और तस्करी में लिप्त एक संगठित गिरोह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। पुलिस जांच में आरोप सामने आया कि याचिकाकर्ता ने गिरोह के एक सह-आरोपी से इस नवजात को आठ लाख रुपये में खरीदा था।

इसके बाद 4 मई को याचिकाकर्ता पुलिस जांच में शामिल हुआ, जिसके तुरंत बाद प्रशासन ने नवजात को अपनी सुरक्षात्मक हिरासत में ले लिया। फिर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के निर्देश पर बच्चे को स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी में भेज दिया गया।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शरणजीत सिंह बाजवा ने दलील दी कि दंपती बच्चे को अपने सगे बेटे की तरह पाल रहा था और उनका बच्चे के साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव हो चुका है। उन्होंने तर्क दिया कि अधिकारियों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना बच्चे को उनसे अलग किया। अपने पक्ष के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के उन पुराने फैसलों का हवाला दिया जिनमें बच्चों को दत्तक माता-पिता के सुपुर्द करने का निर्देश दिया गया था।

वहीं, राज्य सरकार की तरफ से डिप्टी एडवोकेट जनरल दीया सोढ़ी ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पीठ को बताया कि बच्चे को तस्करी की आपराधिक जांच के दौरान बरामद किया गया है और याचिकाकर्ता पर उसे आठ लाख रुपये में खरीदने का सीधा आरोप है। सरकारी वकील ने कहा कि बच्चा देखरेख और सुरक्षा की आवश्यकता वाली श्रेणी में आता है, तथा बच्चे का कल्याण, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण सर्वोपरि होने के कारण ही उसे एजेंसी की निगरानी में रखा गया है।

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तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देने का कोई आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी।

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