न्यायिक अधिकारी हर समय न्यायिक अधिकारी ही होता है, लेकिन भ्रष्टाचार या सत्यनिष्ठा की कमी के बिना किया गया कदाचार अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आधार नहीं हो सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट

तेलंगाना हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस पी. सैम कोशी और जस्टिस नरसिंह राव नंदीकोंडा शामिल थे, ने एक परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर) जूनियर सिविल जज को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति (कंपलसरी रिटायरमेंट) की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि पुलिसकर्मियों के साथ अमर्यादित व अशिष्ट व्यवहार कदाचार के दायरे में आता है, लेकिन भ्रष्टाचार, सत्यनिष्ठा की कमी, नैतिक अधमता या किसी व्यक्तिगत लाभ के अभाव में अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसा कठोर दंड पूरी तरह असंगत और अनुचित है। याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने न्यायिक अधिकारी को उनके मूल पद पर बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही “काम नहीं तो वेतन नहीं” के सिद्धांत के तहत पिछला वेतन न देने, बहाली की तिथि से वरिष्ठता तय करने और शेष प्रशिक्षण पूरा करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता जी.ओ.एमएस. संख्या 5 दिनांक 12.01.2013 (संशोधित जी.ओ.एमएस. संख्या 6) के तहत सीधी भर्ती के माध्यम से आंध्र प्रदेश न्यायिक सेवा में जूनियर सिविल जज के पद पर नियुक्त हुए थे। उन्होंने 18.03.2013 से 17.09.2013 तक आंध्र प्रदेश ज्यूडिशियल एकेडमी में 18वें बैच के बुनियादी प्रशिक्षण का पहला चरण पूरा किया। इसके बाद उन्हें गुंटूर जिले के गुराजाला में द्वितीय अतिरिक्त जूनियर सिविल जज के पद पर पहली तैनाती दी गई।

गुराजाला में अपने कार्यकाल के दौरान याचिकाकर्ता ने जांच में खामियों और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) व एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत वैधानिक कर्तव्यों की अनदेखी पर पुलिस अधिकारियों को कई न्यायिक आदेश और कारण बताओ नोटिस जारी किए। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन न्यायिक कदमों के कारण स्थानीय पुलिसकर्मी उनसे दुर्भावना रखने लगे थे।

18 मार्च 2014 को सुबह लगभग 9:00 बजे जब याचिकाकर्ता छुट्टी के बाद अपनी अदालत जा रहे थे, तब पोंडुगुला चेक-पोस्ट पर चुनाव आचार संहिता का पालन करा रहे पुलिसकर्मियों ने उनके आधिकारिक वाहन को रोका। याचिकाकर्ता का आरोप था कि चेक-पोस्ट पर उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। इसके बाद उन्होंने प्रधान जिला न्यायाधीश, गुंटूर और हाईकोर्ट को अभ्यावेदन भेजे। इसके तुरंत बाद 23 मार्च 2014 को हाईकोर्ट ने उनका तबादला विशाखापट्टनम जिले के चिंतापल्ली में कर दिया।

प्रधान जिला न्यायाधीश, गुंटूर की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया और सतर्कता शाखा की कार्यवाही (आरओसी संख्या 523/2014-विजिलेंस सेल) के तहत छह आरोप तय किए:

  • आरोप संख्या 1 और 2: आरोप था कि 18 मार्च 2014 को पोंडुगुला चेक-पोस्ट पर गाड़ी रोके जाने पर याचिकाकर्ता ने गुस्से और अभद्रता से प्रतिक्रिया दी, एक पुलिस कांस्टेबल को धमकाया, सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल को सुबह 10:30 बजे अपनी अदालत में तलब किया, उन्हें दो घंटे से अधिक समय तक कोर्ट के कोने में खड़ा रखा, उन पर चिल्लाए, एससी/एसटी एक्ट के तहत संज्ञान लेने की धमकी दी और अपने अर्दली को निर्देश दिया कि वह उप-जेल अधीक्षक को उन्हें रिमांड पर भेजने के लिए एस्कॉर्ट पुलिस भेजने को कहे।
  • आरोप संख्या 3, 4 और 5: आरोप था कि 15 मार्च 2014 को तुम्मालाचेरुवु टोल प्लाजा पर टोल छूट में दो मिनट की देरी की घटना को लेकर याचिकाकर्ता ने टोल कर्मियों को 18 मार्च 2014 को अदालत में बुलवाया, दोपहर 12:00 बजे तक उन्हें अदालत में रोके रखा, स्थानीय पुलिस को निर्देश देकर शाम 6:45 बजे तक थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखवाया और फिर उन्हें अपने आवास पर बुलवाकर डांटा व रात 9:00 बजे तक रोके रखा।
  • आरोप संख्या 6: आरोप था कि 15 मार्च 2014 को कार्यालय समय के बाद मुख्यालय छोड़ने की अनुमति मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता बिना उच्च अधिकारियों को सूचित किए दोपहर 3:00 बजे ही मुख्यालय से चले गए, जो हाईकोर्ट के परिपत्र निर्देशों का उल्लंघन था।
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आंध्र प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमावली, 1991 के तहत नियमित विभागीय जांच कराई गई। जांच अधिकारी ने 8 अगस्त 2016 को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आरोप संख्या 1 और 2 को सिद्ध पाया गया, जबकि आरोप संख्या 3 से 6 को असिद्ध (साबित नहीं) माना गया।

अनुशासनात्मक प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहे हाईकोर्ट ने आरोप 3 से 6 पर जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असहमति जताई और 6 मार्च 2017 को असहमति नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता की आपत्तियों को खारिज करते हुए अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने की सिफारिश की। इसके बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने 4 जनवरी 2018 को जी.ओ.एमएस. संख्या 2 जारी कर 1991 की नियमावली के नियम 9(8) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड दिया, जिसे 5 जनवरी 2018 की कार्यवाही द्वारा संसूचित किया गया। याचिकाकर्ता ने इस आदेश, जांच रिपोर्ट और असहमति निष्कर्षों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने दलील दी कि:

  • न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की जांच से जुड़े वर्ष 1977 के परिपत्र निर्देशों (आरओसी संख्या 325/76-बी.स्पेशल दिनांक 06.08.1977) और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों (डी.ओ. संख्या सीजेआई/सीसी/सीएमपीएल/2017/2246 दिनांक 16.03.2017) का उल्लंघन कर विभागीय कार्यवाही शुरू की गई थी, इसलिए यह पूरी प्रक्रिया दूषित है।
  • पुलिस अधिकारियों की शिकायतें पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोध की भावना से की गई थीं, क्योंकि याचिकाकर्ता ने कर्तव्य में लापरवाही बरतने पर उनके विरुद्ध न्यायिक नोटिस और वारंट जारी किए थे।
  • जांच अधिकारी ने आरोप 1 और 2 के लिए बिना किसी स्वतंत्र साक्ष्य के केवल पुलिसकर्मियों के बयानों पर भरोसा किया, जबकि आरोप 3 से 6 पर दोषमुक्त करते समय अलग मानक अपनाया।
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास आरोप 3 से 6 पर जांच अधिकारी के निष्कर्षों को पलटने के लिए कोई स्वतंत्र सामग्री या ठोस कारण नहीं थे और न ही इसके लिए कोई नई जांच कराई गई।
  • दिया गया दंड अत्यंत कठोर और असंगत है, क्योंकि साबित आरोप केवल प्रोबेशन की शुरुआती अवधि में हुए व्यवहार संबंधी अनौपचारिक आचरण से जुड़े थे, जिनमें भ्रष्टाचार, बेईमानी, नैतिक पतन या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं था।

याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—कृष्णा प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य, ईश्वर चंद जैन बनाम पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट, निर्भय सिंह सुल्या बनाम मध्य प्रदेश राज्य (जिसमें योगीनाथ डी. बागडे बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला दिया गया), दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले—अमन प्रताप सिंह बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार, तथा तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसलों—एम. श्रीनिवास चारी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और कुमारी जी. गोविंदा लक्ष्मी बनाम तेलंगाना सरकार पर भरोसा जताया।

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दूसरी ओर, विद्वान सरकारी वकील और हाईकोर्ट की विद्वान स्थायी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि:

  • विभागीय जांच 1991 के नियमों के पूर्ण अनुपालन में हुई, जिसमें नौ गवाहों के बयान और प्रचुर दस्तावेजी साक्ष्य दर्ज किए गए।
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी को नोटिस देकर जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असहमत होने का पूरा विधिक अधिकार प्राप्त है।
  • चुनाव ड्यूटी कर रहे लोकसेवकों और आम नागरिकों के साथ याचिकाकर्ता का असभ्य और अशिष्ट व्यवहार न्यायिक सेवा की गरिमा के प्रतिकूल था, जो आचरण नियमावली, 1964 के नियम 3 के तहत गंभीर कदाचार है और अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड पूरी तरह न्यायोचित है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने आरोपों से जुड़े निष्कर्षों और दंड के अनुपात की विस्तृत समीक्षा की।

आरोप संख्या 3 से 6 के संबंध में खंडपीठ ने रेखांकित किया कि जांच अधिकारी ने मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही इन्हें असिद्ध पाया था। अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा बिना किसी नई सामग्री या ठोस कारण के इन निष्कर्षों को पलटने को अनुचित मानते हुए कोर्ट ने कहा:

“किसी अतिरिक्त सामग्री या ठोस कारणों के अभाव में अनुशासनात्मक प्राधिकारी केवल अपनी राय को जांच अधिकारी की राय के स्थान पर प्रतिस्थापित नहीं कर सकता था। परिणामस्वरूप, अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा आरोप संख्या 3 से 6 को सिद्ध मानने के निष्कर्ष टिकने योग्य नहीं हैं और उन्हें निरस्त किया जाता है।”

आरोप संख्या 1 और 2 के संबंध में कोर्ट ने माना कि ये निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों की गवाही, प्रारंभिक जांच बयानों और समकालीन अभिलेखों पर आधारित हैं। इसमें किसी प्रक्रियात्मक अवैधता का अभाव होने के कारण अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

न्यायिक अधिकारियों के आचरण पर विस्तार से विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक पद एक उच्च सार्वजनिक विश्वास का पद है, जो न्यायालय के घंटों तक ही सीमित नहीं रहता:

“एक न्यायिक अधिकारी उच्च लोक विश्वास का पद धारण करता है और उससे न केवल पीठ पर न्यायिक कार्य करते हुए, बल्कि अदालत के बाहर भी गरिमा, संयम और औचित्य के उच्चतम मानकों को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। न्यायिक अधिकारी का पद अदालत के कार्य समय के साथ समाप्त नहीं हो जाता। न्यायिक सेवा के सदस्य से अपेक्षित आचरण के मानक अदालत कक्ष से आगे तक विस्तृत होते हैं और हर समय उसके आचरण को नियंत्रित करते हैं। इस दृष्टि से एक न्यायिक अधिकारी हर समय एक न्यायिक अधिकारी ही होता है, न कि केवल अदालत के कामकाजी घंटों के दौरान।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1997 में अंगीकृत ‘न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन’ (रेस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ) का उल्लेख किया:

“प्रत्येक न्यायाधीश को हर समय इस बात के प्रति सचेत रहना चाहिए कि वह जनता की नजरों में है। उसके द्वारा ऐसा कोई कृत्य या चूक नहीं होनी चाहिए जो उसके द्वारा धारित उच्च पद या उस पद के प्रति जनता के सम्मान के प्रतिकूल हो।”

दया शंकर बनाम इलाहाबाद हाईकोर्ट और ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ के निर्णयों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश एक विशिष्ट संवैधानिक स्थिति में होते हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में न्यायिक गरिमा में किसी भी छूट को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“न्यायिक अधिकारी से अपेक्षित शिष्टाचार, सभ्यता, धैर्य, संयम, सहिष्णुता, क्षमाशीलता, निष्पक्षता और गरिमापूर्ण आचरण के मानकों में कभी कोई ढिलाई नहीं हो सकती। इसके विपरीत, एक जटिल और गतिशील समाज में ये गुण और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।”

सजा के अनुपात पर विचार करते हुए खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता प्रोबेशन के शुरुआती दौर में थे और साबित कदाचार में कोई भ्रष्ट मंशा शामिल नहीं थी:

“आरोपों में भ्रष्टाचार, सत्यनिष्ठा की कमी, नैतिक अधमता, व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायिक पद का दुरुपयोग या किसी बेईमान इरादे का कोई आरोप शामिल नहीं है। ऐसा कोई आरोप भी नहीं है कि याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा के किसी अन्य बिंदु पर एक न्यायिक अधिकारी के रूप में अपनी सत्यनिष्ठा या निष्पक्षता को प्रभावित करने वाले किसी आचरण को अंजाम दिया हो।”

कोर्ट ने माना कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का कठोर दंड पूरी तरह असंगत था:

“साबित कदाचार की प्रकृति, याचिकाकर्ता की सत्यनिष्ठा या ईमानदारी पर किसी भी आरोप के अभाव और सेवा के उस चरण को ध्यान में रखते हुए जिस पर यह घटना घटी, इस न्यायालय का यह सुविचारित मत है कि अधिरोपित किया गया दंड अत्यधिक कठोर और स्थापित कदाचार की तुलना में पूरी तरह असंगत है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

तेलंगाना हाईकोर्ट ने रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 4 जनवरी 2018 के जी.ओ.एमएस. संख्या 2 और 5 जनवरी 2018 की अनिवार्य सेवानिवृत्ति की कार्यवाही को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उनके मूल पद पर तुरंत बहाल करने का आदेश दिया। परिणामी लाभों के संबंध में कोर्ट ने निर्देश दिया:

“चूँकि याचिकाकर्ता 05.01.2018 से आज तक अपनी सेवा का एक बड़ा हिस्सा गंवा चुके हैं और उन्हें बिना किसी परिणामी लाभ के उनके मूल पद पर वापस भेजा जा रहा है, हमारा यह सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता को पद से दूर रखना और उन्हें उनके मूल पद पर बहाल करना ही साबित आरोपों के लिए सजा माना जा सकता है। तथापि, इस तथ्य को देखते हुए कि याचिकाकर्ता ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति की तिथि से लेकर बहाली की तिथि तक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया, इस न्यायालय का विचार है कि ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू होगा।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए किसी भी पिछले वेतन या वित्तीय लाभ के हकदार नहीं होंगे। उनकी वरिष्ठता बहाली की तिथि से तय की जाएगी और उन्हें अपना शेष प्रशिक्षण पूरा करना होगा।


वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 12901/2018
पीठ: जस्टिस पी. सैम कोशी और जस्टिस नरसिंह राव नंदीकोंडा
निर्णय की तिथि: 18.08.2026

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