आपराधिक अदालतों की प्रक्रियात्मक शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 362 के तहत लगा प्रतिबंध अदालत को धारा 311 के तहत किसी महत्वपूर्ण गवाह को बुलाने, दोबारा तलब करने या फिर से बयान दर्ज करने से नहीं रोकता, भले ही अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो। ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं सुना दिया जाता, तब तक ट्रायल के दौरान केवल साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया समाप्त करने के अंतरिम आदेश से अदालत फंक्टस ऑफिशियो (अधिकार-शून्य) नहीं हो जाती। अदालत ने यह भी माना कि दोनों धाराएं पूरी तरह से अलग-अलग कार्यक्षेत्र में काम करती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला डीग जिले के पहाड़ी थाने में याचिकाकर्ता सत्तार द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी संख्या 260/2012 से जुड़ा है। पुलिस जांच के बाद आरोपी जमशेद और दिलशान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 302, 323, 341 और 34 के तहत आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया था।
ट्रायल के दौरान याचिकाकर्ता का बयान पीडब्ल्यू-1 के रूप में दर्ज हुआ। इसके अलावा अन्य गवाहों—इमरान (पीडब्ल्यू-2), अकबर (पीडब्ल्यू-3) और उम्मेद हाजी (पीडब्ल्यू-5) के बयान भी दर्ज किए गए। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 319 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 यानी बीएनएसएस की धारा 358) के तहत दिए गए एक प्रार्थना-पत्र को स्वीकार कर लिया और जमील, महमूदा और हसीना को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किया।
इन नए आरोपियों के अदालत में पेश होने के बाद उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 148, 452, 341, 323 और 302 (वैकल्पिक तौर पर धारा 302 सहपठित धारा 149) के तहत आरोप तय किए गए। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने नए आरोपियों के संबंध में याचिकाकर्ता सत्तार और अन्य गवाहों—इमरान, अनीशा और उम्मेद हाजी के बयान दर्ज करने के लिए जमानती वारंट जारी किए। हालांकि, ये वारंट गवाहों तक नहीं पहुंचे और उनकी तामील नहीं हो सकी। इसके बावजूद 11 जुलाई 2025 को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए अभियोजन के साक्ष्य दर्ज करने का अवसर समाप्त कर दिया कि गवाह पेश नहीं हुए।
इस आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 311 (बीएनएसएस की धारा 348) के तहत एक अर्जी लगाई और खुद तथा अन्य गवाहों को बयान दर्ज कराने के लिए दोबारा बुलाने की मांग की। 18 मार्च 2026 को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कामां (जिला डीग) ने इस अर्जी को दो आधारों पर खारिज कर दिया: पहला यह कि साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद अदालत धारा 311 के तहत गवाहों को दोबारा नहीं बुला सकती; और दूसरा यह कि ऐसी अर्जी स्वीकार करना साक्ष्य बंद करने के अपने ही आदेश की समीक्षा (रिव्यू) करने जैसा होगा, जिस पर सीआरपीसी की धारा 362 (बीएनएसएस की धारा 403) के तहत रोक है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील अनुज रोहिला ने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 311 अदालत को जांच या ट्रायल के किसी भी चरण में किसी भी गवाह को बुलाने या दोबारा बयान दर्ज करने का स्वतंत्र और मौलिक अधिकार देती है, बशर्ते न्यायसंगत फैसले के लिए ऐसा साक्ष्य जरूरी हो। उन्होंने तर्क दिया कि इस अधिकार का उपयोग करना पुराने आदेश का रिव्यू नहीं माना जा सकता और न ही धारा 362 ट्रायल के दौरान इस पर कोई पूर्ण प्रतिबंध लगाती है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन गवाहों को बुलाने की मांग की जा रही है, वे मामले के मुख्य अभियोजन गवाह हैं जिनके वारंट तामील ही नहीं हुए थे। साथ ही, इससे आरोपियों को कोई नुकसान नहीं होगा क्योंकि उन्हें गवाहों से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का पूरा और निष्पक्ष अवसर मिलेगा।
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील विवेक चौधरी ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों का कोई विरोध नहीं किया।
अदालत का विश्लेषण और पूर्व फैसलों का संदर्भ
जस्टिस उपमन ने सीआरपीसी की धारा 311 के दायरे का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह प्रावधान अदालत को व्यापक विवेकाधिकार देता है ताकि सही और न्यायसंगत फैसले के लिए जरूरी सभी साक्ष्य रिकॉर्ड पर लाए जा सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारा में मुख्य बिंदु यह नहीं है कि अर्जी किस चरण में लगाई गई है, बल्कि यह देखना है कि क्या वह साक्ष्य न्याय के हित में आवश्यक प्रतीत होता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विजय कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2011) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 311 की शक्तियों का उपयोग न्यायिक रूप से तभी किया जाना चाहिए जब गवाह का बयान मामले से जुड़ा हो या किसी भूलवश महत्वपूर्ण सामग्री रिकॉर्ड पर आने से छूट गई हो।
क्या अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी हो जाने से अदालत की यह शक्ति समाप्त हो जाती है? इस प्रश्न पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मोहनलाल शामजी सोनी बनाम भारत संघ (1991) फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में यह तय किया गया था कि दोनों पक्षों के साक्ष्य बंद हो जाने के बाद भी आपराधिक अदालत के पास किसी व्यक्ति को गवाह के रूप में बुलाने या उसका पुनः बयान दर्ज करने का पूरा अधिकार रहता है।
इसके साथ ही अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के वर्षा गर्ग बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (2022) फैसले में की गई निम्नलिखित टिप्पणी को उद्धृत किया:
“अदालत की शक्ति साक्ष्य बंद होने से सीमित नहीं होती है। इसलिए, उपरोक्त चर्चा से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि धारा 311 के तहत व्यापक शक्तियां न्याय की आवश्यकता द्वारा निर्देशित होती हैं। इस शक्ति का उपयोग वहां जरूर किया जाना चाहिए जहां अदालत को लगे कि कोई साक्ष्य मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिए आवश्यक है। यह वैधानिक प्रावधान इस बात पर जोर देता है कि अदालत न्याय के रास्ते से भटकने पर एक बेबस दर्शक नहीं बनी रह सकती। इसके ठीक विपरीत, न्याय की प्राप्ति में सहायता के रूप में सच को सामने लाने के उद्देश्य को साकार करने में अदालत को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।”
धारा 311 और धारा 362 के आपसी तालमेल पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 362 केवल तब रोक लगाती है जब अदालत ने अपना निर्णय या अंतिम आदेश हस्ताक्षरित करके मामले का निपटारा कर दिया हो (केवल लिपिकीय या गणितीय त्रुटियों को सुधारने के अलावा)। लेकिन यह धारा ट्रायल लंबित रहने के दौरान अदालत को धारा 311 के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने से नहीं रोकती।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने अपनी ही समन्वय पीठ के फैसले जगदीश प्रसाद शर्मा बनाम राजस्थान राज्य (2018) का सहारा लिया, जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले जय सिंह बनाम सोमा उर्फ सोमनाथ (2006) का हवाला देकर स्पष्ट किया गया था कि साक्ष्य बंद करने का आदेश कोई अंतिम फैसला या निर्णय नहीं होता और इससे अदालत अधिकार-शून्य नहीं होती। इसके अलावा, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सुरेश कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2019) फैसले का भी संदर्भ दिया गया, जिसमें माना गया था कि साक्ष्य दर्ज होने के बाद अतिरिक्त गवाह को बुलाना किसी आदेश का रिव्यू नहीं कहलाता।
दोनों धाराओं की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“परिणामस्वरूप, ट्रायल लंबित रहने के दौरान और अंतिम निर्णय सुनाए जाने तथा उस पर हस्ताक्षर किए जाने से पहले, केवल इसलिए अदालत अधिकार-शून्य (फंक्टस ऑफिशियो) नहीं हो जाती क्योंकि किसी विशेष गवाह के साक्ष्य पहले बंद कर दिए गए थे। धारा 311 और धारा 362 सीआरपीसी के प्रावधान अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और उनका सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकाला जाना आवश्यक है। इसलिए, जब अदालत संतुष्ट हो कि मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिए ऐसा साक्ष्य आवश्यक है, तो जिस गवाह के साक्ष्य पहले बंद कर दिए गए थे, उसे बुलाने, दोबारा तलब करने या फिर से बयान दर्ज करने के लिए धारा 311 सीआरपीसी की शक्ति के प्रयोग के खिलाफ धारा 362 सीआरपीसी को पूर्ण प्रतिबंध के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।”
वर्तमान मामले के तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए अदालत ने पाया कि जिन गवाहों को दोबारा बुलाने की मांग की गई है, वे कोई नए गवाह नहीं हैं बल्कि मुख्य अभियोजन गवाह हैं जिनके बयान पहले भी दर्ज हो चुके थे। जब धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपियों को तलब किया गया, तो इन गवाहों के बयानों का महत्व और बढ़ गया था। अदालत ने टिप्पणी की:
“यह स्पष्ट है कि धारा 311 सीआरपीसी के तहत शक्ति एक स्वतंत्र वैधानिक शक्ति है और वर्तमान मामले के तथ्यों में इसका प्रयोग पुराने आदेश का रिव्यू नहीं माना जा सकता तथा साक्ष्य बंद होने के बाद भी इस पर विचार किया जा सकता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कामां के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा 18 मार्च 2026 को दिए गए आदेश को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह कानून के अनुसार पीडब्ल्यू-1 (सत्तार), पीडब्ल्यू-2 (इमरान), पीडब्ल्यू-3 (अनीशा) और पीडब्ल्यू-5 (उम्मेद हाजी) को समन जारी कर उनके बयान या पुनः बयान दर्ज करे। वहीं याचिकाकर्ता के वकील को भी इन गवाहों की अदालत में मौजूदगी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया कि ट्रायल में आगे बढ़ने से पहले आरोपियों को इन सभी गवाहों से जिरह करने का पूरा और प्रभावी अवसर दिया जाए। साथ ही यह साफ किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल इस याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और इनका मामले के गुण-दोष से कोई लेना-देना नहीं है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सत्तार बनाम राजस्थान राज्य
वाद संख्या: एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस (पिटीशन) संख्या 4401/2026
पीठ: जस्टिस अनिल कुमार उपमन
निर्णय की तिथि: 19/08/2026

