बच्चे मां के मूल निवास के आधार पर जाति प्रमाण पत्र और आरक्षण के हकदार: मद्रास हाईकोर्ट का पुडुचेरी मामले में फैसला

समानता और लैंगिक न्याय से जुड़े एक अहम फैसले में मद्रास हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश में जन्मे और पले-बढ़े बच्चे अपनी मां के मूल निवास (ओरिजिन स्टेटस) के आधार पर अनुसूचित जाति (एससी), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) या अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का जाति प्रमाण पत्र पाने के हकदार हैं, भले ही उनके पिता किसी अन्य राज्य से आए प्रवासी हों। जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की पीठ ने याचिकाओं के एक समूह को स्वीकार करते हुए प्रशासन के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत ऐसे उम्मीदवारों को ‘ओरिजिन’ का दर्जा देने से मना कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सभी उम्मीदवार पुडुचेरी प्रशासन द्वारा दी जाने वाली नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए आरक्षण के सभी लाभ पाने के पात्र हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ऐसे उम्मीदवारों और नाबालिग बच्चों के माता-पिता द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था, जिनका जन्म, पालन-पोषण और शिक्षा पूरी तरह से पुडुचेरी में हुई थी। इन सभी मामलों में बच्चों की माताएं पुडुचेरी की मूल निवासी थीं और उनके पास एससी, एमबीसी या ओबीसी श्रेणी का पुडुचेरी ‘ओरिजिन’ का वैध जाति प्रमाण पत्र मौजूद था। वहीं, उनके पिता भी उसी जाति या समुदाय से थे, लेकिन वे मुख्य रूप से पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के जिलों से आकर पुडुचेरी में बसे थे, या उनके पास तय कट-ऑफ तारीख से पहले का पुडुचेरी का पैतृक दस्तावेज नहीं था, जिसके कारण उन्हें ‘प्रवासी’ माना जा रहा था।

पुडुचेरी में मूल निवासी का दर्जा तय करने के लिए अनुसूचित जाति के मामले में ‘संविधान (पांडिचेरी) अनुसूचित जाति आदेश, 1964’ के तहत 5 मार्च 1964 और एमबीसी व ओबीसी श्रेणियों के लिए सरकारी आदेश (जीओ एमएस नंबर 9/2001) के तहत 19 फरवरी 2001 की कट-ऑफ तारीख तय है।

प्रशासन को उम्मीदवारों की जाति या पुडुचेरी में उनके जन्म को लेकर कोई आपत्ति नहीं थी। इसके बावजूद, अधिकारियों ने उन्हें पुडुचेरी के ‘ओरिजिन’ दर्जे वाला प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, या तो उनके आवेदन खारिज कर दिए गए या फिर प्रमाण पत्र पर ‘प्रवासी’ (माइग्रेंट) लिख दिया गया। इस श्रेणी के कारण वे केवल केंद्र सरकार की नौकरियों या ऑल इंडिया कोटा में ही आरक्षण का दावा कर सकते थे, जबकि पुडुचेरी प्रशासन के अंतर्गत आने वाले आरक्षण कोटे से वे पूरी तरह बाहर हो रहे थे।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जी. मणिसुंदरगोपाल, जी. मणिलाल और अन्य वकीलों ने तर्क दिया कि प्रशासन का यह रवैया लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण है और सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन करता है। वकीलों ने कहा कि समाज को पितृसत्तात्मक मानकर केवल पिता के निवास को आधार बनाना कानूनी तौर पर सही नहीं है, खासकर तब जब हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में 2005 के संशोधन के बाद महिलाओं को पैतृक संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार मिल चुके हैं।

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याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के रमेशभाई दाभाई नायक बनाम गुजरात राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मां के माध्यम से भी जातिगत दर्जा हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने याद दिलाया कि 10 नवंबर 2000 का वह सर्कुलर, जिसके जरिए आरक्षण केवल पिता के आधार पर देने का नियम बनाया गया था, उसे हाईकोर्ट ने पी. जया बनाम भारत संघ मामले में पहले ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इस फैसले को डिवीजन बेंच ने भी बरकरार रखा था और साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की अपील खारिज करते हुए इसे नहीं बदला था। इसके बाद हाईकोर्ट की कई डिवीजन बेंचों—जैसे शिवा जॉनसन कैनेडी. आई बनाम भारत संघ और पुडुचेरी भीम सेना बनाम भारत संघ—ने मां के मूल निवास के आधार पर ओरिजिन प्रमाण पत्र जारी करने के आदेश दिए थे।

दूसरी तरफ, पुडुचेरी प्रशासन की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील आर. श्रीधर ने याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा अनुच्छेद 341 के तहत जारी राष्ट्रपति के आदेश से तय होता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसलों—मर्री चंद्र शेखर राव, एक्शन कमेटी और बीर सिंह बनाम दिल्ली जल बोर्ड—का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल मूल राज्य में ही लिया जा सकता है, किसी दूसरे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में प्रवास करने पर नहीं।

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प्रशासन का कहना था कि समाज पितृसत्तात्मक है और जाति पिता के आधार पर ही तय होती है। उन्होंने एन. प्रेमनाथ, माइनर अनबरसन और सी. सत्यवती मामलों में डिवीजन बेंच के विपरीत आदेशों, केंद्र सरकार के 17 जुलाई 2025 के परामर्श पत्र और सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) का हवाला देते हुए अपने फैसले को सही ठहराया।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

आरक्षण की संवैधानिक बुनियाद पर विचार करते हुए जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि आरक्षण औपचारिक समानता से आगे बढ़कर वास्तविक और ठोस समानता स्थापित करने का माध्यम है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक असमानता को दूर करना है।

कोर्ट ने पुडुचेरी प्रशासन की पारंपरिक पितृसत्ता वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से समाज भले ही पितृसत्तात्मक रहा हो, लेकिन इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में दिए गए मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं माना जा सकता:

“यह पारंपरिक धारणा कि वंश केवल पितृसत्तात्मक ही हो सकता है और महिला को पुरुष का ही अधिवास अपनाना होगा, ये सभी ऐसी रूढ़ियां हैं जो केवल एक महिला-विरोधी समाज के कारण विकसित हुईं, जिसने महिलाओं को इसका पालन करने के लिए विवश किया।”

सुप्रीम कोर्ट के जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि महिला की पहचान का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और शादी के बाद इसे खत्म नहीं माना जा सकता। रमेशभाई दाभाई नायक मामले के सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की वास्तविक कसौटी यह है कि क्या बच्चे ने समुदाय में रहकर सामाजिक अभावों और कठिनाइयों का सामना किया है:

“आरक्षण का आधार केवल सामाजिक नुकसान और बच्चे से जुड़े कष्ट व सामाजिक दंश हैं; लाभ देने के लिए यही सबसे प्रमुख कारक है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था से आता है या मातृसत्तात्मक व्यवस्था से, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

प्रशासन द्वारा पेश किए गए पुराने फैसलों के टकराव को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने बताया कि मां के आधार पर दर्जा खारिज करने वाले डिवीजन बेंच के पुराने आदेश उस वक्त आए थे, जब पी. जया मामले पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम स्थगन चल रहा था और 10 नवंबर 2000 का सर्कुलर प्रभावी दिख रहा था। लेकिन 2023 में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी, तो उस सर्कुलर को असंवैधानिक घोषित करने वाला फैसला पूरी तरह अंतिम हो गया। इसके परिणामस्वरूप प्रशासन का 3 अगस्त 1995 का पुराना आदेश स्वतः प्रभावी हो गया, जिसमें माता या पिता में से किसी के भी आधार पर ओरिजिन दर्जा देने की व्यवस्था थी। 2023 के बाद से हाईकोर्ट की सभी डिवीजन बेंचों ने लगातार मां के पक्ष में ही फैसले दिए हैं।

अदालत ने केंद्र सरकार के 17 जुलाई 2025 के पत्र को भी आधारहीन माना और कहा कि यह केवल अपील दाखिल करने का एक आंतरिक प्रशासनिक परामर्श था, जो न तो अदालती आदेशों को निष्प्रभावी कर सकता है और न ही असंवैधानिक करार दिए जा चुके किसी सर्कुलर को दोबारा लागू कर सकता है।

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कोर्ट का फैसला

याचिकाओं के समूह को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. पुडुचेरी प्रशासन के वे सभी आदेश रद्द किए जाते हैं, जिनके तहत उम्मीदवारों को ‘ओरिजिन’ दर्जे वाला जाति प्रमाण पत्र देने से इनकार किया गया था।
  2. याचिकाकर्ता और संबंधित उम्मीदवार अपनी मां के मूल निवास के आधार पर पुडुचेरी के मूल निवासी (ओरिजिन) के रूप में एससी, एमबीसी या ओबीसी का जाति प्रमाण पत्र पाने के हकदार हैं।
  3. वे पुडुचेरी प्रशासन के तहत सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के साथ-साथ अन्य सभी परिणामी लाभ पाने के पात्र होंगे।
  4. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि जाति का दावा फर्जी पाया जाता है या मां का खुद का मूल निवास साबित नहीं होता है, तो अधिकारियों को प्रमाण पत्र से इनकार करने का पूरा अधिकार रहेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: थेलागम बनाम संघ राज्य क्षेत्र पुडुचेरी एवं अन्य (बैच)
वाद संख्या: डब्ल्यूपी संख्या 30674 / 2026 एवं बैच
पीठ: जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती
निर्णय की तिथि: 27.08.2026

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