यह दोहराते हुए कि जब किसी विशेष कानून में शिकायतों के निवारण के लिए प्रभावी वैधानिक तंत्र मौजूद हो, तब संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत कुर्क की गई अचल संपत्तियों के बदले फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जमा करने की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी या संपत्ति के मालिक को कुर्क संपत्तियों के बदले वैकल्पिक सुरक्षा जमा कर संपत्ति मुक्त कराने का कोई पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ऋषभ सोनी (शौर्य एंटरप्राइजेज के प्रोप्राइटर व स्वर्णिम वेंचर्स के पार्टनर) और उनकी पत्नी कोमल सोनी (भव्य एजेंसी की प्रोप्राइटर व स्वर्णिम वेंचर्स की पार्टनर) छत्तीसगढ़ में सरकारी आपूर्ति और प्रोजेक्ट कार्यों से जुड़े हैं।
यह मामला जिला खनिज संस्थान ट्रस्ट (DMF) की निविदा आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 20 मार्च 2023 को ईसीआईआर (ECIR/RPZO/02/2023) दर्ज की थी। इसके बाद, 9 दिसंबर 2024 को ईडी ने पीएमएलए की धारा 2(1)(u) के तहत अपराध की आय के समतुल्य मूल्य के आधार पर याचिकाकर्ताओं की 11 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क करने (PAO) का आदेश जारी किया।
निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने 23 मई 2025 को कुर्की आदेश की पुष्टि कर दी। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को पीएमएलए अपीलीय ट्रिब्यूनल (PMLAT) के समक्ष चुनौती दी। अपीलीय ट्रिब्यूनल में मुख्य अपील लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने एक अंतरिम आवेदन दायर कर 4,36,05,780 रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट जमा करने की पेशकश की और इसके बदले कुर्क की गई 6 संपत्तियों को मुक्त करने का अनुरोध किया।
7 अप्रैल 2026 को अपीलीय ट्रिब्यूनल ने इस आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि पीएमएलए या वर्ष 2013 के नियमों में नियम 5(5) और 6 के तहत तय विशिष्ट परिस्थितियों के अलावा फिक्स्ड डिपॉजिट के बदले कुर्क अचल संपत्तियों को बदलने का कोई सामान्य प्रावधान नहीं है। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर कर ईडी को एफडी स्वीकार करने और संपत्तियों को छोड़ने का निर्देश देने की मांग की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संपत्तियों की निरंतर जब्ती से गंभीर वित्तीय संकट उत्पन्न हो रहा है, जिससे उनका व्यवसाय, वित्तीय साख और ऋण चुकाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि ये संपत्तियां सीधे अपराध की आय नहीं हैं, बल्कि धारा 2(1)(u) के तहत अपराध की आय के समतुल्य मूल्य के रूप में कुर्क की गई हैं। इसलिए, कुर्की का उद्देश्य केवल संपत्ति का मूल्य सुरक्षित रखना है, न कि याचिकाकर्ताओं को उनकी संपत्ति से वंचित करना। उन्होंने दलील दी कि 4,36,05,780 रुपये की नकदी और भारमुक्त एफडी की पेशकश जांच एजेंसी के हितों को पूरी तरह सुरक्षित करती है। साथ ही यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के पास ट्रिब्यूनल से परे व्यापक शक्तियां हैं और उन्होंने ईस्टर्न इंस्टीट्यूट फॉर इंटीग्रेटेड लर्निंग इन मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी, वाई.एस. भारती रेड्डी और ए. राजा से जुड़े मामलों पर भरोसा जताया।
दूसरी ओर, ईडी के वकील ने प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल के आदेशों के खिलाफ पीएमएलए की धारा 42 के तहत हाईकोर्ट के समक्ष वैधानिक अपील का स्पष्ट और प्रभावी उपाय मौजूद है, जिसे दरकिनार कर सीधे रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। मामले के गुण-दोष पर दलील देते हुए उन्होंने कहा कि 2013 के नियमों का नियम 5(5) केवल संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्तियों के विशिष्ट मामलों पर लागू होता है और इसमें “स्वीकार कर सकता है” (may accept) शब्दावली का उपयोग किया गया है, जो आवेदक को कोई बाध्यकारी अधिकार नहीं देती। ईडी ने यह भी रेखांकित किया कि विशेष अदालत (PMLA), रायपुर के समक्ष अभियोजन शिकायत पहले ही दर्ज की जा चुकी है, जिस पर अदालत संज्ञान ले चुकी है और धारा 8(5) के तहत जब्ती की कार्यवाही जारी है। ईडी का आरोप है कि डीएमएफ फंड से कमीशन और बोगस एंट्रीज के जरिए बड़ी रकम की हेराफेरी की गई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
पीएमएलए की धाराओं 2(1)(u), 5, 8, 24, 42 और वर्ष 2013 के नियमों के नियम 5(5) का विश्लेषण करते हुए जस्टिस गुरु ने कहा कि नियम 5(5) का दायरा अत्यंत सीमित है और इसे संपत्ति बदलने के सामान्य अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता:
“वर्ष 2013 के नियमों का नियम 5(5) एक विशिष्ट परिस्थिति में काम करता है। यह प्रावधान उस स्थिति की बात करता है जहां निर्णायक प्राधिकरण द्वारा पुष्ट की गई अचल संपत्ति संयुक्त स्वामित्व में हो और अधिकृत अधिकारी को संबंधित व्यक्ति के अनुमानित हिस्से के मूल्य की सीमा तक फिक्स्ड डिपॉजिट स्वीकार करने की अनुमति देता है। इसलिए, इस प्रावधान को इसके स्पष्ट शब्दों के आधार पर, प्रत्येक उस व्यक्ति को फिक्स्ड डिपॉजिट द्वारा प्रतिस्थापन की मांग करने का अप्रतिबंधित या सामान्य अधिकार देने वाला नहीं माना जा सकता जिसकी अचल संपत्ति कुर्क और पुष्ट की गई है। यह भी महत्वपूर्ण है कि नियम 5(5) में ‘स्वीकार कर सकता है’ शब्द का प्रयोग किया गया है न कि ‘स्वीकार करेगा’। इस प्रकार, जहां इस प्रावधान द्वारा विचारित परिस्थिति मौजूद भी हो, वहां भी फिक्स्ड डिपॉजिट की स्वीकृति संबंधित व्यक्ति के पूर्ण या अनिवार्य वैधानिक अधिकार के रूप में निहित नहीं है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि मात्र समतुल्य सुरक्षा की पेशकश कर देने से कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता:
“वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ताओं ने अपने द्वारा मांगी गई रीति से कुर्क संपत्तियों के प्रतिस्थापन की मांग करने के लिए कोई वैधानिक या अन्य प्रवर्तनीय अधिकार प्रदर्शित नहीं किया है। केवल समतुल्य फिक्स्ड डिपॉजिट की पेशकश करने से अपने आप में ऐसा कोई अधिकार पैदा नहीं हो सकता।”
याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत ईस्टर्न इंस्टीट्यूट फॉर इंटीग्रेटेड लर्निंग इन मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी के फैसले में अंतर बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“पीएमएलए के तहत कुर्की का उद्देश्य संपत्ति के मूल्य को सुरक्षित रखना है, यह सिद्धांत अपने आप में उस व्यक्ति के पक्ष में वैकल्पिक सुरक्षा द्वारा प्रतिस्थापन की मांग करने का कोई बिना शर्त अधिकार स्थापित नहीं करता जिसकी संपत्ति कुर्क की गई है। किसी दिए गए मामले में वैकल्पिक सुरक्षा स्वीकार की जानी चाहिए या नहीं, यह अनिवार्य रूप से वैधानिक ढांचे और उस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”
व्यावसायिक और वित्तीय कठिनाई की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह अदालत इस बात से अवगत है कि अचल संपत्तियों की निरंतर जब्ती से संबंधित व्यक्ति को असुविधा हो सकती है। हालांकि, कठिनाई अपने आप में वैधानिक योजना के विपरीत प्रतिस्थापन का अधिकार प्रदान नहीं कर सकती, विशेषकर तब जब जब्ती की वैधता पर स्वयं लंबित वैधानिक अपीलों में निर्णय होना बाकी है।”
याचिका की विचारणीयता पर हाईकोर्ट ने जोर दिया कि पीएमएलए की धारा 42 के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ 60 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में अपील का वैधानिक उपचार स्पष्ट रूप से दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—ऑथराइज्ड ऑफिसर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर बनाम मैथ्यू के.सी., सीआईटी बनाम छबील दास अग्रवाल और रिखब चंद जैन बनाम भारत संघ—का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“जो भी हो, कानून का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि जब कोई विशेष कानून शिकायत के निवारण के लिए एक वैधानिक प्रभावी तंत्र प्रदान करता है, तो हाईकोर्ट को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय ट्रिब्यूनल के अंतरिम आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि, विकृति या प्रत्यक्ष अवैधता नहीं है। इसके अलावा, जब ट्रिब्यूनल के समक्ष मूल अपील लंबित है और धारा 42 के तहत वैधानिक अपील का मार्ग उपलब्ध है, तब संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण विवेकाधीन क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का कोई आधार नहीं बनता।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को सारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: ऋषभ सोनी और अन्य बनाम उप निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय
वाद संख्या: डब्ल्यूपीसी संख्या 3241/2026
पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

